कुतूहल अध्याय 2 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आप किन-किन भिन्न विधियों के माध्यम से पौधों और जंतुओं के आवास के आधार पर उनके समूह बना सकते हैं?
उत्तर

आवास वह स्थान है जहाँ पौधे और जंतु रहते हैं। सबसे सरल वर्गीकरण वही है जो पुस्तक देती है — जो थल पर रहते हैं और जो जल में रहते हैं

समूहअर्थआवास के उदाहरणवहाँ मिलने वाले पौधे और जंतु
थलीयथल पर रहने वालेवन, मरुस्थल, घास के मैदान, पर्वतीय क्षेत्रऊँट, शेर, देवदार, नागफनी, नीम, बकरी
जलीयजल में रहने वालेतालाब, झील, नदियाँ, महासागरमछली, व्हेल, डॉल्फिन, कमल, जलकुंभी
उभयचरजल के साथ-साथ थल पर भी रहने वाले जंतुतालाब के किनारे, दलदली भूमिमेंढक, भेक

थलीय और जलीय आवासों को और आगे बाँटा जा सकता है:

  • थलीय → मरुस्थल (ऊँट, नागफनी), वन (बाघ, साल), घास का मैदान (हिरण, घास), पर्वत (याक, देवदार, बुरांस)।
  • जलीय → मीठा जल (तालाब, झील, नदी — रोहू, कमल, मेंढक) और खारा जल (महासागर — व्हेल, मूँगा, समुद्री शैवाल)।
आवास इतना अच्छा आधार क्यों है: आवास ही जीव को भोजन, जल, वायु, आश्रय और जीवित रहने की अन्य आवश्यकताएँ देता है। इसलिए एक ही आवास के जीवों में प्राय: एक जैसे अनुकूलन भी होते हैं — हर महासागरीय जंतु धारारेखित है, हर मरुस्थली पौधा जल बचाता है। अत: आवास के आधार पर समूह बनाना केवल पते के आधार पर नहीं, जीवन-शैली के आधार पर समूह बनाना है।
प्र2.
यदि किसी पौधे या जंतु का आवास क्षतिग्रस्त हो जाए तो क्या होगा? यदि बकरी को खाने के लिए घास न मिले तो क्या होगा? क्या मछली बिना जल के जीवित रह सकती है?
उत्तर

आवास क्षतिग्रस्त होने पर वहाँ के पौधे और जंतु अपने घर, भोजन और अन्य संसाधनों से वंचित हो जाते हैं — और इससे जैव विविधता की हानि होती है।

बकरी: घास बकरी का भोजन है। घास न मिलने पर वह भूखी रहेगी, दुर्बल हो जाएगी, दूध देना बंद कर देगी, और या तो चरागाह की खोज में दूर जाना पड़ेगा या वह जीवित नहीं रह पाएगी। सूखे के वर्ष में चरवाहों के साथ यही होता है — पूरे रेवड़ को चारे की खोज में सैकड़ों किलोमीटर हाँकना पड़ता है।

मछली: नहीं — मछली बिना जल के जीवित नहीं रह सकती। जल केवल उसका घर नहीं है; मछली जल में घुली ऑक्सीजन क्लोम (गिल) से लेती है और उसके पख केवल जल पर ही धक्का दे सकते हैं। जल से बाहर क्लोम सूख जाते हैं और वह साँस ही नहीं ले पाती। मई में गाँव का तालाब सूखने पर यही दृश्य दिखता है।

हानि फैलती क्यों है: जीव एक-दूसरे पर निर्भर हैं। वन कट जाए तो हिरण का भोजन और आश्रय जाता है, बाघ से हिरण जाता है, पक्षियों से घोंसले के वृक्ष जाते हैं, और फल वाले वृक्षों से बीज फैलाने वाले पक्षी। एक क्षतिग्रस्त आवास पूरी शृंखला गिरा देता है — इसीलिए आवास की क्षति से जैव विविधता की हानि होती है
क्या आप जानते हैं? भारत ने इसी पर कार्य किया है। बंगाल बाघ की घटती संख्या के संरक्षण के लिए 1973 में बाघ परियोजना, 2022 में चीता पुनर्वास परियोजना, और गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) के आवासों को गुजरात, राजस्थान तथा महाराष्ट्र में संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है।
प्र3.
अपने माता-पिता, दादा-दादी और पड़ोसियों से उन पौधों, पक्षियों, कीटों अथवा ऐसे अन्य जंतुओं के बारे में जानें जिन्हें वे बचपन में प्राय: देखते थे लेकिन अब वे कम दिखाई देते हैं।
उत्तर

यह सर्वेक्षण आपको वास्तव में करना है — तीन-चार बुज़ुर्गों से पूछिए और उनके अपने शब्दों में लिखिए। विधि और एक नमूना उत्तर नीचे है।

विधि: हर व्यक्ति से पूछिए (i) आपके बचपन में कौन-से पौधे, पक्षी और कीट सामान्य थे, (ii) उनमें से अब कौन कम दिखते हैं, और (iii) आपके अनुसार क्या बदला। यह भी लिखिए कि वे किस स्थान की बात कर रहे हैं, क्योंकि उत्तर उसी पर निर्भर हैं। फिर कक्षा में वे नाम मिलाइए जो एक से अधिक बार आए।

नमूना उत्तर: मेरी दादी बताती हैं कि जब वे मेरी आयु की थीं तब लगभग हर घर की छत में गौरैया घोंसले बनाती थी और खेतों के ऊपर गिद्ध मँडराते थे। वर्षा ऋतु में झाड़ियों में जुगनू चमकते थे और पहली वर्षा के बाद इतने मेंढक टर्राते थे कि तालाब रात भर गूँजता रहता था। आज वे बहुत कम गौरैया देखती हैं, गिद्ध तो एक भी नहीं, और जुगनू भी न के बराबर। वे कहती हैं कि घोंसले के छेदों वाले पुराने कच्चे-खपरैल घर चले गए, तालाब पाटकर मकान बन गए, और खेतों में पहले से कहीं अधिक कीटनाशक छिड़का जाता है।
ये परिवर्तन क्यों होते हैं: उनके बताए तीनों कारण आवास की क्षति के उदाहरण हैं। कंक्रीट के भवनों में घोंसले के छेद नहीं होते; पाटा हुआ तालाब मेंढक का प्रजनन स्थल छीन लेता है; कीटनाशक उन कीटों को मार देते हैं जिन पर गौरैया और जुगनू निर्भर हैं। आवास चला जाए तो जंतु टिक नहीं पाता — भले ही किसी ने उसे हानि पहुँचाने का इरादा न किया हो।
प्र4.
आप अपने क्षेत्र के पवित्र उपवन के विषय में पता लगाइए।
उत्तर

पवित्र उपवन वे अबाधित वन क्षेत्र हैं जिनका संरक्षण स्थानीय समुदाय करता है। इनका आकार बहुत छोटे से लेकर बहुत बड़े तक हो सकता है और ये पूरे भारत में पाए जाते हैं। ये कई प्रकार के औषधीय पौधों समेत विविध प्रकार के पौधों और जंतुओं का घर हैं। यहाँ किसी को भी किसी जीव-जंतु को हानि पहुँचाने, पेड़ काटने या क्षेत्र को क्षति पहुँचाने की अनुमति नहीं है — इसलिए पवित्र उपवन सामुदायिक रूप से संरक्षित जैव संपदा हैं।

अपने क्षेत्र के उपवन का पता कैसे लगाएँ: गाँव या मोहल्ले के बुज़ुर्गों से उसका स्थानीय नाम पूछिए (हर राज्य में नाम अलग है), शिक्षक के साथ वहाँ जाइए, भीतर के वृक्ष, पक्षी और औषधीय पौधे अंकित कीजिए, और पूछिए कि उसकी देखभाल कौन करता है तथा वहाँ के नियम क्या हैं।

राज्यपवित्र उपवन का स्थानीय नाम
केरलकावु / सर्प कावु
मेघालयलॉ किंतांग / लॉ लिंगदोह (जैसे मॉफ़लांग)
महाराष्ट्रदेवराई
राजस्थानओरण / केंकड़ी
कर्नाटकदेवरकाडु / देवरकान
हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंडदेवभूमि / देव वन
पवित्र उपवन इतने सफल क्यों हैं: इनकी रक्षा किसी बाड़ या पहरेदार से नहीं, बल्कि समुदाय की अपनी आस्था और सहमति से होती है। जब नियम सब मानते हैं तो कोई तोड़ता नहीं। इसीलिए अनेक पवित्र उपवनों में आज भी वे पुराने वृक्ष और दुर्लभ औषधीय पौधे बचे हैं जो चारों ओर के जंगल से लुप्त हो चुके हैं — यह जीवंत प्रमाण है कि साधारण लोग जैव विविधता की रक्षा कर सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे साइलेंट वैली बचाओ आंदोलन में किया।
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