कुतूहल अध्याय 2 आइए, और अधिक सीखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
यहाँ दो प्रकार के बीज दिए गए हैं। आप इनके पौधों की जड़ों और पत्तियों के शिरा-विन्यास में क्या अंतर पाते हैं? (क) गेहूँ (ख) राजमा
उत्तर

ये दोनों बीज पौधों के दो बड़े समूहों के हैं, इसलिए उनकी जड़ें और पत्तियाँ भी भिन्न होती हैं।

 (क) गेहूँ(ख) राजमा
बीज में बीजपत्रों की संख्याएक (दाना दो भागों में नहीं बँटता)दो (भीगा बीज दो भागों में बँट जाता है)
समूहएकबीजपत्रीद्विबीजपत्री
जड़ का प्रकारझकड़ा (रेशेदार) जड़ — तने के आधार से समान माप की पतली जड़ों का गुच्छामूसला जड़ — एक मोटी मुख्य जड़ जिससे छोटी पार्श्व जड़ें निकलती हैं
पत्ती का शिरा-विन्याससमांतर शिरा-विन्यास — शिराएँ साथ-साथ चलती हैंजालिकारूपी शिरा-विन्यास — मोटी मध्य शिरा के दोनों ओर शिराओं का जाल
जड़ों की गहराईसतह के पास फैलकर ऊपरी मिट्टी थामती हैंगहराई में जाकर नीचे का जल लेती है
बीज ही शेष सब कुछ क्यों तय करता है: बीजपत्रों की संख्या बीज बनते ही निश्चित हो जाती है और वही योजना आगे जड़ें और पत्तियाँ बनाती है। इसलिए एक बीजपत्र वाले बीज से सदैव समांतर शिरा-विन्यास और झकड़ा जड़ें बनती हैं, तथा दो बीजपत्र वाले बीज से जालिकारूपी शिरा-विन्यास और मूसला जड़।
स्वयं जाँचिए: कुछ गेहूँ के दाने और कुछ राजमा रात भर भिगोइए। राजमा उँगलियों में दो भागों में बँट जाता है, गेहूँ नहीं। फिर दोनों को एक सप्ताह गीली रुई पर उगाइए और जड़ें देखिए — गेहूँ के नीचे समान धागों का गुच्छा, राजमा के नीचे एक मज़बूत मुख्य जड़।
प्र2.
नीचे कुछ जंतुओं के नाम दिए गए हैं, उनके आवास के आधार पर समूह बनाएँ। चिह्नांकित खंड ‘क’ में जलीय जंतुओं और चिह्नांकित खंड ‘ख’ में थलीय जंतुओं के नाम लिखिए। खंड ‘ग’ में दोनों आवासों में रहने वाले जंतुओं के नाम लिखिए। घोड़ा, डॉल्फिन, मेंढक, भेड़, मगरमच्छ, गिलहरी, व्हेल, केंचुआ, कबूतर, कछुआ
उत्तर

दोनों वृत्त एक-दूसरे को काटते हैं, इसलिए जो जंतु जल और थल दोनों का उपयोग करते हैं वे बीच के खंड ‘ग’ में आएँगे।

क — जलीय ख — थलीय ग — दोनों डॉल्फिन व्हेल मेंढक मगरमच्छ कछुआ घोड़ा भेड़ गिलहरी केंचुआ कबूतर
खंड ‘क’ में केवल जल में रहने वाले, ‘ख’ में केवल थल पर रहने वाले और ‘ग’ में दोनों का उपयोग करने वाले जंतु।
खंडजंतुकारण
क — जलीयडॉल्फिन, व्हेलये पूरा जीवन जल में बिताते हैं और थल पर चल ही नहीं सकते
ख — थलीयघोड़ा, भेड़, गिलहरी, केंचुआ, कबूतरये थल पर रहते हैं — भूमि पर, मिट्टी के भीतर, या वृक्षों पर
ग — दोनोंमेंढक, मगरमच्छ, कछुआये जल में तैरते भी हैं और बाहर आकर थल पर चलते-फिरते भी हैं
व्हेल और डॉल्फिन ‘ग’ में क्यों नहीं: वे साँस लेने के लिए सतह पर आते अवश्य हैं, परंतु जल छोड़ते कभी नहीं। मेंढक, मगरमच्छ और कछुआ वास्तव में थल पर चलते हैं — मेंढक किनारे पर कीट पकड़ता है, मगरमच्छ किनारे पर धूप सेंकता है और कछुआ भूमि पर चलता है। साँस लेने के लिए ऊपर आना थल पर रहना नहीं है।
क्या आप जानते हैं? मेंढक जैसे जंतु जो जल के साथ-साथ थल पर भी रह सकते हैं, उभयचर कहलाते हैं।
प्र3.
मनु की माँ की एक शाक वाटिका (किचन गार्डन) है। एक दिन वह मिट्टी से मूली उखाड़ रही थीं। उन्होंने मनु को बताया कि मूली एक प्रकार की जड़ है। एक मूली को सावधानीपूर्वक देखें और लिखें कि वह किस प्रकार की जड़ है। मूली के पौधे की पत्तियों में आपको किस प्रकार का शिरा-विन्यास दिखाई देगा?
उत्तर

मूली एक मूसला जड़ है — फूली हुई मुख्य जड़ — और मूली के पौधे की पत्तियों में जालिकारूपी शिरा-विन्यास दिखाई देगा।

मूली को देखने पर क्या दिखता है:

  • एक मोटी मुख्य जड़ है, सफ़ेद और लंबी, नीचे की ओर पतली होती हुई। यही भाग हम खाते हैं।
  • उसकी पूरी लंबाई पर पतली पार्श्व जड़ें निकलती हैं — सतह पर उनके निशान या बाल जैसी जड़ें दिखती हैं।
  • तने के आधार पर समान माप की पतली जड़ों का कोई गुच्छा नहीं है, इसलिए यह झकड़ा जड़तंत्र निश्चित रूप से नहीं है।
  • ऊपर की पत्तियों में मोटी मध्य शिरा के दोनों ओर छोटी शिराओं का जाल है।
एक मुख्य जड़ + छोटी पार्श्व जड़ें  →  मूसला जड़
मूसला जड़  →  पौधा द्विबीजपत्री  →  पत्तियों में जालिकारूपी शिरा-विन्यास
मूली इतनी मोटी क्यों होती है: मूली का पौधा आगे फूल और बीज बनाने के लिए अतिरिक्त भोजन अपनी मूसला जड़ में संचित करता है। हम उसे उससे पहले ही निकाल लेते हैं — इसीलिए जड़ मोटी, रसीली और भोजन से भरी होती है। गाजर, शलजम, चुकंदर और शकरकंद में भी इसी प्रकार भोजन संचित रहता है।
स्वयं जाँचिए: अगली बार जब मूली पत्तों सहित घर आए, तो एक पत्ती प्रकाश के सामने रखिए। शिराओं का जाल स्पष्ट दिखता है — और इतने भर से पता चल जाता है कि पौधा द्विबीजपत्री है और उसकी जड़ मूसला है, बिना कुछ खोदे।
प्र4.
नीचे दिए गए चित्रों में पर्वतीय बकरी और मैदानों में पाई जाने वाली बकरी को देखें। उनके बीच समानताएँ और अंतर बताएँ। साथ ही यह भी बताएँ कि इन अंतरों के क्या कारण हैं?
उत्तर

दोनों बकरियाँ हैं, इसलिए अधिकांश शरीर एक जैसा है; अंतर ठीक वहीं है जहाँ दोनों आवासों की माँग भिन्न है।

समानताएँ: दोनों के चार पाद और द्विखंडित खुर, दो सींग, छोटी पूँछ, शरीर पर बाल, दो कान और एक जैसा मुख होता है। दोनों शाकाहारी हैं जो घास और पत्तियाँ चरती हैं, दोनों जुगाली करती हैं तथा दोनों बच्चों को जन्म देकर दूध पिलाती हैं।

विशेषतापर्वतीय बकरीमैदानों की बकरीअंतर का कारण
बाल / रोमघने, लंबे, ऊनी बालछोटे, पतले बालपर्वत बहुत ठंडे हैं; घना आवरण गरम वायु रोककर शरीर को गरम रखता है। गरम मैदानों में पतला आवरण ऊष्मा निकल जाने देता है।
शरीरभारी और गठा हुआपतला और हल्कागठा हुआ शरीर ठंड में कम ऊष्मा खोता है
टाँगेंछोटी, मोटी और मज़बूतलंबी और पतलीछोटी मज़बूत टाँगें खड़ी पथरीली ढलानों पर संतुलन और पकड़ देती हैं; लंबी टाँगें समतल भूमि पर चलने-दौड़ने के लिए उपयुक्त हैं
खुरकठोर किनारे, भीतर कोमल खुरदरी गद्दीअपेक्षाकृत चिकने साधारण खुरखुरदरी गद्दी खेल के जूते के तले जैसी पकड़ देती है और चट्टान पर फिसलने नहीं देती
इन सबका कारण: ये सब अनुकूलन हैं — वे विशिष्ट विशेषताएँ जो जंतु को अपने क्षेत्र में जीवित रहने योग्य बनाती हैं। पर्वतीय बकरी का क्षेत्र ठंडा, ढालू और पथरीला है, इसलिए उसका शरीर गरमी और पकड़ के लिए बना है। मैदानी बकरी का क्षेत्र गरम और समतल है, इसलिए उसका शरीर ठंडक और तेज़ चाल के लिए बना है। ठीक यही बात पृष्ठ 25–26 पर गरम और ठंडे मरुस्थल के ऊँटों के साथ हुई थी।
क्या आप जानते हैं? लद्दाख की पर्वतीय बकरियों के भीतरी कोमल ऊन को हर वसंत में निकालकर पश्मीना बुना जाता है — विश्व के सबसे गरम और महीन ऊनों में से एक। बकरी ने उसे सर्दी से बचने के लिए उगाया था; हम उसे उधार लेते हैं।
प्र5.
पाठ में चर्चा की गई विशेषताओं के अतिरिक्त किसी अन्य विशेषता के आधार पर निम्नलिखित जंतुओं के दो समूह बनाएँ— गाय, तिलचट्टा (कॉकरोच), कबूतर, चमगादड़, व्हेल, कछुआ, मछली, टिड्डा, छिपकली।
उत्तर

अध्याय आवास, गति, भोजन और रंग पहले ही ले चुका है, इसलिए कोई और विशेषता चुननी होगी। सबसे स्पष्ट यह है।

चुना गया आधार: मेरुदंड की उपस्थिति या अनुपस्थिति।

समूह 1 — मेरुदंड वाले जंतुसमूह 2 — मेरुदंड रहित जंतु
गाय, कबूतर, चमगादड़, कछुआ, व्हेल, मछली, छिपकलीतिलचट्टा, टिड्डा

दो अन्य सही उत्तर, भिन्न आधारों पर:

आधारसमूह 1समूह 2
संतान उत्पत्तिबच्चों को जन्म देने वाले — गाय, चमगादड़, व्हेलअंडे देने वाले — तिलचट्टा, कबूतर, कछुआ, मछली, टिड्डा, छिपकली
पादों की संख्याछह पाद — तिलचट्टा, टिड्डाचार पाद — गाय, चमगादड़, कछुआ, छिपकली; दो पाद — कबूतर; बिना पाद — व्हेल, मछली
शरीर का आवरणबाल — गाय, चमगादड़, व्हेल; पंख — कबूतरशल्क — मछली, छिपकली; कठोर कवच — कछुआ; कठोर बाह्य आवरण — तिलचट्टा, टिड्डा
समूहन सही कब है: दो कसौटियाँ। पहली, आधार एक स्पष्ट विशेषता हो जिसे जाँचा जा सके। दूसरी, सूची का हर जंतु ठीक एक ही समूह में आए — न कोई छूटे, न कोई दोनों में। मेरुदंड वाला वर्गीकरण और अंडे देने वाला वर्गीकरण दोनों इन कसौटियों पर खरे हैं, इसलिए दोनों सही हैं। "हमारे लिए उपयोगी या अनुपयोगी" आधार विफल होगा, क्योंकि वह व्यक्ति-व्यक्ति पर बदल जाता है।
प्र6.
जनसंख्या के बढ़ने और मनुष्यों द्वारा अधिक सुविधाजनक जीवन की चाह में विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनों की कटाई की जा रही है। यह हमारे आस-पास के परिवेश को कैसे प्रभावित कर सकता है? आपके विचार से हम इस चुनौती का निदान कैसे कर सकते हैं?
उत्तर

वनों की कटाई हज़ारों पौधों और जंतुओं के आवास को नष्ट करती है, और इसकी हानि हम तक भी पहुँचती है।

परिवेश पर प्रभाव:

  • आवास और जैव विविधता की हानि। जंतुओं का घर, भोजन और आश्रय छिन जाता है। भारत में बंगाल बाघ, चीता और गोडावण की संख्या इसी कारण घटी।
  • मिट्टी का कटाव और भूस्खलन। जड़ें मिट्टी थामती हैं। वृक्ष हटते ही वर्षा ऊपरी मिट्टी बहा ले जाती है और पहाड़ी ढलानें खिसकने लगती हैं।
  • कम वर्षा और अधिक गरमी। वृक्ष जलवाष्प और छाया देते हैं। वन कटने पर क्षेत्र गरम और शुष्क हो जाता है।
  • बाढ़ और सूखते कुएँ। वन की मिट्टी स्पंज की तरह वर्षा सोख लेती है; नंगी भूमि से पानी तुरंत बह जाता है, इसलिए वर्षा में नदियाँ उफनती हैं और गरमी में भूजल घट जाता है।
  • कार्बन डाइऑक्साइड और प्रदूषण में वृद्धि। वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन देते हैं। वृक्ष कम होने का अर्थ है दूषित वायु और गरम होती जलवायु।
  • जंतुओं का गाँवों में आना। वन में भोजन न मिलने पर हाथी और तेंदुए खेतों और बस्तियों में आ जाते हैं, जो दोनों के लिए ख़तरनाक है।
  • औषधियों और आजीविका की हानि। अनेक औषधीय पौधे केवल वनों में उगते हैं और वनवासी समुदाय उन्हीं पर निर्भर हैं।

इस चुनौती का निदान:

  1. काटने से अधिक लगाइए। वन महोत्सव जैसे वृक्षारोपण अभियान तथा विद्यालय और सड़क किनारे की हर खाली जगह पर पौधे।
  2. कम प्रयोग और पुन: उपयोग। काग़ज़ के दोनों ओर लिखिए, पुनर्चक्रित काग़ज़ और कपड़े के थैले काम में लाइए, लकड़ी और काग़ज़ की वस्तुएँ व्यर्थ न करें।
  3. विकल्प अपनाइए। जलावन की लकड़ी के स्थान पर एल.पी.जी. या सौर चूल्हा; वन की इमारती लकड़ी के स्थान पर बाँस और कृषि अपशिष्ट।
  4. जो बचा है उसकी रक्षा कीजिए। राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों और बाघ परियोजना जैसी योजनाओं का समर्थन कीजिए तथा सामुदायिक वनों और पवित्र उपवनों को बचाइए।
  5. कृषि-वानिकी। खेतों में फ़सलों के साथ वृक्ष लगाइए, ताकि लकड़ी और फल खेतों से मिलें, वनों से नहीं।
  6. जागरूकता फैलाइए। साइलेंट वैली बचाओ और चिपको आंदोलन इसलिए सफल हुए क्योंकि साधारण लोगों ने पोस्टर, पत्र, सेमिनार और याचिकाओं के माध्यम से अपनी बात रखी।
केवल वृक्षारोपण पर्याप्त क्यों नहीं है: नया लगाया पौधा वन नहीं होता। वन एक पूरा आवास है — उल्लुओं के लिए खोखले वाले पुराने वृक्ष, झाड़ियाँ, गिरे हुए तने, कीट और सदियों में बनी मिट्टी। जो एक दिन की कटाई नष्ट कर देती है, उसे फिर से बनने में दशकों लगते हैं। इसीलिए बचे हुए वन की रक्षा नया वन लगाने से कहीं अधिक मूल्यवान है
प्र7.
फ्लोचार्ट का विश्लेषण करें। इसमें ‘क’ और ‘ख’ के कौन-कौन-से उदाहरण हो सकते हैं?
उत्तर

फ्लोचार्ट को क्रम से पढ़िए। "पौधा" → "क्या इसमें पत्तियाँ हैं?" → हाँ → "क्या इसमें जालिकारूपी शिरा-विन्यास है?" अब मार्ग दो भागों में बँटता है:

जालिकारूपी शिरा-विन्यास → हाँ = जालिकारूपी शिरा-विन्यास वाले पौधे (द्विबीजपत्री)
जालिकारूपी शिरा-विन्यास → नहीं = पत्तियों वाले किंतु समांतर शिरा-विन्यास वाले पौधे (एकबीजपत्री)
 
क्या दर्शाता हैवे पौधे जिनकी पत्तियों में जालिकारूपी शिरा-विन्यास हैवे पौधे जिनमें जालिकारूपी नहीं, समांतर शिरा-विन्यास है
उदाहरणगुड़हल, आम, नीम, तुलसी, सरसों, चना, गुलाब, बरगद, पीपल, गेंदा, सदाबहारकेला, घास, गेहूँ, मक्का, धान, गन्ना, बाँस, लेमन घास, प्याज़, नारियल
इनके बारे में औरमूसला जड़; बीज में दो बीजपत्र (द्विबीजपत्री)झकड़ा जड़; बीज में एक बीजपत्र (एकबीजपत्री)
चार्ट "क्या इसमें पत्तियाँ हैं?" से क्यों आरंभ होता है: शिरा-विन्यास का प्रश्न तभी सार्थक है जब पौधे में पत्तियाँ हों। नागफनी, जिसकी पत्तियाँ काँटों में बदल चुकी हैं, पहले ही प्रश्न पर "नहीं" कहकर चार्ट से बाहर हो जाएगा। फ्लोचार्ट तभी काम करता है जब प्रश्न सही क्रम में पूछे जाएँ।
कीजिए: चार्ट को स्वयं आगे बढ़ाइए। ‘क’ के नीचे जोड़िए "क्या तना कोमल और हरा है?" — हाँ से तुलसी और टमाटर (शाक), नहीं से आम और नीम (वृक्ष तथा झाड़ी)। ऐसे फ्लोचार्ट को कुंजी कहते हैं और जीवविज्ञानी अनजान पौधों की पहचान इसी विधि से करते हैं।
प्र8.
राज अपने मित्र संजय से तर्क करता है, “गुड़हल का पौधा एक झाड़ी है।” संजय इसके स्पष्टीकरण के लिए कौन से प्रश्न पूछ सकता है?
उत्तर

संजय को ऐसे प्रश्न पूछने चाहिए जो झाड़ी की तीन परिभाषक विशेषताओं की जाँच करें — ऊँचाई, तने की प्रकृति और शाखाएँ कहाँ से निकलती हैं

  1. पौधा कितना ऊँचा है? हमसे छोटा है, हमारे बराबर है, या हमसे बहुत ऊँचा? (झाड़ी मध्यम ऊँचाई की होती है।)
  2. तने का रंग क्या है — हरा या भूरा? (झाड़ी का तना भूरा होता है।)
  3. तना कठोर है या कोमल? क्या वह सरलता से मुड़ जाता है या काष्ठीय और कड़ा है? (झाड़ी का तना कठोर काष्ठीय होता है।)
  4. तना वृक्ष के तने जैसा मोटा है या पतला? (झाड़ी का तना कठोर परंतु पतला होता है।)
  5. शाखाएँ कहाँ से निकलती हैं — भूमि के निकट से या तने के ऊपरी भाग से? (झाड़ी में वे भूमि के निकट से निकलती हैं।)
  6. एक ही मुख्य तना है या आधार के पास से अनेक तने निकलते हैं? (झाड़ी में अनेक होते हैं।)
  7. क्या तने को खड़ा रहने के लिए किसी सहारे की आवश्यकता है? (यदि हाँ, तो वह झाड़ी नहीं, आरोही लता होगी।)
गुड़हल → मध्यम ऊँचाई ✔   भूरा तना ✔   कठोर किंतु पतला ✔   शाखाएँ भूमि के निकट ✔
अत: राज सही है — गुड़हल का पौधा झाड़ी है।
तर्क करने से पूछना बेहतर क्यों है: संजय के प्रश्न मत को अवलोकन में बदल देते हैं। "मुझे झाड़ी लगती है" बनाम "मुझे वृक्ष लगता है" के स्थान पर दोनों मित्र एक ही पौधे को देखकर एक ही चार विशेषताएँ जाँचते हैं — और फिर विवाद बचता ही नहीं। यह अध्याय 1 की वैज्ञानिक विधि का मित्रों की बहस में उपयोग है।
सुझाव: गुड़हल की तुलना गुलाब (यह भी झाड़ी), टमाटर (शाक) और आम (वृक्ष) से कीजिए। संदिग्ध पौधे को हर समूह के ज्ञात उदाहरण के पास रखकर देखना ऐसे प्रश्न सुलझाने का सबसे तेज़ उपाय है।
प्र9.
तालिका में कुछ आँकड़े दिए गए हैं। आँकड़ों के समूह के आधार पर इन पौधों के उदाहरण का पता लगाइए। समूह ‘क’ — द्विबीजपत्री बीज, मूसला जड़; समूह ‘ख’ — एकबीजपत्री बीज, झकड़ा जड़। (I) समूह ‘क’ के पौधों में और क्या समानताएँ हैं? (II) समूह ‘ख’ के पौधों में और क्या समानताएँ हैं?
उत्तर

तालिका का "उदाहरण" स्तंभ भरने पर:

समूहबीज का प्रकारजड़ का प्रकारउदाहरण
द्विबीजपत्रीमूसला जड़चना, राजमा, सरसों, मटर, मूँगफली, आम, नीम, गुड़हल, गुलाब, गेंदा, टमाटर, सदाबहार
एकबीजपत्रीझकड़ा जड़गेहूँ, मक्का, धान, घास, गन्ना, बाँस, केला, प्याज़, लेमन घास, नारियल

(I) समूह ‘क’ के पौधों की अन्य समानताएँ:

  • उनके बीज दो बीजपत्रों में बँट जाते हैं।
  • उनकी पत्तियों में जालिकारूपी शिरा-विन्यास होता है।
  • उनकी मुख्य जड़ मिट्टी में गहराई तक जाती है और उससे पार्श्व जड़ें निकलती हैं।
  • उनकी पत्तियाँ प्राय: चौड़ी और वृंत सहित होती हैं।

(II) समूह ‘ख’ के पौधों की अन्य समानताएँ:

  • उनके बीज में एक ही बीजपत्र होता है।
  • उनकी पत्तियों में समांतर शिरा-विन्यास होता है।
  • उनकी जड़ें तने के आधार से निकलती समान माप की पतली जड़ों का गुच्छा होती हैं, जो सतह के पास फैलती हैं।
  • उनकी पत्तियाँ प्राय: लंबी और पतली होती हैं और आधार तने को लपेटता है।
दोनों सूचियाँ कभी आपस में क्यों नहीं मिलतीं: ये सभी लक्षण बीज बनते समय एक साथ तय हो जाते हैं। इसीलिए एक ही अवलोकन पर्याप्त है — किसी पौधे के नीचे झकड़ा जड़ों का गुच्छा देखकर बिना देखे ही कहा जा सकता है कि उसकी पत्तियों में समांतर शिराएँ होंगी और उसके बीज में एक बीजपत्र था।
क्या आप जानते हैं? भारत में उगने वाला लगभग हर अनाज — गेहूँ, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा — समूह ‘ख’ का है और लगभग हर दलहन — चना, अरहर, मूँग, उड़द, राजमा — समूह ‘क’ का। इसीलिए दाल-चावल की थाली में सचमुच एक एकबीजपत्री और एक द्विबीजपत्री साथ-साथ होते हैं।
प्र10.
नीचे दिए गए चित्र में बत्तख के नामांकित भाग को देखें। बत्तख के पंजों में अन्य पक्षियों की तुलना में आपको क्या भिन्नता दिखाई देती है? बत्तख अपने इस भाग का उपयोग करके कौन-सी गतिविधि करने में सक्षम होगी?
उत्तर

बत्तख के पंजे झिल्लीयुक्त होते हैं; कबूतर के नहीं।

(क) बत्तख — झिल्लीयुक्त पंजे उँगलियाँ झिल्ली से जुड़ी हैं (ख) कबूतर — अलग-अलग नखयुक्त उँगलियाँ
बत्तख में त्वचा की झिल्ली उँगलियों को जोड़कर एक चौड़ा चप्पू बना देती है; कबूतर में हर उँगली अलग है और नख पर समाप्त होती है।
 बत्तखकबूतर और अन्य पक्षी
उँगलियाँत्वचा की झिल्ली से आपस में जुड़ी हुईअलग-अलग, प्रत्येक के सिरे पर नख
पंजे की आकृतिचौड़ी और चपटी, चप्पू या पंखे जैसीपतली और पकड़ने योग्य
किस काम के लिए उपयुक्तजल को पीछे धकेलने के लिएडाली या तार पकड़ने के लिए

बत्तख कौन-सी गतिविधि कर सकेगी: जल में तैरना (और पानी में पैर मारकर आगे बढ़ना)। झिल्लीयुक्त पंजा चप्पू की तरह काम करता है — पीछे की ओर मारने पर वह फैल जाता है और बहुत सारा जल पीछे धकेलता है, जिससे बत्तख आगे बढ़ती है; आगे लाते समय झिल्ली सिमट जाती है, इसलिए बाधा बहुत कम होती है। यही चौड़ा पंजा बत्तख को कीचड़ और गीली रेत पर बिना धँसे चलने में भी सहायता करता है।

कबूतर को इनकी आवश्यकता क्यों नहीं: कबूतर डालियों, तारों और मुँडेरों पर बैठता है। उसे ऐसी पतली उँगलियाँ चाहिए जो नखों सहित लिपटकर पकड़ बना सकें। झिल्लीयुक्त पंजा तार पकड़ ही नहीं पाता, और नखयुक्त पंजा तैरने में लगभग बेकार होता। दोनों पंजे अपने-अपने आवास के अनुकूलन हैं।
क्या आप जानते हैं? तैराक रबर के फ़्लिपर ठीक इसी कारण पहनते हैं — बड़ा तल अधिक जल पीछे धकेलता है और अधिक गति देता है। यह विचार सबसे पहले बत्तख़ों को आया था।
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