कुतूहल अध्याय 8 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
जब हम डोसा बनाते हैं तब हम गरम तवे पर जल छिड़कते हैं और जल विलुप्त हो जाता है। यह कहाँ जाता है?
उत्तर

जल भाप में बदलकर वायु में चला जाता है। पुस्तक के शब्दों में — गरम तवे पर जो जल छिड़का जाता है, वह भाप में बदल जाता है। भाप वास्तव में जलवाष्प है, जिसका कुछ भाग जल की बूँदों में परिवर्तित हो जाता है।

चरणबद्ध रूप से:

  1. तवा बहुत गरम होता है — 100 °C से कहीं अधिक।
  2. बूँदें छूते ही बहुत अधिक ऊष्मा लेकर तुरंत वाष्प में बदल जाती हैं, छन्न की ध्वनि के साथ।
  3. तवे के ठीक ऊपर वाष्प ठंडी वायु से मिलती है और उसका कुछ भाग पुन: छोटी-छोटी बूँदों में बदल जाता है। यही वह सफेद बादल है जो ऊपर उठता दिखता है।
  4. और ऊपर जाकर ये बूँदें फिर वाष्पित हो जाती हैं और वाष्प रसोई की वायु में मिल जाती है।
क्या आप जानते हैं? वास्तव में, जलवाष्प अदृश्य होती है लेकिन भाप में छोटी-छोटी बूँदों की उपस्थिति इसे दृश्यमान बनाती है। अत: जो सफेद धुँआ-सा दिखता है वह वाष्प है ही नहीं — वह बहुत सूक्ष्म जल-बूँदों की धुंध है, अर्थात् आँखों के सामने होता संघनन।
रसोइया ऐसा क्यों करता है: जल छिड़ककर पता चलता है कि तवा पर्याप्त गरम है या नहीं — यदि बूँदें फिसलकर तुरंत गायब हों तो तवा तैयार है। साथ ही वाष्प कुछ ऊष्मा भी ले जाती है जिससे तवा थोड़ा ठंडा होकर घोल को चिपकने नहीं देता और डोसा समान रूप से फैलता है।
प्र2.
वाष्पीकरण की प्रक्रिया कमरे के सामान्य तापमान पर भी निरंतर होती रहती है। क्या आप वाष्पीकरण के अन्य उदाहरण सोच सकते हैं?
उत्तर

पुस्तक तीन उदाहरण देती है — गीले कपड़े, पोंछा लगे फर्श और शरीर के पसीने का सूखना। भारतीय घर से कुछ और उदाहरण:

कहाँ दिखता हैक्या वाष्पित हो रहा है
तार पर टँगे कपड़े, खूँटी पर लटका गीला तौलियाकपड़े से जल
पोंछा लगा फर्श, धुला हुआ बरामदाफर्श से जल
पंखे के नीचे सूखता पसीनात्वचा से जल
रैक पर रखे धुले स्टील के बर्तनधातु पर लगा जल
छत पर सूखते पापड़, बड़ियाँ, आम की फाँकें और लाल मिर्चखाद्य पदार्थ के भीतर का जल
खुली बाल्टी या पक्षियों के जल-पात्र का घटता स्तरखुली सतह से जल
स्नान के बाद सूखते बालबालों से जल
गुजरात और तमिलनाडु की नमक-क्यारियाँसमुद्र का जल — नमक पीछे रह जाता है
सप्ताह भर में मटके का घटता जलछिद्रों से रिसकर वाष्पित होता जल
सबमें समान बात: प्रत्येक स्थिति में द्रव की सतह वायु के संपर्क में खुली है और ताप सामान्य है। न कोई आग, न 100 °C — केवल सतह से सबसे तेज कणों का निरंतर, मौन पलायन।
प्र3.
अब आप क्या सोचते हैं — गड्ढों से जल के विलुप्त होने का क्या कारण है? क्या यह: (क) भूमि में जल के रिसाव के कारण है (ख) जल के वाष्पीकरण के कारण है या (ग) इन दोनों के कारण है?
उत्तर

(ग) इन दोनों के कारण है।

खेल के मैदान की सतह मिट्टी की है, अत: जल के लिए दोनों रास्ते खुले हैं:

  • रिसाव: जल मिट्टी के कणों के बीच के रिक्त स्थानों में उतरकर नीचे जाकर भू-जल बन जाता है।
  • वाष्पीकरण: गड्ढे की खुली सतह का जल वाष्प बनकर वायु में मिल जाता है। सूर्य द्वारा भूमि गरम होने से यह तेज हो जाता है।
केवल एक कारण क्यों नहीं चुन सकते: क्रियाकलाप 8.2 ने दिखाया कि जल ऐसी सतह से भी वाष्पित होता है जिससे वह रिस नहीं सकता, अत: मैदान में भी वाष्पीकरण अवश्य हो रहा है। साथ ही सूखी मिट्टी में जल को उतरते सबने देखा है, अत: रिसाव भी हो रहा है। जब दोनों कारण संभव हों तो ईमानदार उत्तर यही है कि दोनों काम कर रहे हैं — और उनका अनुपात स्थान के अनुसार बदलता है। सीमेंट के फर्श पर केवल वाष्पीकरण संभव है; ढीली बालू पर अधिकांश काम रिसाव करता है।
स्वयं जाँचें: वर्षा के बाद मिट्टी वाले एक गड्ढे और सीमेंट वाले एक गड्ढे के किनारे चॉक से चिह्नित कीजिए और सूखने का समय अंकित कीजिए। मिट्टी वाला प्राय: पहले सूखता है, क्योंकि उसके पास एक के स्थान पर दो निकास हैं।
प्र4.
जैसे ही आप अपने हाथों पर हैंड सैनिटाइजर मलते हैं, वह विलुप्त हो जाता है। इसका क्या होता है?
उत्तर

सैनिटाइजर वाष्पित हो जाता है — वह द्रव अवस्था से वाष्प में बदलकर वायु में मिल जाता है। न वह त्वचा में सोख लिया जाता है और न ही "खत्म" होता है।

वह इतनी तेजी से क्यों गायब होता है, इसके दो कारण हैं:

  • सैनिटाइजर मुख्यत: ऐल्कोहल (स्पिरिट) होता है, और ऐल्कोहल उसी ताप पर जल से कहीं अधिक तेजी से वाष्पित होता है।
  • मलने से वह दोनों हथेलियों और उँगलियों पर बहुत पतली परत में फैल जाता है, अत: अनावृत्त क्षेत्र बहुत बढ़ जाता है — और अधिक अनावृत्त क्षेत्र सदैव तीव्र वाष्पीकरण देता है (क्रियाकलाप 8.7)।
हाथ ठंडे क्यों लगते हैं: वाष्प में बदलने के लिए द्रव को ऊष्मा चाहिए, और वह ऊष्मा वह आपकी त्वचा से लेता है। हथेली ऊष्मा खोकर ठंडी लगती है। यही वह शीतलन प्रभाव है जो मटके का जल ठंडा रखता है और पसीने से हमें ठंडक देता है — खंड 8.6 में आप इसे फिर मिलेंगे।
प्रयास करें: एक हाथ की पीठ पर सैनिटाइजर की एक बूँद और दूसरे पर जल की एक बूँद रखिए। दोनों पर धीरे से फूँक मारिए। सैनिटाइजर पहले जाता है और अधिक ठंडा लगता है। भिन्न द्रवों की वाष्पन दर भिन्न होती है।
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