कुतूहल अध्याय 9 क्रियाकलाप 9.4: आइए, प्रयोग करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
चित्र 9.10 में दिखाए अनुसार आप स्वयं फिल्टर-पत्र को मोड़कर उसका एक शंकु (कोन) बनाने का प्रयास करें।
उत्तर

मोड़ने के चार चरण, ठीक चित्र 9.10 के अनुसार:

  1. गोल फिल्टर-पत्र को समतल रखिए।
  2. एक तह (फोल्ड) — उसे ठीक बीच से मोड़िए। अब अर्धवृत्त बन गया।
  3. दो तह (फोल्ड) — अर्धवृत्त को फिर आधा मोड़िए। अब चौथाई वृत्त बन गया।
  4. शंकु (कोन) — चौथाई को इस प्रकार खोलिए कि एक ओर तीन परतें और दूसरी ओर एक परत रहे। यह शंकु बन जाता है, जो कीप के भीतर ठीक बैठता है।
चपटी चकती नहीं, शंकु ही क्यों: शंकु कीप के आकार से मेल खाता है, इसलिए कागज़ चारों ओर काँच से चिपक जाता है और किनारे पर कोई खाली जगह नहीं बचती। यदि खाली जगह रह जाए तो मटमैला जल फिल्टर-पत्र के भीतर से जाने के बजाय उसके बगल से बह जाएगा और कुछ भी नहीं छनेगा।
सुझाव: जल डालने से पहले मुड़े हुए शंकु को थोड़े स्वच्छ जल से गीला कर लीजिए। गीला कागज़ कीप से चिपक जाता है और उड़ेलते समय अपनी जगह पर टिका रहता है।
प्र2.
आपने क्या अवलोकन किया? क्या मिट्टी के कण फिल्टर-पत्र से छन कर जाते हैं?
उत्तर

नहीं, मिट्टी के कण छनकर नहीं जाते। वे फिल्टर-पत्र पर ही रुक जाते हैं। कीप से टपककर शंक्वाकार फ्लास्क में जो जल आता है वह स्वच्छ होता है।

फिल्टर-पत्र पर → मिट्टी …………… यही अवशेष है
शंक्वाकार फ्लास्क में → स्वच्छ जल … यही निस्यंद है
मटमैला जल फिल्टर-पत्र अवशेष (मिट्टी) पत्र पर रह जाती है कीप (फनल) शंक्वाकार फ्लास्क निस्यंद (एकत्रित स्वच्छ जल) स्टैंड
निस्यंदन — फिल्टर-पत्र अत्यंत सूक्ष्म छिद्रों वाली चालनी की तरह काम करता है। जल निकल जाता है; मिट्टी के बड़े कण नहीं निकल पाते और अवशेष के रूप में पत्र पर रह जाते हैं।
यह क्यों काम करता है: फिल्टर-पत्र में अत्यंत सूक्ष्म छिद्र होते हैं। छिद्र से छोटी हर चीज़ निकल जाती है; बड़ी हर चीज़ रुक जाती है। मिट्टी के कण आँख से न दिखने पर भी इन छिद्रों से कहीं बड़े होते हैं — इसलिए वे फँस जाते हैं और जल निकल जाता है।
क्या आप जानते हैं? फिल्टर-पत्र के अतिरिक्त कपास, चारकोल और रेत भी निस्यंदक के रूप में काम आते हैं। कौन-सा चुनें, यह हटाए जाने वाले कणों के आकार पर निर्भर करता है। चारकोल दुर्गंध और रंग भी हटा देता है।
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