प्र1.
पढ़ने के लिए — ‘स्वामिभक्त सुमुख’ (चित्रकथा, पृष्ठ 139–142)। पुराने समय में, महिंसक राज्य में जब सकुल नामक राजा का शासन था, चित्रकूट पर्वत पर एक गुफा में हंसों का बहुत बड़ा झुंड निवास करता था। एक दिन कुछ हंस आहार की तलाश में निकल पड़े… इस कथा को पढ़िए और समझिए।
उत्तर
कथा का सार —
- महिंसक राज्य में राजा सकुल का शासन था। चित्रकूट पर्वत की एक गुफा में हंसों का बड़ा झुंड रहता था। एक दिन कुछ हंस आहार की तलाश में निकले और उन्हें नगर के पास एक भव्य कमल-सरोवर दिखा, जिसका नाम था मानुसिय।
- हंसों के राजा मरालदेव और उनके मंत्री सुमुख — दोनों वहाँ जाने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि “जिस जगह का उपयोग मनुष्य करते हों, वहाँ जाना हमारे लिए सुरक्षित नहीं है।” पर टोली के आग्रह पर राजा मान गए।
- सरोवर पर शिकारी का जाल बिछा था। उतरते ही राजा मरालदेव के पाँव जाल में फँस गए। उन्होंने चिल्लाकर सबको सचेत नहीं किया — “अगर मैं अभी ही चिल्ला पड़ा तो मेरे साथी बिना कुछ चुगे ही उड़ जाएँगे।” वे चुपचाप प्रयास करते रहे, पर जितना खींचते, रस्सी उतनी ही कसती जाती।
- जब सब हंस चुग-खा चुके, तब उन्होंने संकट का संकेत दिया। पूरी टोली उड़ गई — केवल मंत्री सुमुख लौट आया और उसने राजा को घायल और लहूलुहान पाया।
- राजा ने उसे उड़ जाने की अनुमति दी, पर सुमुख ने कहा — “हे पक्षियों में श्रेष्ठ, संकट की इस घड़ी में आपके साथ रहना मेरा परम कर्तव्य है। मैं आपको इस स्थिति में छोड़ने की अपेक्षा आपके साथ मर जाना अधिक पसंद करूँगा।”
- आखेटक आया और प्रसन्न हुआ कि एक साथ दो हंस मिल गए। उसने पूछा कि मुक्त होते हुए भी सुमुख उड़ क्यों नहीं जाता। सुमुख ने विनती की — “महाराज को छोड़ दो और बदले में मुझे पकड़ लो। मैं इनके समान ही बड़ा और मोटा-ताजा हूँ, तुम्हें कोई हानि नहीं होगी।”
- सुमुख की स्वामिभक्ति से आखेटक का हृदय बदल गया। उसने बड़ी कोमलता से राजा के पाँव छुड़ाए और उनके जख्म धोकर साफ़ किए।
- दोनों हंस उसे पुरस्कार दिलाना चाहते थे, इसलिए उसके साथ राजा सकुल के पास गए। राजा ने उन्हें सोने के आसन पर बिठाया, शहद और मिसरी का प्रबंध कराया, पूरी कथा सुनी और आखेटक को घर, रथ, भरपूर सोना तथा एक लाख की आय की व्यवस्था दी।
- मरालदेव ने कहा — “यह सब मेरे सेनापति सुमुख की समझदारी और निष्ठा के कारण संभव हुआ। उसने मुझे बचाने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।” फिर राजा सकुल की अनुमति लेकर दोनों अपने झुंड में लौट आए।
कथा से क्या सीख मिलती है —
| पात्र | कौन-सा गुण | कहाँ दिखा |
|---|---|---|
| मरालदेव (हंसों का राजा) | अपने से पहले साथियों की चिंता | फँस जाने पर भी चुप रहे ताकि साथी भरपेट चुग लें |
| सुमुख (मंत्री/सेनापति) | स्वामिभक्ति, निष्ठा और साहस | अकेले लौटा और अपने प्राण देकर राजा को बचाने को तैयार हुआ |
| आखेटक | हृदय-परिवर्तन, करुणा | शिकार छोड़ दिया और घाव धोकर साफ़ किए |
| दोनों हंस | कृतज्ञता | अपने लिए नहीं, आखेटक को पुरस्कार दिलाने राजा के पास गए |
| राजा सकुल | उदारता और न्याय | अतिथि-सत्कार किया और उपकार का उचित पुरस्कार दिया |
कथा का मूल संदेश: यह हंसों से जुड़ी प्राचीन भारतीय पशु-कथाओं (जातक-परंपरा) की कथा है। इसका संदेश है — सच्ची निष्ठा कठोर से कठोर हृदय को भी बदल देती है। सुमुख ने न लड़ाई की, न छल किया; उसने केवल सौम्यता से, पर दृढ़ता से अपनी बात कही — और आखेटक का मन बदल गया।
करने योग्य: यह चित्रकथा है, इसलिए इसे कक्षा में नाटक की तरह पढ़िए — एक साथी मरालदेव, एक सुमुख, एक आखेटक, एक राजा सकुल और एक सूत्रधार बन जाए।