मल्हार अध्याय 10 पढ़ने के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पढ़ने के लिए — ‘स्वामिभक्त सुमुख’ (चित्रकथा, पृष्ठ 139–142)। पुराने समय में, महिंसक राज्य में जब सकुल नामक राजा का शासन था, चित्रकूट पर्वत पर एक गुफा में हंसों का बहुत बड़ा झुंड निवास करता था। एक दिन कुछ हंस आहार की तलाश में निकल पड़े… इस कथा को पढ़िए और समझिए।
उत्तर

कथा का सार —

  1. महिंसक राज्य में राजा सकुल का शासन था। चित्रकूट पर्वत की एक गुफा में हंसों का बड़ा झुंड रहता था। एक दिन कुछ हंस आहार की तलाश में निकले और उन्हें नगर के पास एक भव्य कमल-सरोवर दिखा, जिसका नाम था मानुसिय
  2. हंसों के राजा मरालदेव और उनके मंत्री सुमुख — दोनों वहाँ जाने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि “जिस जगह का उपयोग मनुष्य करते हों, वहाँ जाना हमारे लिए सुरक्षित नहीं है।” पर टोली के आग्रह पर राजा मान गए।
  3. सरोवर पर शिकारी का जाल बिछा था। उतरते ही राजा मरालदेव के पाँव जाल में फँस गए। उन्होंने चिल्लाकर सबको सचेत नहीं किया — “अगर मैं अभी ही चिल्ला पड़ा तो मेरे साथी बिना कुछ चुगे ही उड़ जाएँगे।” वे चुपचाप प्रयास करते रहे, पर जितना खींचते, रस्सी उतनी ही कसती जाती।
  4. जब सब हंस चुग-खा चुके, तब उन्होंने संकट का संकेत दिया। पूरी टोली उड़ गई — केवल मंत्री सुमुख लौट आया और उसने राजा को घायल और लहूलुहान पाया।
  5. राजा ने उसे उड़ जाने की अनुमति दी, पर सुमुख ने कहा — “हे पक्षियों में श्रेष्ठ, संकट की इस घड़ी में आपके साथ रहना मेरा परम कर्तव्य है। मैं आपको इस स्थिति में छोड़ने की अपेक्षा आपके साथ मर जाना अधिक पसंद करूँगा।”
  6. आखेटक आया और प्रसन्न हुआ कि एक साथ दो हंस मिल गए। उसने पूछा कि मुक्त होते हुए भी सुमुख उड़ क्यों नहीं जाता। सुमुख ने विनती की — “महाराज को छोड़ दो और बदले में मुझे पकड़ लो। मैं इनके समान ही बड़ा और मोटा-ताजा हूँ, तुम्हें कोई हानि नहीं होगी।”
  7. सुमुख की स्वामिभक्ति से आखेटक का हृदय बदल गया। उसने बड़ी कोमलता से राजा के पाँव छुड़ाए और उनके जख्म धोकर साफ़ किए।
  8. दोनों हंस उसे पुरस्कार दिलाना चाहते थे, इसलिए उसके साथ राजा सकुल के पास गए। राजा ने उन्हें सोने के आसन पर बिठाया, शहद और मिसरी का प्रबंध कराया, पूरी कथा सुनी और आखेटक को घर, रथ, भरपूर सोना तथा एक लाख की आय की व्यवस्था दी।
  9. मरालदेव ने कहा — “यह सब मेरे सेनापति सुमुख की समझदारी और निष्ठा के कारण संभव हुआ। उसने मुझे बचाने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।” फिर राजा सकुल की अनुमति लेकर दोनों अपने झुंड में लौट आए।

कथा से क्या सीख मिलती है —

पात्रकौन-सा गुणकहाँ दिखा
मरालदेव (हंसों का राजा)अपने से पहले साथियों की चिंताफँस जाने पर भी चुप रहे ताकि साथी भरपेट चुग लें
सुमुख (मंत्री/सेनापति)स्वामिभक्ति, निष्ठा और साहसअकेले लौटा और अपने प्राण देकर राजा को बचाने को तैयार हुआ
आखेटकहृदय-परिवर्तन, करुणाशिकार छोड़ दिया और घाव धोकर साफ़ किए
दोनों हंसकृतज्ञताअपने लिए नहीं, आखेटक को पुरस्कार दिलाने राजा के पास गए
राजा सकुलउदारता और न्यायअतिथि-सत्कार किया और उपकार का उचित पुरस्कार दिया
कथा का मूल संदेश: यह हंसों से जुड़ी प्राचीन भारतीय पशु-कथाओं (जातक-परंपरा) की कथा है। इसका संदेश है — सच्ची निष्ठा कठोर से कठोर हृदय को भी बदल देती है। सुमुख ने न लड़ाई की, न छल किया; उसने केवल सौम्यता से, पर दृढ़ता से अपनी बात कही — और आखेटक का मन बदल गया।
करने योग्य: यह चित्रकथा है, इसलिए इसे कक्षा में नाटक की तरह पढ़िए — एक साथी मरालदेव, एक सुमुख, एक आखेटक, एक राजा सकुल और एक सूत्रधार बन जाए।
प्र2.
पढ़ने के लिए — ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ (पृष्ठ 143)। “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा॥ सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला। वीरों को हरसाने वाला, मातृभूमि का तन मन सारा॥ … आओ प्यारे वीरो आओ, देश धर्म पर बलि बलि जाओ। एक साथ सब मिल कर गाओ, प्यारा भारत देश हमारा॥” —श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’
उत्तर

यह प्रसिद्ध झंडा गीत है, जिसे स्वतंत्रता-आंदोलन के समय कवि श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने रचा था। इसकी टेक — “झंडा ऊँचा रहे हमारा” — आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर गाई जाती है।

पद-दर-पद भाव —

पंक्तियाँभाव
“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा”टेक — हमारा तिरंगा पूरे विश्व में विजयी हो और सदा ऊँचा फहराता रहे।
“सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला”यह झंडा देखने वालों में शक्ति भरता है और प्रेम रूपी अमृत बहाता है।
“वीरों को हरसाने वाला, मातृभूमि का तन मन सारा”वीरों को हर्ष से भर देता है; यह केवल कपड़ा नहीं, मातृभूमि का तन-मन है।
“स्वतंत्रता के भीषण रण में, लख कर जोश बढ़े क्षण-क्षण में”स्वतंत्रता के कठिन संघर्ष में इसे देखते ही पल-पल जोश बढ़ता है।
“काँपें शत्रु देख कर मन में, मिट जावे भय संकट सारा”शत्रु इसे देखकर मन-ही-मन काँप उठता है और हमारा सारा भय मिट जाता है।
“इस झंडे के नीचे निर्भय, ले स्वराज्य यह अविचल निश्चय”इस झंडे के नीचे निडर होकर स्वराज्य लेने का अटल संकल्प लेते हैं।
“आओ प्यारे वीरो आओ, देश धर्म पर बलि बलि जाओ”वीरो, आओ — देश के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दो।
“इसकी शान न जाने पाये, चाहे जान भले ही जाये”झंडे की शान कम न हो, चाहे इसके लिए प्राण ही क्यों न देने पड़ें।

भाषा और शिल्प —

  • टेक की आवृत्ति: “झंडा ऊँचा रहे हमारा / विजयी विश्व तिरंगा प्यारा” हर पद के बाद दोहराई जाती है — इसी से यह समूह में गाने योग्य बनता है।
  • अनुप्रास:िजयी िश्व”, “लि लि”, “दा क्ति… रसाने”।
  • रूपक/मानवीकरण: झंडा शक्ति ‘बरसाता’ है, प्रेम-सुधा ‘सरसाता’ है और वीरों को ‘हरसाता’ है — निर्जीव झंडे को सजीव की तरह दिखाया गया है।
  • तुकांत: वाला-वाला-वाला-सारा, रण में-क्षण में-मन में-सारा — तीन पंक्तियों की एक ही तुक, फिर चौथी पंक्ति टेक से जुड़ जाती है।
पाठ से जोड़िए: मीरा के पद और यह झंडा गीत — दोनों गाए जाने के लिए रचे गए हैं। दोनों में एक टेक है जो बार-बार लौटती है, दोनों में छोटी-छोटी तुकांत पंक्तियाँ हैं और दोनों में गहरा समर्पण-भाव है — एक में प्रभु के प्रति, दूसरे में मातृभूमि के प्रति।
करने योग्य: प्रार्थना-सभा में यह गीत समूह में गाइए। कुछ शब्द आज कम प्रयोग होते हैं — सुधा (अमृत), सरसाना (बहाना/भर देना), हरसाना (हर्ष से भर देना), लख कर (देखकर), अविचल (अटल), प्रण (प्रतिज्ञा) — गाने से पहले इनके अर्थ जान लीजिए।
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