मल्हार अध्याय 2 आपकी बात

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
लोककथा में तीन भाइयों की पैनी दृष्टि की बात कही गई है। क्या आपने कभी अपनी पैनी दृष्टि का प्रयोग किसी समस्या को हल करने के लिए किया है? उस समस्या और आपके द्वारा दिए गए हल के विषय में लिखिए।
उत्तर

यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है। उत्तर लिखते समय तीन बातें अवश्य आनी चाहिए — समस्या क्या थी, आपने क्या देखा और उस देखने से हल कैसे निकला

नमूना उत्तर: हमारे घर में एक दिन सुबह से ही पानी की टंकी ख़ाली मिलने लगी, जबकि मोटर रोज़ की तरह चल रही थी। सब कहने लगे कि मोटर ख़राब हो गई है। मैंने ध्यान से देखा तो पाया कि आँगन की दीवार के पास की मिट्टी हमेशा गीली रहती है, जबकि वहाँ कोई नल नहीं है। मैंने पिताजी को बताया। खुदाई करने पर पता चला कि ज़मीन के नीचे की पाइप में दरार थी और सारा पानी वहीं बह रहा था। मोटर बिलकुल ठीक थी। यदि मैंने गीली मिट्टी पर ध्यान न दिया होता तो हम बेकार में मोटर बदलवा देते।

अपना उत्तर लिखने के लिए ये संकेत मदद करेंगे:

  • घर में कोई वस्तु खो जाना और आपका उसे किसी छोटे सुराग़ से ढूँढ़ लेना।
  • साइकिल का बार-बार पंक्चर होना और आपका टायर में फँसा काँच खोज लेना।
  • कक्षा में किसी साथी का चुपचाप उदास होना और आपका उसका कारण भाँप लेना।
  • गणित के प्रश्न में सबकी उत्तर ग़लत आना और आपका यह पकड़ लेना कि प्रश्न में इकाई (किलो/ग्राम) बदली हुई थी।
प्र2.
लोककथा में बताया गया है कि भाइयों ने “बचपन से हर वस्तु पर ध्यान देने की आदत डाली।” यदि आपने ऐसा किया है तो आपको अपने जीवन में इसके क्या-क्या लाभ मिलते हैं?
उत्तर

ध्यान देने की आदत के लाभ रोज़मर्रा के जीवन में साफ़ दिखते हैं —

कहाँलाभ
पढ़ाई मेंप्रश्न ध्यान से पढ़ने पर उत्तर ग़लत नहीं होता; शिक्षक की कही बात एक ही बार में याद रह जाती है।
घर मेंचीज़ें कहाँ रखी हैं यह याद रहता है, इसलिए ढूँढ़ने में समय नहीं जाता।
सुरक्षा मेंसड़क पार करते समय, गैस की गंध पर, बिजली के खुले तार पर ध्यान जाता है — दुर्घटना टल जाती है।
रिश्तों मेंमाँ की थकान या मित्र की उदासी बिना कहे समझ आ जाती है, और हम समय पर सहायता कर पाते हैं।
स्वभाव मेंजल्दबाज़ी घटती है, धैर्य बढ़ता है; निर्णय अनुमान से नहीं, प्रमाण से लिए जाते हैं।
नमूना उत्तर: मैंने अपनी कक्षा-पुस्तिका और बस्ते पर ध्यान देने की आदत डाली है। रोज़ रात को समय-सारणी देखकर बस्ता लगाता हूँ। इससे मेरी कोई पुस्तक छूटती नहीं और गृहकार्य कभी अधूरा नहीं रहता। इसी आदत के कारण एक बार मैंने देखा कि परीक्षा की तिथि सूचनापट्ट पर बदल दी गई है, जबकि मेरे कई साथी पुरानी तिथि ही मान रहे थे — मेरे बताने पर सबने समय रहते तैयारी कर ली।
पाठ से जोड़िए: भाइयों की यह शक्ति जन्मजात नहीं थी। उन्होंने कहा — “हमने … बहुत समय लगाया है।” यानी यह आदत रोज़ के अभ्यास से बनती है, और तभी लाभ भी रोज़ मिलता है।
प्र3.
लोककथा में भाइयों को यात्रा करते समय अनेक कठिनाइयाँ आईं, जैसे— भूख, थकान और पैरों में छाले। आप अपने दैनिक जीवन में किन-किन कठिनाइयों का सामना करते हैं? लिखिए।
उत्तर

यह अपने जीवन के बारे में लिखने का प्रश्न है। ईमानदारी से लिखिए — कठिनाई बताइए, और साथ में यह भी कि आप उससे कैसे निपटते हैं।

कठिनाईउससे निपटने का उपाय
विद्यालय दूर होना, पैदल या भीड़ भरी बस में जानाजल्दी उठना, साथियों के साथ समूह में जाना
समय कम पड़ना — पढ़ाई, घर के काम और खेल एक साथएक छोटी समय-सारणी बनाना और सबसे कठिन काम पहले करना
बिजली चले जाना, पढ़ने में बाधादिन के उजाले में पढ़ाई का बड़ा भाग निपटा लेना
कोई विषय कठिन लगनाशिक्षक या साथी से पूछने में संकोच न करना
वर्षा या कड़ी धूप में आना-जानाबस्ते में छाता रखना, पानी की बोतल साथ रखना
नमूना उत्तर: मुझे रोज़ तीन किलोमीटर पैदल चलकर विद्यालय आना पड़ता है। गरमियों में धूप और वर्षा में कीचड़ बहुत परेशान करते हैं और कई बार जूते भीग जाते हैं। पर मैंने अपने मुहल्ले के चार साथियों के साथ मिलकर एक समूह बना लिया है — हम साथ निकलते हैं, बातें करते हुए रास्ता कट जाता है और कोई पीछे छूट जाए तो सब रुक जाते हैं। कथा के भाइयों की तरह मैंने भी समझ लिया है कि थकान से रुकना नहीं है — “वे आराम करने के लिए रुके और पुन: आगे चल दिए।”
प्र4.
भाइयों ने बिना देखे ही ऊँट के बारे में सही-सही बातें बताईं। क्या आपको लगता है कि अनुभव और समझ से देखे बिना भी सही निर्णय लिया जा सकता है? क्या आपने भी कभी ऐसा किया है?
उत्तर

हाँ, लिया जा सकता है — पर एक शर्त पर। निर्णय ‘बिना देखे’ ज़रूर हो सकता है, पर ‘बिना प्रमाण के’ नहीं। भाइयों ने ऊँट नहीं देखा था, लेकिन उन्होंने चिह्न, घास और निशान देखे ज़रूर थे। यानी उनका अनुमान प्रमाण पर टिका था, कल्पना पर नहीं।

सही अनुमानख़तरनाक अनुमान
देखे हुए चिह्नों पर आधारित — “घास एक ओर की चरी है, अत: वह एक आँख से नहीं देखता।”बिना किसी प्रमाण के — “ये तीन अजनबी हैं, अत: चोर होंगे।”
ग़लत निकलने पर बदला जा सकता हैव्यक्ति उस पर अड़ जाता है, जैसे ऊँट का स्वामी अड़ गया
परिणाम — निर्दोष बच गएपरिणाम — निर्दोष लगभग दंड पा गए
नमूना उत्तर: एक बार मेरी छोटी बहन खेलते-खेलते चुप हो गई और खाना छोड़ दिया। मैंने उसका माथा छुए बिना ही समझ लिया कि उसे बुख़ार है, क्योंकि उसकी आँखें भारी थीं, वह बार-बार लेटने जा रही थी और उसने अपनी सबसे प्रिय गुड़िया भी नहीं उठाई। मैंने माँ को बता दिया। थर्मामीटर लगाने पर सचमुच बुख़ार निकला। मैंने ‘देखा’ बुख़ार नहीं था, पर तीन छोटी बातें देखी थीं — और तीनों एक ही ओर संकेत कर रही थीं।
सावधानी: जब बात किसी व्यक्ति के चरित्र की हो — जैसे कोई चोर है या नहीं — तब केवल अनुमान से निर्णय कभी नहीं लेना चाहिए। कथा में यही भूल ऊँट के स्वामी ने की थी।
प्र5.
जब ऊँट के स्वामी ने भाइयों पर शंका की तो भाइयों ने बिना गुस्सा किए शांति से उत्तर दिया। क्या आपको लगता है कि कभी किसी को संदेह होने पर हमें भी शांत रहकर उत्तर देना चाहिए? क्या आपने कभी ऐसी स्थिति का सामना किया है? ऐसे में आपने क्या किया?
उत्तर

हाँ, शांत रहकर उत्तर देना ही सही है — और कथा इसका कारण भी दिखाती है।

  • ग़ुस्सा करने से आरोप लगाने वाले को लगता है कि आप कुछ छिपा रहे हैं। शांत उत्तर से आपकी बात सुनी जाती है।
  • ग़ुस्से में तर्क भूल जाते हैं। भाई शांत रहे, इसीलिए वे राजा के सामने अपने सारे कारण क्रम से रख सके — पैरों के चिह्न, घास, जूतों के निशान।
  • बात बढ़ने से झगड़ा हो जाता। तलवार निकले होने पर भी भाइयों ने केवल इतना कहा — “हम चोर नहीं हैं, हमने इसका ऊँट कभी नहीं देखा।”
  • अंत में शांति ही जीती — राजा ने उन्हें निर्दोष माना और दरबार में स्थान दिया।
नमूना उत्तर: एक बार कक्षा में मेरे बगल वाले साथी की क़लम खो गई और उसने सबके सामने कह दिया कि मैंने ले ली है। पहले तो मुझे बहुत ग़ुस्सा आया, पर मैंने चिल्लाने के बजाय शांति से कहा — “मेरा बस्ता तुम स्वयं देख लो।” बस्ता देखने पर क़लम नहीं मिली। फिर मैंने उससे पूछा कि उसने आख़िरी बार क़लम कहाँ रखी थी। ढूँढ़ने पर क़लम उसकी अपनी पुस्तक के पन्नों के बीच मिल गई। उसने मुझसे क्षमा माँगी। यदि मैं उस दिन झगड़ पड़ता तो सच्चाई शायद कभी सामने न आती।
पर एक बात जोड़िए: शांत रहने का अर्थ चुप रह जाना नहीं है। भाई चुप नहीं रहे — उन्होंने अपनी बात स्पष्ट कही, कारण बताए और परीक्षा देने को तैयार हुए। शांति + स्पष्टता, यही सही मिश्रण है।
प्र6.
राजा ने भाइयों की बुद्धिमानी देखकर बहुत आश्चर्य व्यक्त किया। क्या आपको कभी किसी की सोच, समझ या किसी विशेष कौशल को देखकर आश्चर्य हुआ है? क्या आपने कभी किसी से कुछ ऐसा सीखा है जो आपके लिए बिलकुल नया और चौंकाने वाला हो?
उत्तर

यह अपने अनुभव का प्रश्न है। सोचिए — आपके आस-पास ऐसा कौन है जो कोई काम असाधारण ढंग से करता है? बहुत बार ऐसे लोग हमारे बिलकुल पास होते हैं और हम उन पर ध्यान नहीं देते।

  • कुम्हार, जो चाक पर बिना नापे एक जैसे घड़े बना देता है।
  • बुनकर या दर्जी, जो कपड़े को देखकर ही नाप बता देता है।
  • किसान, जो बादल और हवा देखकर वर्षा का अनुमान लगा लेता है।
  • मोटर मरम्मत करने वाला, जो केवल आवाज़ सुनकर बता देता है कि ख़राबी कहाँ है।
  • दादी, जो बिना घड़ी देखे परछाईं से समय बता देती हैं।
नमूना उत्तर: हमारे मुहल्ले में एक साइकिल ठीक करने वाले चाचा हैं। एक दिन मेरी साइकिल से अजीब-सी खट-खट आ रही थी। मैंने साइकिल उनके पास खड़ी ही की थी कि उन्होंने बिना खोले कहा — “पिछले पहिये की एक तीली ढीली है।” मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। पूछने पर उन्होंने बताया कि ढीली तीली की आवाज़ पहिये के घूमने की गति के साथ बदलती है, जबकि चेन की आवाज़ लगातार एक-सी रहती है। उस दिन मैंने सीखा कि सुनना भी देखने जितना ही बड़ा प्रमाण है — ठीक वैसे ही जैसे कथा के बड़े भाई ने पेटी के अंदर गोल वस्तु के लुढ़कने की ध्वनि सुनी थी।
प्र7.
लोककथा में पिता ने अपने बेटों को यह सलाह दी कि वे समझ और ज्ञान जमा करें। क्या आपको कभी किसी बड़े व्यक्ति से ऐसी कोई सलाह मिली है जो आपके जीवन में उपयोगी रही हो? क्या आप भी अपने अनुभव से किसी को ऐसी सलाह देंगे?
उत्तर

इस प्रश्न के दो भाग हैं — पहले वह सलाह लिखिए जो आपको मिली और वह कब काम आई; फिर वह सलाह लिखिए जो आप किसी छोटे को देंगे।

किसने दीसलाहवह कैसे काम आई
दादाजी“जो काम आज करना है, आज ही कर लो।”परीक्षा से पहले घबराहट नहीं होती, क्योंकि पाठ पहले ही तैयार रहते हैं।
माँ“जो न आए, उसे पूछ लो; पूछने में शर्म नहीं।”कठिन विषय पीछे नहीं छूटता।
शिक्षक“प्रश्न दो बार पढ़ो, उत्तर एक बार लिखो।”आधे से अधिक ग़लतियाँ अपने आप कम हो गईं।
नमूना उत्तर: मेरी दादी हमेशा कहती हैं — “सुनो सबकी, करो मन की, पर सोच-समझकर।” पहले मुझे यह बात केवल कहावत लगती थी। एक बार मेरे कुछ साथी मुझे स्कूल छोड़कर मेला देखने चलने को कह रहे थे। मैंने दादी की बात याद की, दो पल रुककर सोचा और मना कर दिया। उस दिन कक्षा में गणित का महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया गया, जो आगे परीक्षा में आया। अब मैं अपने छोटे भाई को यही सलाह देता हूँ — “कोई भी काम करने से पहले एक मिनट रुककर सोच लो कि इसका परिणाम क्या होगा।” कथा के पिता की सलाह भी ऐसी ही थी — तुरंत काम आने वाली नहीं, पर जीवन भर काम आने वाली।
प्र8.
भाइयों ने अपने ऊपर लगे आरोपों के होते हुए भी सदा सच्चाई का साथ दिया। क्या आपको लगता है कि सदा सच बोलना महत्वपूर्ण है, भले ही स्थिति कठिन क्यों न हो? क्या आपको किसी समय ऐसा लगा है कि आपकी सच्चाई ने आपको समस्याओं से बाहर निकाला हो?
उत्तर

हाँ, सच बोलना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है — और कथा इसे प्रमाणित करती है।

  • भाइयों पर तलवार तनी थी, राजा ने “चोरो” कहकर धमकाया, फिर भी उन्होंने एक ही बात कही — “हमने इसका ऊँट कभी नहीं देखा।” उनका उत्तर आरंभ से अंत तक एक-सा रहा।
  • झूठ बोलने वाले को हर बार नई कहानी गढ़नी पड़ती है और कहीं-न-कहीं वह पकड़ी जाती है। सच बोलने वाले को कुछ याद नहीं रखना पड़ता।
  • सच के साथ प्रमाण जुड़ जाए तो वह और मज़बूत हो जाता है — पेटी खुली और भाइयों की बात अपने आप सिद्ध हो गई।
  • अंत में सच ने केवल बचाया ही नहीं, सम्मान भी दिलाया — राजा ने उन्हें अपने दरबार में रख लिया।
नमूना उत्तर: एक बार खेलते समय मेरी गेंद से घर की खिड़की का काँच टूट गया। कोई देख नहीं रहा था और मैं चुपचाप निकल सकता था। पर मैंने माँ को स्वयं जाकर बता दिया। माँ ने डाँटा तो सही, पर बात वहीं समाप्त हो गई। बाद में पिताजी ने कहा कि यदि मैं छिपाता तो सज़ा दुगुनी मिलती — एक काँच तोड़ने की, दूसरी झूठ बोलने की। उस दिन मुझे समझ आया कि सच बोलने से मुसीबत छोटी हो जाती है, बड़ी नहीं।
ध्यान दीजिए: कथा में सच अकेला काम नहीं आया — सच के साथ धैर्य और प्रमाण भी थे। यदि भाई सच बोलकर चुप बैठ जाते और अपने कारण न बताते तो शायद उनकी बात मानी ही न जाती।
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