प्र1.
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए— (क) यदि राजा ने बिना जाँच के भाइयों को दोषी ठहरा दिया होता तो इस लोककथा का क्या परिणाम होता?
उत्तर
तब यह कथा बुद्धि की कथा न रहकर अन्याय की कथा बन जाती। संभावित परिणाम —
- तीनों निर्दोष भाई चोरी के झूठे आरोप में दंड पाते — कारागार, कोड़े या देश-निकाला।
- ऊँट फिर भी न मिलता, क्योंकि वह तो दूसरी दिशा में था। घुड़सवार की पत्नी और बच्चे की खोज भी वहीं रुक जाती — भाइयों ने जो दिशा बताई थी, वही एकमात्र सुराग़ थी।
- राजा की बुद्धिमत्ता कभी प्रकट न होती; कच्चे अनार वाली परीक्षा होती ही नहीं और पाठकों को भाइयों के तर्क कभी सुनने को न मिलते।
- प्रजा में यह संदेश जाता कि इस राज्य में शक ही सज़ा है — लोग सच बोलने से भी डरने लगते।
- कथा की सीख उलट जाती — “अपनी बुद्धि दिखाओगे तो फँसोगे।” जबकि असली कथा कहती है कि बुद्धि और सच्चाई अंत में बचा लेती है।
इसीलिए जाँच ज़रूरी है: इस कल्पना से समझ आता है कि न्याय में एक क़दम रुककर परखना कितना क़ीमती है। राजा ने वह एक क़दम लिया — इसीलिए तीन निर्दोष बच गए।