प्र1.
इस लोककथा में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे स्तंभ 1 में दिए गए हैं। उनके भाव या अर्थ से मिलते-जुलते वाक्य स्तंभ 2 में दिए गए हैं। स्तंभ 1 के वाक्यों को स्तंभ 2 के उपयुक्त वाक्यों से सुमेलित कीजिए— स्तंभ 1: 1. कुछ समय पश्चात् पिता चल बसे। 2. हम कहीं भी क्यों न हों, भूखे नहीं मरेंगे। 3. घुड़सवार ने तीनों भाइयों को शंका की दृष्टि से देखा। 4. बचपन से ही हमें ऐसी आदत पड़ गई है कि हम कुछ भी अपनी दृष्टि से नहीं चूकने देते। 5. लोगों के आश्चर्य का कोई ठिकाना न था। स्तंभ 2: 1. घोड़े पर सवार व्यक्ति ने तीनों भाइयों को अविश्वास से देखा। 2. थोड़े समय के बाद पिता का देहांत हो गया। 3. लोग इतने अचंभित थे कि उनका आश्चर्य व्यक्त करना कठिन था। 4. बचपन से ही हमें आदत हो गई है कि हम हर छोटी-बड़ी वस्तु पर ध्यान अवश्य देते हैं। 5. हम चाहे जहाँ भी हों, हमें खाने के लिए कुछ न कुछ मिल ही जाएगा।
उत्तर
| स्तंभ 1 (पाठ का वाक्य) | स्तंभ 2 (मिलता-जुलता वाक्य) | मिलान का आधार |
|---|---|---|
| 1. कुछ समय पश्चात् पिता चल बसे। | 2. थोड़े समय के बाद पिता का देहांत हो गया। | चल बसना = देहांत हो जाना, मृत्यु हो जाना। दोनों वाक्य एक ही बात कहते हैं, एक मुहावरे में और दूसरा सीधे शब्दों में। |
| 2. हम कहीं भी क्यों न हों, भूखे नहीं मरेंगे। | 5. हम चाहे जहाँ भी हों, हमें खाने के लिए कुछ न कुछ मिल ही जाएगा। | भाइयों का आत्मविश्वास — मेहनत करने वाले को कहीं भी रोटी मिल जाती है (“हम चरवाहों या खेत में श्रमिकों का काम कर लेंगे”)। |
| 3. घुड़सवार ने तीनों भाइयों को शंका की दृष्टि से देखा। | 1. घोड़े पर सवार व्यक्ति ने तीनों भाइयों को अविश्वास से देखा। | घुड़सवार = घोड़े पर सवार व्यक्ति; शंका की दृष्टि = अविश्वास की नज़र। दोनों में शब्द बदले हैं, भाव वही है। |
| 4. बचपन से ही हमें ऐसी आदत पड़ गई है कि हम कुछ भी अपनी दृष्टि से नहीं चूकने देते। | 4. बचपन से ही हमें आदत हो गई है कि हम हर छोटी-बड़ी वस्तु पर ध्यान अवश्य देते हैं। | दृष्टि से न चूकने देना = हर वस्तु पर ध्यान देना। यही भाइयों की मूल विशेषता है। |
| 5. लोगों के आश्चर्य का कोई ठिकाना न था। | 3. लोग इतने अचंभित थे कि उनका आश्चर्य व्यक्त करना कठिन था। | ठिकाना न होना = सीमा न रहना, बहुत अधिक होना। यह भी एक मुहावरा है। |
संक्षेप में मिलान: 1 → 2, 2 → 5, 3 → 1, 4 → 4, 5 → 3.
यह अभ्यास क्या सिखाता है: एक ही बात दो तरह से कही जा सकती है — मुहावरेदार भाषा में (चल बसे, ठिकाना न था) और सीधी भाषा में (देहांत हो गया, बहुत अचंभित थे)। लोककथा में मुहावरे आते हैं क्योंकि वह बोलकर सुनाई जाती थी और मुहावरे बात को छोटा तथा असरदार बना देते हैं।