मल्हार अध्याय 5 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए— (क) “मैंने सोचा बीमार पड़ने के लिए आज का दिन बिलकुल ठीक रहेगा। चलो बीमार पड़ जाते हैं।”
उत्तर

भाव: बच्चा बीमारी को कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक ऐसा काम मान रहा है जिसे वह जब चाहे “कर” सकता है — जैसे कोई खेल चुनता हो। “चलो बीमार पड़ जाते हैं” कहने का ढंग वैसा ही है जैसे कोई कहे “चलो पतंग उड़ाते हैं।”

क्यों उसे “आज का दिन बिलकुल ठीक” लगा: उस दिन उसका स्कूल जाने का मन नहीं था, गृहकार्य भी नहीं किया था और सजा मिलना तय था। यानी बहाने का लाभ उस दिन सबसे ज्यादा था।

भाषा का कमाल: यहाँ लेखक ने हास्य पैदा किया है — बीमारी अपने आप आती है, कोई उसे तय करके नहीं ले सकता। इस उल्टी बात को सहज बोलचाल के ढंग में कहकर लेखक बच्चे के भोलेपन पर हँसी ले आता है। यही आगे की पूरी कहानी की नींव भी है।
सीख: बच्चा यह नहीं सोच पाया कि बीमारी के साथ जो “ठाठ” वह देख रहा था, उसके साथ तकलीफ भी आती है। कल्पना में हमें केवल अच्छी बातें दिखती हैं, कीमत नहीं दिखती।
प्र2.
(ख) “देखो! उन्होंने एक बार भी आकर नहीं पूछा कि तू क्या खाएगा? पूछते तो मैं साबूदाने की खीर ही तो माँगता। कोई ताजमहल तो नहीं माँग लेता। लेकिन नहीं! भूखे रहो!! इससे सारे विकार निकल जाएँगे। विकार निकल जाएँ बस। चाहे इस चक्कर में तुम खुद शिकार हो जाओ।”
उत्तर

भाव: यह बच्चे का भूख, झुँझलाहट और अकेलेपन से भरा मन-ही-मन का शिकवा है। उसे लग रहा है कि घर वालों ने उसकी भूख की परवाह ही नहीं की। उसकी माँग बहुत छोटी थी — सिर्फ साबूदाने की खीर — पर वह भी नहीं मिली।

पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ:

  • “कोई ताजमहल तो नहीं माँग लेता” — यानी मैंने कोई असंभव या बहुत बड़ी चीज नहीं माँगी थी। यहाँ ताजमहल अतिशयोक्ति के रूप में आया है, जो बात को मजेदार बना देता है।
  • “विकार निकल जाएँ बस। चाहे इस चक्कर में तुम खुद शिकार हो जाओ।” — यह नानाजी के उस उपदेश पर व्यंग्य है कि “तबियत ढीली हो तो सबसे अच्छा उपाय है भूखे रहना।” बच्चा कहना चाहता है कि विकार निकालते-निकालते कहीं रोगी ही न निकल जाए।
शब्दों का खेल: ‘विकार’ और ‘शिकार’ — तुक मिलते दो शब्दों को आमने-सामने रखकर लेखक ने कहन को चुटीला बना दिया है। यही स्वयं प्रकाश की भाषा की विशेषता है — साधारण शिकायत भी हँसा देती है।
ध्यान दें: पाठक जानता है कि बच्चा बीमार है ही नहीं। इसलिए उसका यह शिकवा हमें दया से ज्यादा हँसी देता है — उसने यह मुसीबत खुद बुलाई है।
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