मल्हार अध्याय 5 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ को एक बार फिर ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए— (क) अस्पताल में बच्चे को कौन-कौन सी चीजें अच्छी लगीं और क्यों?
उत्तर

अस्पताल बच्चे के लिए बिलकुल नया अनुभव था — “अस्पताल जाने का यह मेरा पहला अवसर था।” वहाँ उसे ये चीजें अच्छी लगीं —

जो अच्छा लगाकहानी की पंक्तिक्यों अच्छा लगा
सफाई और व्यवस्था“एक जैसे पलंग लाइन से लगे हुए थे… सफेद दीवारें, ऊँची छत… फर्श एकदम चमकता हुआ।”हर चीज करीने से लगी थी — घर की भीड़-भाड़ से बिलकुल अलग।
खिड़कियों के बाहर हरे पेड़“बड़ी-बड़ी खिड़कियों के पास हरे-हरे पेड़ झूम रहे थे।”दृश्य सुंदर और ताजा लगा।
शोर, धूल और मच्छर-मक्खी का न होना“न ट्रैफिक का शोरगुल, न धूल, न मच्छर-मक्खी…।”उसकी गली इन्हीं सबसे भरी रहती थी।
शांति और धीमी गुनगुन“सिर्फ लोगों के धीरे-धीरे बातचीत करने की धीमी-धीमी गुनगुन। बाकी एकदम शांति।”ऐसी शांति उसने पहले कहीं महसूस नहीं की थी।
बीमार की सेवा और साबूदाने की खीर“नानीजी ने चम्मच से धीरे-धीरे काका को साबूदाने की खीर खिलाई।”बीमार होना उसे लाड़ पाने और स्वादिष्ट खाना पाने जैसा लगा।
असली कारण: बच्चे को अस्पताल इसलिए अच्छा लगा क्योंकि उसने वहाँ केवल ऊपरी दृश्य देखा — बीमारी की तकलीफ नहीं देखी। इसी अधूरे देखने से उसके मन में यह भ्रम बना कि “क्या ठाठ हैं बीमारों के भी।”
प्र2.
(ख) कहानी के अंत में बच्चे को महसूस हुआ कि उसे स्कूल जाना चाहिए था। क्या आपको लगता है कि उसका निर्णय सही था? क्यों?
उत्तर

हाँ, उसका निर्णय बिलकुल सही था। झूठा बहाना बनाकर स्कूल से बचने की कोशिश ने उसे फायदा नहीं, नुकसान ही दिया।

  • दिनभर की ऊब — “चाहे जितनी ऊब हो, लेटे ही रहना था।”
  • भूख — उसे कड़वी पुड़िया और काढ़े जैसी चाय मिली, खाना नहीं। “उस पूरे दिन मुझे भूखे पेट ही रहना पड़ा।”
  • अकेलापन — “अब घर में मैं अकेला रह गया।” मुन्नू भी उसे देखने नहीं आया।
  • काम फिर भी बाकी — “और आज दिया गया होमवर्क! किससे कॉपी माँगोगे?” — जिस गृहकार्य से भागा था, वह और बढ़ गया।

स्कूल जाता तो अधिक-से-अधिक एक दिन की सजा मिलती — “सजा मिलती तो मिल जाती” — पर उसे दोस्त, पढ़ाई, रिसेस और ठेले के नमक-मिर्च वाले अमरूद मिलते।

असली सीख: बहाना समस्या को टालता है, हल नहीं करता। जिस काम से हम भागते हैं, वह अगले दिन और बड़ा होकर सामने खड़ा हो जाता है।
प्र3.
(ग) जब बच्चा बीमार पड़ने का बहाना बनाकर बिस्तर पर लेटा रहा तो उसके मन में कौन-कौन से भाव आ रहे थे? (संकेत— मन में उत्पन्न होने वाले विकार या विचार को भाव कहते हैं, उदाहरण के लिए — क्रोध, दुख, भय, करुणा, प्रेम आदि।)
उत्तर

पूरे दिन उसके मन में भाव लगातार बदलते रहे — यही कहानी को रोचक बनाता है।

भावकहानी का प्रमाण
उत्सुकता / कौतूहल“मुझे बड़ी तेज इच्छा हुई कि… अपनी गली की चहल-पहल देखूँ।”
ऊब (उकताहट)“यह तो अच्छी खासी बोरियत हो गई। पूरा दिन कोई कैसे लेटा रहे?”
भूख से उपजी बेचैनी“गरमागरम खस्ता कचौड़ी… मावे की बर्फी… और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर!”
अकेलापन और उपेक्षा का दुख“मुन्नू एक बार भी मुझे देखने नहीं आया।”
शिकायत / झुँझलाहट“उन्होंने एक बार भी आकर नहीं पूछा कि तू क्या खाएगा?”
ईर्ष्या (जलन)“लेकिन मुन्नू आम चूस रहा था। आम! इस मौसम में!… भुक्कड़ कहीं का।”
क्रोध और कुढ़न“मैं जलन, गुस्से और कुढ़न में पाँव पटकता वापस बिस्तर में आ गया।”
पछतावा“अक्लमन्द! और बनो बीमार।” तथा अंत में — “बीमारी का बहाना कभी नहीं बनाया।”
रुलाई / रुआँसापन“मैं रुआँसा हो गया।”
क्रम पर ध्यान दीजिए: उत्साह → ऊब → भूख → जलन → पछतावा। यह भावों की यात्रा ही बताती है कि बच्चे की सोच दिनभर में कैसे बदल गई।
प्र4.
(घ) कहानी में बच्चे ने सोचा था कि “ठाठ से साफ-सुथरे बिस्तर पर लेटे रहो और साबूदाने की खीर खाते रहो।” आपको क्या लगता है, असल में बीमार हो जाने और इस बच्चे की सोच में कौन-कौन सी समानताएँ और अंतर होंगे? (संकेत — आप अपने अनुभवों के आधार पर इस प्रश्न पर विचार कर सकते हैं कि कहानी वाले बच्चे की कल्पना वास्तविकता से कितनी अलग है।)
उत्तर

बच्चे की कल्पना और सच्ची बीमारी में कुछ बातें मिलती हैं, पर बड़ा हिस्सा अलग है।

समानताएँ

  • दोनों में बिस्तर पर लेटे रहना पड़ता है और स्कूल नहीं जाना पड़ता।
  • दोनों में घर वाले ध्यान रखते हैं, दवा देते हैं और हालचाल पूछते हैं।
  • दोनों में हल्का, सादा भोजन (जैसे साबूदाने की खीर, खिचड़ी) दिया जाता है।

अंतर

बच्चे की सोचअसली बीमारी
आराम और मजादर्द, कमजोरी और बेचैनी
स्वाद लेकर खीर खानाभूख ही नहीं लगती; मुँह का स्वाद बिगड़ जाता है
मीठी दवाएँकड़वी पुड़िया, काढ़ा, इंजेक्शन, जाँचें
जब चाहे उठ जानाउठने-बैठने तक की ताकत न होना
दिनभर की छुट्टीपढ़ाई पिछड़ जाना और बाद में दुगुनी मेहनत
घर वालों का लाड़घर वालों की चिंता, खर्च और परेशानी
बच्चे की कल्पना क्यों अधूरी थी: उसने अस्पताल में सुधाकर काका को केवल कुछ मिनटों के लिए देखा था — तब वे लेटे हुए, खीर खाते हुए दिख रहे थे। उनकी रात की तकलीफ, दवाओं का कड़वापन या ठीक होने का लंबा इंतजार उसने नहीं देखा। अधूरा देखना ही गलत निष्कर्ष का कारण बनता है।
प्र5.
(ङ) नानीजी और नानाजी ने बच्चे को बीमारी की दवा दी और उसे आराम करने को कहा। बच्चे को खाना नहीं दिया गया। क्या आपको लगता है कि उन्होंने सही किया? आपको ऐसा क्यों लगता है?
उत्तर

इस प्रश्न के दोनों पक्ष कहे जा सकते हैं। नीचे दोनों दिए हैं और अंत में सबसे संतुलित उत्तर।

हाँ, उन्होंने सही किया —

  • बच्चे ने खुद कहा था कि उसे सिरदर्द, पेटदर्द और बुखार है। पेट खराब होने पर हल्का उपवास पुराना घरेलू उपाय है — “तबियत ढीली हो तो सबसे अच्छा उपाय है भूखे रहना।”
  • नानाजी ने पहले जाँच की — माथा छुआ, पेट देखा, नब्ज देखी। यानी बिना देखे कुछ नहीं किया।
  • उन्होंने दवा दी और “शाम को देखेंगे” कहकर निगरानी भी तय की।

नहीं, इसमें कमी थी —

  • बच्चे को पूरे दिन बिलकुल भूखा रखना ठीक नहीं। बीमार बच्चे को भी थोड़ा तरल — दूध, दाल का पानी, नीबू-नमक का घोल — देना चाहिए।
  • थर्मामीटर न मिलने पर भी डॉक्टर को दिखाया जा सकता था।
  • दिनभर उसका मन बहलाने कोई पास नहीं बैठा; अकेलापन भी एक तकलीफ है।
संतुलित उत्तर: नानाजी-नानीजी की नीयत पूरी तरह सही थी — उन्होंने जाँचा, दवा दी, आराम कराया और दोबारा देखने की बात कही। पर तरीका आज के हिसाब से पूरा नहीं था: बुखार न मिलने पर भी पूरा दिन भूखा रखना जरूरी नहीं था। मजे की बात यह है कि बच्चा बीमार था ही नहीं — इसलिए यही “कठोर” इलाज उसके लिए सबसे बड़ी सजा और सबसे अच्छी सीख बन गया।
ध्यान दें: कोई भी बीमारी लंबी खिंचे, तेज बुखार हो या बच्चा कुछ खा-पी न पा रहा हो, तो घरेलू उपाय पर रुकना नहीं चाहिए — डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
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