मल्हार अध्याय 6 आपकी बात

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥” का अर्थ है ‘बिना सोचे किए गए कार्य मन में चुभते रहते हैं।’ क्या आपने कभी ऐसा अनुभव किया है? उस घटना को साझा कीजिए।
उत्तर

यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है, इसलिए उत्तर आपका अपना होना चाहिए। अच्छे उत्तर में ये चार बातें ज़रूर आनी चाहिए —

  1. घटना — क्या हुआ था, कब और किसके साथ।
  2. जल्दबाज़ी — उस समय आपने क्या नहीं सोचा।
  3. ‘खटकना’ — बाद में मन में क्या चुभता रहा। यही प्रश्न का असली केंद्र है।
  4. बदलाव — अब आप क्या अलग करते हैं।
नमूना उत्तर: “पिछले वर्ष कक्षा में मेरे मित्र सुहैल ने चित्रकला की प्रतियोगिता जीती। मुझे लगा कि उसने मेरा ही विचार चुरा लिया है। मैंने बिना कुछ पूछे, सबके सामने कह दिया — ‘यह चित्र इसका अपना नहीं है।’ बाद में पता चला कि उसने वह चित्र दो हफ़्ते पहले ही बना लिया था और मैंने ही उसे देखा नहीं था। मैंने माफ़ी माँग ली, उसने मान भी ली — पर वह बात महीनों तक मेरे मन में चुभती रही। जब भी उसका चित्र दीवार पर दिखता, मुझे अपनी वह जल्दबाज़ी याद आ जाती। यही तो कवि कहते हैं — ‘खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे।’ अब मैंने तय किया है कि किसी पर आरोप लगाने से पहले उससे अकेले में एक बार पूछ ज़रूर लूँगा।”
क्यों ऐसी बात ‘खटकती’ है: ग़लती का नुकसान तो सुधर सकता है, पर मन को यह याद रह जाता है कि सोचने का समय था और हमने नहीं सोचा। इसी अपराधबोध को गिरिधर ने ‘खटकना’ कहा है — काँटे की तरह, जो दिखता नहीं पर चुभता रहता है।
प्र2.
(ख) “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।” का अर्थ है ‘अतीत को भूलना और भविष्य पर ध्यान देना चाहिए।’ क्या आप इस बात से सहमत हैं? क्यों? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर

मैं इस बात से बड़े हिस्से में सहमत हूँ, पर एक शर्त के साथ — अतीत को भूलना नहीं, उसे पकड़े न रहना चाहिए। बीती बात से सीख लेकर आगे बढ़ना सबसे अच्छा रास्ता है।

सहमति के कारणउदाहरण
बीता समय बदला नहीं जा सकता; उस पर सोचते रहना समय और मन दोनों की हानि है।परीक्षा हो चुकी है। अब पर्चा दोबारा नहीं मिलेगा। उसी की चिंता में अगला विषय भी बिगड़ जाएगा।
आगे का समय हमारे हाथ में है, इसलिए शक्ति वहीं लगनी चाहिए।खिलाड़ी हारने के बाद मैदान छोड़ देता तो कभी न जीतता। वह अगले अभ्यास पर ध्यान देता है।
पुराना दुख पकड़े रहने से रिश्ते भी बिगड़ते हैं।दो मित्र पुराने झगड़े को भुला दें तो दोस्ती फिर बन जाती है।
जहाँ थोड़ी असहमति हैउदाहरण
अतीत की सीख भूल जाना हानिकारक है। भूलना चाहिए दुख को, अनुभव को नहीं।जिस अनजान संदेश से एक बार ठगी हुई, वह याद रहे तो दोबारा ठगी नहीं होगी।
अच्छी यादें और इतिहास हमारी पहचान हैं।दादी की कहानियाँ, त्योहारों की यादें और देश का इतिहास — इन्हें भूलना ठीक नहीं।
मेरा निष्कर्ष: कवि का आशय भी यही है। वे कहते हैं — “आगे को सुख होइ समुझि बीती सो बीती”। यहाँ ‘समुझि’ शब्द बहुत महत्व का है — पहले समझो, फिर छोड़ो। बिना समझे छोड़ना भूलना है, समझकर छोड़ना समझदारी।
प्र3.
(ग) पाठ में दी गई दोनों कुंडलियों के आधार पर आप अपने जीवन में कौन-कौन से बदलाव लाना चाहेंगे?
उत्तर

दोनों कुंडलियों से जो सूत्र मिलते हैं, उन्हें रोज़ के जीवन के छोटे-छोटे नियमों में बदला जा सकता है —

कुंडलिया का सूत्रजो बदलाव मैं लाऊँगा
“बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय”कोई भी बड़ा निर्णय तुरंत नहीं लूँगा — कम से कम एक रात सोचूँगा या घर में बड़ों से एक बार पूछूँगा।
“काम बिगारे आपनो”काम शुरू करने से पहले उसकी छोटी-सी योजना बनाऊँगा — क्या चाहिए, कितना समय लगेगा, पहले क्या।
“जग में होत हँसाय”दूसरों की भूल पर हँसूँगा नहीं, और अपनी भूल पर हँसी से डरकर उसे छिपाऊँगा भी नहीं — सुधार लूँगा।
“खटकत है जिय माहिं”गुस्से में कुछ कहने से पहले दस तक गिनूँगा, क्योंकि कही हुई बात वापस नहीं आती।
“बीती ताहि बिसारि दे”कम अंक या हार पर दुखी होकर बैठा नहीं रहूँगा; उसी दिन अगली तैयारी शुरू करूँगा।
“आगे की सुधि लेइ”हर रविवार अगले सप्ताह की एक छोटी-सी सूची बनाऊँगा — क्या पढ़ना है, क्या करना है।
“जो बनि आवै सहज में ताही में चित देइ”एक साथ दस काम पकड़ने के बजाय एक काम पूरा करके अगला उठाऊँगा।
“दुर्जन हँसै न कोइ चित्त में खता न पावै”ऐसा कोई काम नहीं करूँगा जिसे बाद में छिपाना पड़े।
सुझाव: आठों बदलाव एक साथ मत उठाइए। इनमें से केवल दो चुनिए, उन्हें कॉपी के पहले पन्ने पर लिखिए और महीने भर निभाइए। छोटा नियम जो निभ जाए, बड़ी सूची से कहीं अच्छा है।
प्र4.
(घ) “खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै॥” इस पंक्ति में खान-पान, सम्मान और राग-रंग अच्छा न लगने की बात की गई है। आप इसमें से किसे सबसे आवश्यक मानते हैं? अपने उत्तर के कारण भी बताइए।
उत्तर

तीनों में से मैं खान-पान को सबसे आवश्यक मानता हूँ — पर तीनों की अपनी-अपनी जगह है। नीचे तीनों पर विचार दिया गया है ताकि आप अपने मन का उत्तर चुन सकें।

बातक्यों आवश्यककितनी आवश्यक
खान-पानयह जीवन की पहली आवश्यकता है। भूखे पेट न पढ़ाई होती है, न खेल, न सेवा। शरीर चलेगा तभी मन और काम चलेंगे।सबसे आवश्यक
सम्मानयह मनुष्य की दूसरी बड़ी आवश्यकता है। सम्मान मिलने पर आत्मविश्वास बढ़ता है और व्यक्ति समाज में अपनी जगह बना पाता है।दूसरे स्थान पर
राग-रंगगीत-संगीत और उत्सव मन को ताज़ा करते हैं। थका हुआ मन इन्हीं से फिर काम के लायक बनता है।तीसरे स्थान पर
मेरा कारण: क्रम इस तरह बनता है — पहले शरीर, फिर मन, फिर आनंद। सम्मान और राग-रंग तभी अर्थ रखते हैं जब पेट भरा हो। इसीलिए मैं खान-पान को सबसे आवश्यक मानता हूँ।
दूसरा पक्ष भी ठीक है: यदि कोई कहे कि सम्मान सबसे आवश्यक है, तो वह भी सही है। कारण — भोजन तो मिल जाता है, पर अपमान सहने वाला व्यक्ति भीतर से टूट जाता है। कवि की पंक्ति भी यही तो कहती है — जिसकी हँसी उड़ी हो, उसे भरा थाल भी अच्छा नहीं लगता। इस प्रश्न में आपका कारण ही आपका उत्तर है।
पंक्ति का असली संदेश —
कवि यह नहीं कह रहे कि ये तीनों बेकार हैं।
वे कह रहे हैं — मन अशांत हो तो तीनों बेस्वाद हो जाते हैं।
इसलिए सबसे पहले सँभालने की चीज़ है — मन
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