प्र1.
(क) “खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥” का अर्थ है ‘बिना सोचे किए गए कार्य मन में चुभते रहते हैं।’ क्या आपने कभी ऐसा अनुभव किया है? उस घटना को साझा कीजिए।
उत्तर
यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है, इसलिए उत्तर आपका अपना होना चाहिए। अच्छे उत्तर में ये चार बातें ज़रूर आनी चाहिए —
- घटना — क्या हुआ था, कब और किसके साथ।
- जल्दबाज़ी — उस समय आपने क्या नहीं सोचा।
- ‘खटकना’ — बाद में मन में क्या चुभता रहा। यही प्रश्न का असली केंद्र है।
- बदलाव — अब आप क्या अलग करते हैं।
नमूना उत्तर: “पिछले वर्ष कक्षा में मेरे मित्र सुहैल ने चित्रकला की प्रतियोगिता जीती। मुझे लगा कि उसने मेरा ही विचार चुरा लिया है। मैंने बिना कुछ पूछे, सबके सामने कह दिया — ‘यह चित्र इसका अपना नहीं है।’ बाद में पता चला कि उसने वह चित्र दो हफ़्ते पहले ही बना लिया था और मैंने ही उसे देखा नहीं था। मैंने माफ़ी माँग ली, उसने मान भी ली — पर वह बात महीनों तक मेरे मन में चुभती रही। जब भी उसका चित्र दीवार पर दिखता, मुझे अपनी वह जल्दबाज़ी याद आ जाती। यही तो कवि कहते हैं — ‘खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे।’ अब मैंने तय किया है कि किसी पर आरोप लगाने से पहले उससे अकेले में एक बार पूछ ज़रूर लूँगा।”
क्यों ऐसी बात ‘खटकती’ है: ग़लती का नुकसान तो सुधर सकता है, पर मन को यह याद रह जाता है कि सोचने का समय था और हमने नहीं सोचा। इसी अपराधबोध को गिरिधर ने ‘खटकना’ कहा है — काँटे की तरह, जो दिखता नहीं पर चुभता रहता है।