मल्हार अध्याय 6 हँसी

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“जग में होत हँसाय” (क) कभी-कभी लोग दूसरों की गलतियों पर ही नहीं, उनके किसी भी कार्य पर हँस देते हैं। अपने समूह के साथ मिलकर ऐसी कुछ स्थितियों की सूची बनाइए, जब किसी को आप पर या आपको किसी पर हँसी आई हो।
उत्तर

यह समूह-गतिविधि है। सूची दो भागों में बनाइए — जब मुझ पर हँसी आई और जब मुझे किसी पर हँसी आई। नीचे नमूना सूची दी गई है; आप अपने अनुभव जोड़िए।

जब किसी को मुझ पर हँसी आईजब मुझे किसी पर हँसी आई
कक्षा में ज़ोर से पढ़ते हुए एक शब्द ग़लत बोल दिया।मित्र दौड़ते-दौड़ते फिसलकर गिर पड़ा।
खेल में गेंद पकड़ते-पकड़ते छूट गई।किसी का जूता उलटे पैर में पहना हुआ था।
नया कुरता थोड़ा बड़ा था और सब देखने लगे।किसी ने अध्यापिका का नाम ग़लत बोल दिया।
मंच पर कविता सुनाते समय एक पंक्ति भूल गया।बहन ने चाय में चीनी की जगह नमक डाल दिया।
गणित के प्रश्न का उत्तर बिलकुल उलटा निकला।छोटा भाई बड़ों की नकल उतार रहा था।
देखने की बात: ऊपर की सूची में एक बात साफ़ दिखती है — हम दूसरों पर जिन बातों पर हँसते हैं, वही बातें अपने साथ होने पर बुरी लगती हैं। यही इस गतिविधि का असली उद्देश्य है।
प्र2.
(ख) ऐसी दोनों स्थितियों में आपको कैसा लगता है और दूसरों को कैसा लगता होगा?
उत्तर
स्थितिमुझे कैसा लगता हैदूसरे को कैसा लगता होगा
जब मुझ पर हँसी होती हैशर्मिंदगी होती है, चेहरा गरम हो जाता है, मन करता है कहीं छिप जाऊँ। कई बार फिर वही काम करने से डर लगता है — जैसे दोबारा मंच पर जाने से।हँसने वाले को लगता है कि यह तो मज़ाक भर था; उसे अकसर पता ही नहीं चलता कि सामने वाले को चोट लगी।
जब मैं किसी पर हँसता हूँउस क्षण मज़ा आता है और साथी भी साथ हँसते हैं। पर जब उसका उतरा हुआ चेहरा दिखता है, तो भीतर से अच्छा नहीं लगता।जिस पर हँसा गया, उसे अपमान लगता है। कई बार वह चुप हो जाता है, समूह से कट जाता है या ग़ुस्सा दिखाकर अपनी चोट छिपाता है।
पाठ से जोड़िए: कुंडलिया कहती है — “जग में होत हँसाय चित्त में चैन न पावै”। यानी दुनिया की हँसी सबसे पहले मन का चैन छीनती है। तभी तो आगे लिखा है कि उसे फिर खान-पान, सम्मान, राग-रंग — कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
एक भेद याद रखिए: साथ हँसना (हम सब मिलकर मज़ेदार बात पर हँसे) और पर हँसना (किसी एक को निशाना बनाकर हँसे) — दोनों अलग हैं। पहला मित्रता बढ़ाता है, दूसरा चोट पहुँचाता है।
प्र3.
(ग) सोचिए कि कोई व्यक्ति आपकी किसी भूल पर हँस रहा है। ऐसे में आप क्या कहेंगे या क्या करेंगे ताकि उसे एहसास हो जाए कि इस बात पर हँसना ठीक नहीं है?
उत्तर

ऐसे में न चिल्लाना है, न चुप रह जाना है। शांत रहकर, साफ़ शब्दों में अपनी बात कहना सबसे असरदार होता है। यह तरीका अपनाइए —

  1. पहले शांत हो जाइए — एक गहरी साँस लीजिए। गुस्से में दिया गया उत्तर बात बिगाड़ देता है।
  2. भूल स्वीकार कर लीजिए — “हाँ, मुझसे ग़लती हुई।” इससे हँसने वाले के पास कहने को कुछ बचता ही नहीं।
  3. अपनी बात सीधे कहिए — “मुझे इस पर हँसा जाना अच्छा नहीं लग रहा।”
  4. उसे उसकी जगह पर रखिए — “यही भूल तुमसे हो जाती तो तुम्हें कैसा लगता?”
  5. बात को आगे बढ़ाइए — “अब बताओ, इसे सही कैसे किया जाए?” इससे हँसी सहयोग में बदल जाती है।
नमूना उत्तर (संवाद):
साथी — (हँसते हुए) देखो-देखो, इसने ‘ऋ’ को ‘र’ पढ़ दिया!
मैं — हाँ, मैंने ग़लत पढ़ा। अब सही पढ़ूँगा। पर एक बात कहूँ? इस तरह हँसने पर अगली बार बोलने में मुझे झिझक होगी।
साथी — अरे, मैं तो मज़ाक कर रहा था।
मैं — मुझे पता है तुम्हारा मन बुरा नहीं था। पर मज़ाक तभी अच्छा लगता है जब दोनों हँसें। अभी तो सिर्फ़ तुम हँस रहे थे। चलो, तुम मुझे ‘ऋ’ का सही उच्चारण सिखा दो — फिर हम दोनों साथ हँसेंगे।
यह तरीका क्यों काम करता है: हँसने वाले को अकसर यह पता ही नहीं होता कि उसकी हँसी चुभ रही है। जैसे ही उसे दूसरे की जगह पर रखकर सोचने को कहा जाता है, उसे स्वयं एहसास हो जाता है। इसे सहानुभूति कहते हैं — और यह डाँट से कहीं अधिक असर करती है।
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