मल्हार अध्याय 6 कविता की रचना

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) अब आप पाठ में दी गई दोनों कुंडलियों को ध्यान से देखिए और अपने-अपने समूह में मिलकर इनकी विशेषताओं की सूची बनाइए। अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए। (तालिका — जो विशेषताएँ दोनों कुंडलियों में हैं / जो विशेषताएँ किसी एक कुंडलिया में हैं)
उत्तर

दोनों कुंडलियों को साथ रखकर पढ़िए। सूची इस प्रकार बनेगी —

जो विशेषताएँ दोनों कुंडलियों में हैंजो विशेषताएँ किसी एक कुंडलिया में हैं
दोनों में छह-छह पंक्तियाँ हैं — पहले दो पंक्तियों का दोहा, फिर चार पंक्तियों का रोला। यही कुंडलिया छंद है।पहली में — “खान पान सन्मान राग रंग” की तरह एक ही पंक्ति में कई वस्तुओं की सूची आई है।
दोनों का पहला शब्द ही अंतिम शब्द भी है — “बिना बिचारे … बिना बिचारे”, “बीती … बीती”। कुंडली की तरह गोल घूमकर वहीं आ जाना।दूसरी में — विपरीत अर्थ वाले काल-शब्द साथ आए हैं — “बीती” (अतीत) और “आगे” (भविष्य)।
दोनों में दोहे की दूसरी पंक्ति का अंश तीसरी पंक्ति के आरंभ में दोहराया गया है — “जग में होत हँसाय”, “ताही में चित देइ”।पहली में — बिना सोचे किए काम के दुष्परिणाम गिनाए गए हैं (पछतावा, हँसी, बेचैनी, न टलने वाला दुख)।
दोनों की पाँचवीं पंक्ति में “कह गिरिधर कविराय” आता है — यानी कवि अपना नाम स्वयं जोड़ता है (छाप)।दूसरी में — सीधा समाधान और आज्ञा-रूप दिए गए हैं — “बिसारि दे”, “सुधि लेइ”, “चित देइ”, “करु”।
दोनों में तुक मिलती है — पछिताय/हँसाय/भावै/पावै, लेइ/देइ, परतीती/बीती।पहली में — समाज और लोक-लाज की बात है (“जग में होत हँसाय”)।
दोनों में अनुप्रास है — “बिना बिचारे”, “ाछे छिताय”, “बीती … बिसारि”।दूसरी में — “मन परतीती” यानी मन में विश्वास जमाने की बात है, जो पहली में नहीं आती।
दोनों की भाषा ब्रज है और शैली नीतिपरक — मानो कोई बड़ा हमसे बातचीत कर रहा हो।पहली में — “दुःख कछु टरत न टारे” जैसी पीड़ा की गहराई है, जो दूसरी में नहीं है।
दोनों में बोलने पर बराबर समय लगता है — इसी लय के कारण ये पंक्तियाँ कहावत बन गईं।दूसरी में — “जो बनि आवै सहज में” जैसा जीवन-जीने का व्यावहारिक सूत्र है।
कुंडलिया की सबसे बड़ी पहचान: जिस शब्द से कुंडलिया शुरू होती है, उसी पर वह समाप्त होती है — जैसे कुंडली (गोल घेरा)। इसी से इसका नाम कुंडलिया पड़ा। दोनों कुंडलियों में यह नियम पूरा-पूरा निभाया गया है।
प्र2.
(ख) नीचे एक स्तंभ में कविता की पंक्तियों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं और उनसे संबंधित पंक्तियाँ दूसरे स्तंभ में दी गई हैं। कविता की विशेषताओं का सही पंक्तियों से मिलान कीजिए— कविता की विशेषताएँ: 1. पंक्ति के अंतिम शब्द की ध्वनि आपस में मिलती-जुलती है। 2. कवि के नाम का उल्लेख किया गया है। 3. एक-दूसरे के विपरीत विचार एक साथ आए हैं। 4. एक ही वर्ण से शुरू होने वाले एक से अधिक शब्द एक ही पंक्ति में आए हैं। कविता की पंक्तियाँ: 1. कह गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती॥ 2. ताही में चित देइ बात जोई बनि आवै। दुर्जन हँसै न कोइ चित्त में खता न पावै॥ 3. बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय। 4. बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ। (संकेत— आप कविता की पंक्तियों में कुछ और विशेषताएँ भी खोज सकते हैं।)
उत्तर

सही मिलान इस प्रकार है —

कविता की विशेषतामिलानपंक्तिकैसे पहचानें
1. पंक्ति के अंतिम शब्द की ध्वनि आपस में मिलती-जुलती है।→ 2ताही में चित देइ बात जोई बनि आवै। दुर्जन हँसै न कोइ चित्त में खता न पावै“आवै” और “पावै” की अंतिम ध्वनि एक-सी है। इसे तुक या अंत्यानुप्रास कहते हैं।
2. कवि के नाम का उल्लेख किया गया है।→ 1कह गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती॥पंक्ति में कवि का अपना नाम आया है। इसे कवि की छाप कहते हैं।
3. एक-दूसरे के विपरीत विचार एक साथ आए हैं।→ 4बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।“बीती” = अतीत, “आगे” = भविष्य — दो उलटी दिशाएँ एक ही पंक्ति में।
4. एक ही वर्ण से शुरू होने वाले एक से अधिक शब्द एक ही पंक्ति में आए हैं।→ 3बिना बिचारे जो करै सो पाछे छिताय।‘बि-बि’ और ‘पा-प’ की आवृत्ति। इसे अनुप्रास कहते हैं।
संक्षेप में — 1 → 2,   2 → 1,   3 → 4,   4 → 3

संकेत के अनुसार कुछ और विशेषताएँ जो आप खोज सकते हैं —

  • पुनरुक्ति / आवृत्ति — “जग में होत हँसाय” और “ताही में चित देइ” दो-दो बार आए हैं।
  • वक्रता या चक्र — कुंडलिया जिस शब्द से शुरू होती है, उसी पर समाप्त होती है।
  • संवाद-शैली — “बिसारि दे”, “सुधि लेइ”, “करु” — कवि मानो सामने बैठकर हमसे कह रहा हो।
  • सूक्ति / कहावत जैसा गठन — पंक्ति इतनी छोटी और पूर्ण है कि वह अकेली भी अर्थ दे देती है।
याद रखने की बात: अनुप्रास = एक ही वर्ण की आवृत्ति (पंक्ति के भीतर)। तुक/अंत्यानुप्रास = पंक्ति के अंत में मिलती-जुलती ध्वनि। दोनों को आपस में मत मिलाइए।
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