प्र1.
नीचे दिए गए रिक्त स्थानों में ‘चित्त’ या ‘मन’ से जुड़े शब्द कुंडलियों में से चुनकर लिखिए— (पुस्तक में ‘मन (चित्त)’ से जुड़े सात खानों में से एक में ‘चैन’ पहले से भरा हुआ है।)
उत्तर
पुस्तक में एक खाना पहले से भरा है — चैन। बाकी छह खानों में कुंडलियों से चुनकर ये शब्द लिखिए —
| खाने में लिखिए | कुंडलिया की पंक्ति | ‘मन’ से जुड़ाव |
|---|---|---|
| चैन (पहले से भरा) | “चित्त में चैन न पावै” | मन की शांति |
| चित्त | “चित्त में चैन न पावै”, “चित्त में खता न पावै” | मन का दूसरा नाम |
| मनहिं | “राग रंग मनहिं न भावै” | मन को |
| जिय | “खटकत है जिय माहिं” | जी, हृदय — मन का पर्याय |
| चित | “ताही में चित देइ” | ध्यान, मन लगाना |
| खता | “चित्त में खता न पावै” | मन में रहने वाला दोष / अपराधबोध |
| परतीती | “यहै करु मन परतीती” | मन का विश्वास |
और भी विकल्प: यदि आप चाहें तो इनके स्थान पर खटकत (मन में चुभना), भावै (मन को अच्छा लगना), सुधि (मन का ध्यान) या समुझि (मन का समझना) भी लिख सकते हैं — ये सब भी कुंडलियों से ही लिए गए हैं और मन से जुड़े हैं।
देखिए तो: केवल बारह पंक्तियों की दो कुंडलियों में ‘मन’ के लिए इतने शब्द आए हैं — चित्त, चित, जिय, मन, मनहिं। इसी से पता चलता है कि इन कुंडलियों का असली विषय बाहर का काम नहीं, भीतर का मन है।