मल्हार अध्याय 6 अनुमान और कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए— (क) आपने पढ़ा है कि “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय...।” कल्पना कीजिए कि आपके एक मित्र ने बिना सोचे-समझे एक बड़ा निर्णय लिया है। वह निर्णय क्या था और उसका क्या प्रभाव पड़ा? इसके बारे में एक रोचक कहानी अपने साथियों के साथ मिलकर बनाइए और कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

यह समूह-गतिविधि है। कहानी बनाते समय ये चार सीढ़ियाँ ध्यान में रखिए — इससे कहानी अपने आप रोचक बन जाती है।

  1. जल्दबाज़ी का क्षण — मित्र ने बिना सोचे क्या तय किया? (एक वाक्य में)
  2. तुरंत का असर — शुरू में तो सब ठीक लगा। यहीं पाठक की उत्सुकता बनती है।
  3. पछतावे का मोड़ — फिर वह चूक सामने आई जो उसने नहीं सोची थी।
  4. सीख — अंत में मित्र ने क्या समझा? कुंडलिया की एक पंक्ति यहाँ जोड़ दीजिए।
नमूना कहानी:पाँच सौ रुपये का पौधा — मेरे मित्र रोहन को पौधों का बहुत शौक है। एक दिन मेले में एक आदमी बोला — ‘यह विदेशी पौधा है, महीने भर में फल दे देगा, केवल पाँच सौ रुपये।’ रोहन ने सोचा भी नहीं। उसने अपनी पूरी जमा-पूँजी — वह पैसा जो वह साइकिल की घंटी के लिए बचा रहा था — तुरंत दे दी। घर आकर उसने गमला सबसे अच्छी जगह रखा, रोज़ पानी दिया, तीन दिन तक दोस्तों को बुला-बुलाकर दिखाया। दसवें दिन पौधे की पत्तियाँ झड़ने लगीं। पंद्रहवें दिन माली चाचा ने देखकर कहा — ‘बेटा, यह तो साधारण झाड़ी है, इसकी जड़ ही काटकर लगाई गई थी। दो रुपये की चीज़ है।’ रोहन कुछ बोल नहीं पाया। उस रात उसे नींद नहीं आई — जैसा कवि ने कहा है, ‘खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे’। अगले दिन उसने अपनी कॉपी के पहले पन्ने पर लिखा — ‘कोई भी चीज़ खरीदने से पहले एक रात सोचूँगा।’ आज भी वह पन्ना वैसे ही लगा है।”
प्रस्तुति का सुझाव: कहानी को तीन भूमिकाओं में बाँट लीजिए — मित्र, विक्रेता और सुनाने वाला (सूत्रधार)। मंच पर संवाद बोलिए और अंत में कुंडलिया की पंक्ति सब मिलकर एक साथ बोलिए। इससे प्रस्तुति यादगार बन जाएगी।
प्र2.
(ख) कल्पना कीजिए कि “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ...।” कविता निम्नलिखित के लिए लिखी गई है — • आप • आपका कोई सहपाठी • आपका कोई परिजन • आपके कोई शिक्षक • कोई पक्षी • कोई पशु — इनकी कौन-कौन सी समस्याएँ होंगी? यह कविता उन्हें कैसे प्रेरित करेगी?
उत्तर

हर व्यक्ति या प्राणी की बीती हुई पीड़ा अलग होती है, पर कुंडलिया का संदेश सबके लिए एक ही है — बीता हुआ छोड़ो, आगे की सुध लो। नीचे छहों के लिए एक-एक संभावित समस्या और प्रेरणा दी गई है।

किसके लिएसंभावित समस्या (जो बीत चुकी)कविता कैसे प्रेरित करेगी
आपपिछली परीक्षा में अंक कम आए; उसी की चिंता में नई पढ़ाई नहीं हो रही।“बीती सो बीती” — बीता परिणाम अब बदलेगा नहीं। आज का एक घंटा पढ़ना ही अगली परीक्षा बदल सकता है।
सहपाठीखेल में हार गया और अब टीम में उतरने से डरता है।“आगे की सुधि लेइ” — हार खेल का हिस्सा है। अगले अभ्यास पर ध्यान दे, तो खेल फिर बनेगा।
परिजनदादाजी पुराने दिनों को याद करके उदास रहते हैं।“आगे को सुख होइ” — पुरानी यादें सहेजिए, पर आज के पोते-पोतियों के साथ का सुख भी लीजिए।
शिक्षककोई पाठ अच्छी तरह नहीं करा पाए, इसका मलाल है।“जो बनि आवै सहज में ताही में चित देइ” — इस बार तरीका बदलिए, अगली कक्षा नया अवसर है।
कोई पक्षीआँधी में घोंसला गिर गया, तिनके बिखर गए।पक्षी बिखरे घोंसले पर बैठा नहीं रहता — वह नया तिनका उठाता है। कविता ठीक यही कहती है।
कोई पशुबछड़ा गिरकर घायल हुआ, अब खड़ा होने से डरता है।गिरना बीत गया; चलना बाकी है। एक-एक कदम आगे बढ़ाना ही “आगे की सुधि” है।
क्यों यह कविता सबके लिए है: गिरिधर ने किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं लिया। उन्होंने केवल स्थिति बताई — “बीती”। इसीलिए यह पंक्ति विद्यार्थी, बुज़ुर्ग, शिक्षक और पक्षी — सब पर बराबर लागू हो जाती है। यही अच्छी नीति-कविता की पहचान है।
प्र3.
(ग) कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसे व्यक्ति से मिले हैं, जो हमेशा बीती बातों में खोया रहता है। आप उसे समझाने के लिए क्या-क्या कहेंगे?
उत्तर

ऐसे व्यक्ति को उपदेश देने से नहीं, साथ देने से बदलाव आता है। बात इस क्रम से कीजिए —

  1. पहले सुनिए — “आपके साथ जो हुआ, वह सचमुच कठिन था।” बिना सुने दी गई सलाह कोई नहीं मानता।
  2. फिर सीमा दिखाइए — “बीती बात को याद करने से वह लौटेगी नहीं, पर आज का समय ज़रूर चला जाएगा।”
  3. फिर आगे का काम दीजिए — कोई छोटा-सा काम, जो आज ही हो सके।
  4. अंत में कविता सुनाइए — “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।”
नमूना उत्तर (संवाद रूप में):
मैं — चाचाजी, आप रोज़ उसी पुराने नुकसान की बात करते हैं। मन बहुत दुखता होगा।
वे — हाँ बेटा, वह गलती न होती तो आज सब अलग होता।
मैं — ठीक कहते हैं। पर एक बात सोचिए — वह दिन अब लौट नहीं सकता, और आज का दिन हमारे हाथ में है। बीती बात याद करके हम उसे बदल नहीं रहे, बस आज को भी वैसा ही बना रहे हैं।
वे — तो करूँ क्या?
मैं — आज एक छोटा काम कीजिए — बस एक। बगीचे के दो पौधे लगा दीजिए, या मुझे गणित का वह तरीका सिखा दीजिए जो आप जानते हैं। कल एक और काम। हमारे कवि गिरिधर ने यही कहा है — “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।” और आगे वे यह भी कहते हैं — “आगे को सुख होइ समुझि बीती सो बीती।” यानी सुख तभी आएगा जब हम मान लेंगे कि जो बीत गया, सो बीत गया।
ध्यान रखिए: ‘भूल जाओ’ कहने का अर्थ यह नहीं कि उनका दुख छोटा है। कवि का आशय है — दुख को पकड़े मत रहो। दुख को स्वीकार करना और उसमें उलझे रहना, दो अलग बातें हैं।
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