मल्हार अध्याय 6 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ को एक बार पुन: पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए। (क) “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय।” कविता में बिना विचार किए कार्य करने के क्या नुकसान बताए गए हैं?
उत्तर

कविता में पाँच नुकसान गिनाए गए हैं। ये सब पहली कुंडलिया में एक के बाद एक आते हैं —

क्रमनुकसानकविता की पंक्ति
1पछतावा — बाद में अफ़सोस करना पड़ता है।“सो पाछे पछिताय”
2अपना काम बिगड़ जाना — हानि किसी और की नहीं, अपनी ही होती है।“काम बिगारे आपनो”
3संसार में हँसी — लोग मज़ाक उड़ाते हैं, साख गिरती है।“जग में होत हँसाय”
4मन की बेचैनी — चित्त को चैन नहीं मिलता; खान-पान, सम्मान, राग-रंग कुछ भी अच्छा नहीं लगता।“चित्त में चैन न पावै। खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै॥”
5न टलने वाला दुख — वह पीड़ा टालने पर भी नहीं टलती, मन में काँटे-सी खटकती रहती है।“दुःख कछु टरत न टारे। खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥”
ध्यान देने की बात: कवि ने नुकसानों को एक सीढ़ी की तरह रखा है — पहले काम बिगड़ता है, फिर समाज हँसता है, फिर मन अशांत होता है, और अंत में वह अशांति स्थायी दुख बन जाती है। इसी क्रम के कारण छोटी-सी कुंडलिया इतनी असरदार लगती है।
प्र2.
(ख) “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय।” कुंडलिया में जो बातें सैंकड़ों साल पहले कही गई थीं, क्या वे आपके लिए भी उपयोगी हैं? कैसे? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर

हाँ, ये बातें आज भी उतनी ही उपयोगी हैं — बल्कि पहले से भी अधिक। कारण यह है कि आज निर्णय लेने की गति बहुत बढ़ गई है। एक ‘टैप’ में पैसा भेजा जा सकता है, एक क्लिक में संदेश हज़ारों लोगों तक पहुँच सकता है। जहाँ काम इतनी तेज़ी से होता है, वहाँ “बिना बिचारे” करने का ख़तरा और बड़ा हो जाता है।

आज की स्थितिबिना बिचारे किया तो …सोचकर किया तो …
मोबाइल पर आया संदेश — “₹5000 भेजिए, लॉटरी लगी है”पैसा चला गया, पछतावा बचानंबर जाँचा, बड़ों को बताया, ठगी से बच गए
सोशल मीडिया पर आई कोई ‘ख़बर’बिना जाँचे आगे भेज दी — बाद में झूठी निकली, शर्मिंदगी हुईपहले सच्चाई जाँची, फिर भेजा या नहीं भेजा
गुस्से में मित्र को कही गई बातदोस्ती टूट गई, मन में खटकती रहीदस तक गिनकर बोले — बात भी कह दी, रिश्ता भी बचा
परीक्षा में प्रश्न पढ़े बिना उत्तर लिखनापूरा उत्तर ग़लत, अंक कट गएप्रश्न दो बार पढ़ा, सही उत्तर लिखा
नमूना उत्तर: “पिछले महीने मैंने बिना सोचे अपनी साइकिल एक अनजान लड़के को दे दी क्योंकि उसने कहा कि वह पाँच मिनट में लौटा देगा। वह शाम तक नहीं आया। घर में डाँट पड़ी और मुझे बहुत पछतावा हुआ। साइकिल अगले दिन मिल तो गई, पर उस रात मुझे भी नींद नहीं आई — ठीक वैसे ही जैसे कवि ने कहा है, ‘खटकत है जिय माहिं’। अब मैं कोई भी चीज़ देने से पहले घर में पूछता हूँ।”
निष्कर्ष: कुंडलिया की भाषा पुरानी है, पर उसका सूत्र नया है — पहले सोचो, फिर करो। यही कारण है कि गिरिधर की ये पंक्तियाँ आज भी कहावत की तरह बोली जाती हैं।
प्र3.
(ग) “खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै॥” इस पंक्ति में रेखांकित शब्दों के अर्थ शब्दकोश से देखकर लिखिए। प्रत्येक के लिए एक-एक उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर

पंक्ति में रेखांकित शब्द हैं — सन्मान, मनहिं और भावै। शब्दकोश के अनुसार इनके अर्थ और उदाहरण —

रेखांकित शब्दआज का रूपशब्दकोश के अनुसार अर्थउदाहरण (अपना वाक्य)
सन्मानसम्मानआदर, इज़्ज़त, प्रतिष्ठा; किसी के गुण या पद के कारण दिया गया मानगणतंत्र दिवस पर हमारी प्रधानाध्यापिका को शिक्षा के क्षेत्र में उनके काम के लिए सम्मान मिला।
मनहिंमन को / मन में‘मन’ + ‘हिं’ (को) — अर्थात मन को। ब्रजभाषा में कारक चिह्न शब्द के साथ जुड़कर आता हैदादी की सुनाई कहानी मेरे मन को बहुत भाती है।
भावैभाता है / अच्छा लगता है‘भाना’ क्रिया का रूप — रुचना, पसंद आना, अच्छा लगनाबारिश में गरम पकौड़े सबको भाते हैं।
पूरी पंक्ति का अर्थ —
“खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै”
= अच्छा खाना-पीना, आदर-सम्मान और गीत-संगीत — कुछ भी उसके मन को अच्छा नहीं लगता।
ध्यान रखिए: ‘भावै’ का अर्थ ‘भाव’ (कीमत या मनोदशा) नहीं है। यहाँ यह भाना क्रिया से बना है। इसी से आज का मुहावरा बना — “यह बात मुझे नहीं भाई।”
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