मल्हार अध्याय 7 आज की पहेली

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपने वर्षा से जुड़ी एक कविता पढ़ी है। अब भारत की विभिन्न ऋतुओं से जुड़ी कुछ पहेलियाँ पढ़िए और इन्हें बूझिए— जाने कैसा मौसम आया, / सूरज ने सबको झुलसाया। / आम पकें तो रस ढलके, / समय कौन-सा ये झलके?
उत्तर

उत्तर — ग्रीष्म ऋतु (गरमी का मौसम, सामान्यत: मई–जून)

पहेली का संकेतवह ग्रीष्म की ओर कैसे ले जाता है
“सूरज ने सबको झुलसाया”तेज़ धूप और लू — यह केवल गरमी में होता है।
“आम पकें तो रस ढलके”आम मई-जून में ही पकता है; इसीलिए उसे ‘गरमी का फल’ कहते हैं।
पाठ से जोड़िए: कविता की पंक्ति “फिरते लखो पपीहे, हैं ग्रीष्म ताप खोते” में यही ऋतु आई है — और वर्षा उसी ताप से छुटकारा दिलाती है।
प्र2.
पानी बरसे, बादल गरजे, / धरती का हर कोना हरसे। / नदियाँ नाले भरे हर ओर, / बूझो किसका है ये जोर?
उत्तर

उत्तर — वर्षा ऋतु (सावन-भादों, सामान्यत: जुलाई–अगस्त)

पहेली का संकेतअर्थ
“पानी बरसे, बादल गरजे”यही वर्षा ऋतु की पहचान है — कविता में भी ठीक यही पंक्ति है: “बिजली चमक रही है, बादल गरज रहे हैं”।
“धरती का हर कोना हरसे”‘हरसना’ = हर्षित होना, खुश होना। वर्षा से सारी धरती प्रसन्न हो उठती है।
“नदियाँ नाले भरे हर ओर”सूखी नदियाँ और नाले फिर से बहने लगते हैं।
यही पाठ की कविता की ऋतु है। ‘वर्षा-बहार’ का पूरा दृश्य इसी पहेली का विस्तार है — बरसता पानी, गरजते बादल, भरे हुए ताल और प्रसन्न जीव-जंतु।
प्र3.
हवा में ठंडक बढ़ती जाए, / धूप सुहानी सबको भाए। / नई फसल खेतों में लाए, / बूझो कौन-सा मौसम आए?
उत्तर

उत्तर — शरद ऋतु (सामान्यत: सितंबर–अक्तूबर)

पहेली का संकेतअर्थ
“हवा में ठंडक बढ़ती जाए”वर्षा जाते ही रातें ठंडी होने लगती हैं — पर कड़ाके की सर्दी अभी नहीं आई।
“धूप सुहानी सबको भाए”शरद की धूप न जलाती है, न कँपाती है — इसीलिए ‘सुहानी’ कही गई।
“नई फसल खेतों में लाए”वर्षा में बोई गई खरीफ़ फ़सल (धान, मक्का, बाजरा) इसी समय पकने और कटने लगती है।
यदि आपने ‘हेमंत’ लिखा हो: तो भी सोचने का ढंग ग़लत नहीं है, क्योंकि ठंड और फ़सल दोनों हेमंत में भी हैं। पर ‘धूप सुहानी’ और ‘ठंडक बढ़ती जाए’ (यानी अभी बढ़ना शुरू ही हुई है) — ये दो संकेत शरद की ओर ही ले जाते हैं।
प्र4.
फूल खिले, हर पक्षी गाए, / चारों ओर हरियाली छाए। / बागों में खुशबू छा जाए / बूझो ऋतु ये क्या कहलाए?
उत्तर

उत्तर — वसंत ऋतु (सामान्यत: मार्च–अप्रैल)

पहेली का संकेतअर्थ
“फूल खिले, हर पक्षी गाए”वसंत को ‘ऋतुराज’ कहा जाता है — इसी में सबसे अधिक फूल खिलते हैं और कोयल कूकती है।
“चारों ओर हरियाली छाए”पतझड़ के बाद पेड़ों पर नई कोंपलें फूट पड़ती हैं।
“बागों में खुशबू छा जाए”आम के बौर और सरसों-गेंदे की महक इसी ऋतु की है।
पाठ से जोड़िए: ‘बहार’ शब्द इसी वसंत के लिए आता है। कवि ने वर्षा को ‘बहार’ कहकर उसे वसंत के बराबर सुंदर बता दिया — यह बात इस पहेली को पढ़ने के बाद और साफ़ हो जाती है।
प्र5.
बर्फ गिरे, सर्दी बढ़ जाए, / ऊनी कपड़े सबको भाए। / धुंध की चादर लाए रात, / बूझो किस ऋतु की बात?
उत्तर

उत्तर — हेमंत ऋतु (सर्दी का आरंभ, सामान्यत: नवंबर–दिसंबर)

पहेली का संकेतअर्थ
“सर्दी बढ़ जाए”‘बढ़ जाए’ का अर्थ है सर्दी अभी बढ़ रही है — यानी यह जाड़े की शुरुआत है।
“ऊनी कपड़े सबको भाए”स्वेटर, शॉल और रजाई इसी समय निकलते हैं।
“धुंध की चादर लाए रात”नवंबर-दिसंबर की रातों में कोहरा और धुंध छाने लगती है।
“बर्फ गिरे”पहाड़ी क्षेत्रों में इसी समय पहला हिमपात होता है।
‘शिशिर’ भी स्वीकार्य है — क्योंकि कड़ाके की ठंड और हिमपात शिशिर (जनवरी–फरवरी) में और भी अधिक होते हैं। पर छह पहेलियों को छह ऋतुओं में बाँटने पर यह पहेली हेमंत की और अगली शिशिर की बैठती है।
प्र6.
पत्ता-पत्ता गिरता जाए, / सूनी डाली बहुत सताए। / पेड़ करें खुद को तैयार, / कौन-सी ऋतु का है ये सार?
उत्तर

उत्तर — शिशिर ऋतु (पतझड़ का समय, सामान्यत: जनवरी–फरवरी)

पहेली का संकेतअर्थ
“पत्ता-पत्ता गिरता जाए”शिशिर में पेड़ों के पुराने पत्ते झड़ जाते हैं — इसीलिए इसे पतझड़ भी कहते हैं।
“सूनी डाली बहुत सताए”पत्तों के बिना डालियाँ खाली और उदास दिखती हैं।
“पेड़ करें खुद को तैयार”यह सबसे सुंदर संकेत है — पुराने पत्ते गिराकर पेड़ आने वाले वसंत के लिए तैयार हो रहा है।
ध्यान दीजिए: पत्ते गिरना अंत नहीं, नई शुरुआत की तैयारी है। शिशिर के तुरंत बाद वसंत आता है और वही सूनी डाली नई कोंपलों से भर जाती है। इस तरह छह ऋतुओं का चक्र फिर से आरंभ हो जाता है — वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर।
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