मल्हार अध्याय 7 वर्षा-बहार के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-05

इस अध्याय के बारे में

वर्षा-बहार मुकुटधर पाण्डेय की कविता है। ‘बहार’ का अर्थ है वसंत यानी सबसे सुहावना मौसम। कवि ने वर्षा ऋतु को ही ‘बहार’ कह दिया — यानी उसके लिए वर्षा भी उतनी ही सुंदर और उल्लासभरी ऋतु है। कविता आठ पद्यांशों में वर्षा के दृश्यों की एक शृंखला बनाती है — नभ में घनघोर घटा, बिजली और गरजते बादल, बरसता पानी और बहते झरने, ठंडी हवा में हिलती डालियाँ, बागों में गाती मालिनें, तालों में प्रसन्न जलचर, ताप खोते पपीहे, नाचते मोर, गाते मेंढक, महकते गुलाब, कतार में चलते हंस और गीत गाते किसान। कविता का मुख्य भाव आनंद और प्रसन्नता है। वर्षा किसी एक के लिए नहीं, सबके लिए सुख लाती है — मनुष्य, पशु-पक्षी, जल-जीव, पेड़-पौधे, सबके लिए। इसीलिए पहली ही पंक्ति में कवि कहता है — “वर्षा-बहार सब के , मन को लुभा रही है”। अंतिम पंक्ति कविता का निष्कर्ष है — “सारे जगत की शोभा, निर्भर है इसके ऊपर।” पानी के बिना हरियाली नहीं,

  1. मेरी समझ से
  2. पंक्तियों पर चर्चा
  3. मिलकर करें मिलान
  4. सोच-विचार के लिए
  5. अनुमान और कल्पना से
  6. आपकी रचनाएँ
  7. शब्द से जुड़े शब्द
  8. कविता की रचना
  9. कविता का सौंदर्य
  10. विशेषण
  11. ऋतु और शब्द
  12. आपकी बात
  13. साक्षात्कार
  14. वर्षा के दृश्य
  15. वर्षा में ध्वनियाँ
  16. वर्षा से जुड़े गीत
  17. सृजन
  18. आज की पहेली
  19. झरोखे से
  20. साझी समझ
  21. खोजबीन के लिए
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