मल्हार अध्याय 8 बिरजू महाराज से साक्षात्कार के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-05
इस अध्याय के बारे में
पाठ की विधा साक्षात्कार है — वह भी व्यक्तिपरक साक्षात्कार , जिसका उद्देश्य साक्षात्कारदाता के निजी जीवन, कामकाज, उपलब्धियों और विचारों को पाठकों के सामने लाना है। यह नौकरी वाले साक्षात्कार से बिलकुल अलग है। बिरजू महाराज को कथक विरासत में मिला। उनके गुरु थे उनके पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज। घर में कथक का माहौल था, इसलिए औपचारिक तालीम शुरू होने से पहले ही वे देख-देखकर कथक सीख गए थे। पिता के देहांत के बाद घर में गहरी आर्थिक तंगी आई — कभी कर्ज, कभी पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर सोने-चाँदी के तार बेचना। इस दौर में सबसे बड़ी सहयोगी उनकी माँ थीं, जो कहती थीं — “खाने को भले ही चना मिले या कुछ भी न मिले पर अभ्यास जरूर करो।” गंडा (ताबीज़) बाँधने की रस्म गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है। बिरजू महाराज ने इस परंपरा को उल्टा कर दिया — वे पहले वर्षों तक सिखाते हैं और जब
अभ्यास
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- शीर्षक
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- शब्दों की बात
- शब्दों का प्रभाव
- कला का संसार
- साक्षात्कार की रचना
- सृजन
- आज की पहेली
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