मल्हार अध्याय 8 झरोखे से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
बिरजू महाराज ने भारत के विभिन्न राज्यों के शास्त्रीय नृत्यों का उल्लेख किया है। आइए, इनके बारे में अपनी समझ बढ़ाते हैं—
उत्तर

पाठ में जिन शास्त्रीय नृत्यों का उल्लेख है, उनका सार एक तालिका में —

नृत्यराज्यउद्गम / नाम का अर्थप्रमुख विशेषता
भरतनाट्यमतमिलनाडु‘भरतमुनि’ + ‘नाट्यम’; कुछ विद्वान ‘भरत’ को भाव, राग, ताल से भी जोड़ते हैं। मंदिर नर्तकों की एकल प्रस्तुति ‘सादिर’ से संबंध।नृत्य विधा का सर्वाधिक प्राचीन रूप; भाव और नृत्त दोनों का एक साथ प्रयोग।
कथकलीकेरलरामानाट्टम और कृष्णानाट्टम — दो लोक नाट्य परंपराओं से उद्भव; मलयाली कवि वी.एन. मेनन ने राजा मुकुंद के संरक्षण में प्रचार किया।संगीत, नृत्य और नाटक का संयोजन; पुरुष मंडली द्वारा; आँखों और भौहों का लय-संचालन प्रमुख; ‘ओज’ की प्रधानता।
कथकउत्तर भारत (ब्रजभूमि / लखनऊ, जयपुर, बनारस घराने)ब्रजभूमि की रासलीला से उत्पन्न; नाम ‘कथिक’ से, जिसे कथावाचक भी कहते हैं।घरानों का विकास; जुगलबंदी मुख्य आकर्षण, जिसमें तबलावादक और नर्तक के बीच प्रतिस्पर्धात्मक खेल होता है।
कुचिपुड़ीआंध्र प्रदेशपारंपरिक शास्त्रीय शैली।प्रस्तुति प्रार्थना से आरंभ, फिर नृत्य-अभिनय; कर्नाटक संगीत की संगत; समापन ‘तरंगम’ प्रस्तुति के बाद।
मणिपुरीमणिपुरपौराणिक आख्यान के अनुसार स्रोत — मणिपुर की घाटियों में स्थानीय गंधर्वों के साथ शिव-पार्वती का दैवीय नृत्य।‘लाई हरोबा’ त्योहार में प्रचलन; सामान्यत: स्त्रियों द्वारा; चेहरे की अभिव्यक्ति के स्थान पर हाथ के हाव-भाव और पैरों की गति महत्वपूर्ण; कोमलता प्रधान।
ओडिसीओडिशानाट्यशास्त्र में उल्लिखित ‘ओद्र नृत्य’ से नाम।मुख्य आकर्षण त्रिभंग मुद्रा — शरीर का तीन मोड़ वाला रूप; निचला हिस्सा स्थिर, धड़ लय-ताल के साथ गतिमान; कुछ मुद्राएँ भरतनाट्यम से मिलती-जुलती।
मोहिनीअट्टमकेरलभारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में से एक।घुमावदार, कोमल आंगिक अभिनय; मुख की अभिव्यक्ति और हस्त-मुद्राओं को सर्वाधिक महत्व; पारंपरिक पोशाक ‘मुंडू’; परंपरागत रूप से केवल स्त्रियों द्वारा (जबकि कथकली केवल पुरुषों द्वारा)।
बिरजू महाराज की तुलना याद रखिए: “ओडिसी और मणिपुरी में कोमलता है, कथकली में ओज है। कथक में दोनों हैं।” साथ ही वे बताते हैं कि कथक की भाव-भंगिमा दैनिक जीवन से ली गई है और भरतनाट्यम की मूर्तिकला से; भरतनाट्यम में दोनों भावों का प्रयोग एक साथ होता है और कथक में बारी-बारी से।
जोड़कर देखिए: बिरजू महाराज ने सात शैलियाँ गिनाई थीं — कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, मणिपुरी। आठवाँ शास्त्रीय नृत्य सत्रीया (असम) है, जिसका उल्लेख पाठ में नहीं है — इसे भी अपनी सूची में जोड़ लीजिए।
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