प्र1.
(क) बिरजू महाराज— “कथक की पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है। हाँ, उसके प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए हैं।” इस कथन को ध्यान में रखते हुए लिखिए कि कथक की प्रस्तुतियों में किस प्रकार के परिवर्तन आए हैं?
उत्तर
पाठ के अनुसार कथक की आत्मा वही रही, पर उसका प्रस्तुतीकरण कई तरह से बदला —
| पहले | अब |
|---|---|
| मंच नहीं होते थे; फर्श पर ‘चाँदनी’ (बड़ी सफेद चादर) बिछा दी जाती थी और दर्शक चारों ओर बैठते थे। | ऊँचा मंच बनता है, दर्शक सामने की ओर बैठते हैं, प्रकाश और ध्वनि की व्यवस्था होती है। |
| श्रृंगार के लिए चंदनलेप और होंठ रंगने के लिए पान। | आधुनिक मंच-श्रृंगार और वेशभूषा। |
| नर्तक कथा के दृश्यों का इतना विस्तृत वर्णन करते थे कि पूरा दृश्य दर्शक के सामने खिंच जाता था — गोपियों का घड़ा उठाना, पनघट की ओर चलना, कृष्ण का कंकड़ मारना। | केवल “पनघट की गत देखो” कहकर बाकी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है — प्रस्तुति संक्षिप्त और संकेत-प्रधान हो गई। |
| विषय मुख्यत: कृष्ण-लीला और पौराणिक कथाएँ। | टैगोर, त्यागराज जैसे आधुनिक कवियों की रचनाओं पर भी कथक रचनाएँ तैयार की गईं। |
| केवल नाचने की मुद्राएँ। | बिरजू महाराज ने चाचा लोगों और बाबूजी के खड़े होने के अंदाज और भाव-भंगिमाओं को भी कथक में शामिल कर लिया — तीनों की शिक्षा को इकट्ठा करके एक नया रूप बनाया। |
| कथक मंदिरों तक सीमित, कथा कहने का अनौपचारिक ढंग। | कथक मंच की, देश-विदेश की कला बन गया — “भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बिरजू महाराज का स्मरण… किया जाता है।” |
‘परंपरा कायम, प्रस्तुति नई’ का अर्थ: ताल, लय, तत्कार, हस्तक और भाव — यह कथक का व्याकरण है, जिसे उन्होंने छुआ तक नहीं। बदला केवल यह कि वह व्याकरण किस मंच पर, किस विषय पर और कितने विस्तार से दिखाया जाए। वे स्वयं परंपरा को वृक्ष कहते हैं — “वृक्ष से लिए बीज को बोएँ तो समय आने पर ही एक और वृक्ष फलेगा।” नया वृक्ष होगा, पर बीज वही रहेगा।