मल्हार अध्याय 8 कला का संसार

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) बिरजू महाराज— “कथक की पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है। हाँ, उसके प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए हैं।” इस कथन को ध्यान में रखते हुए लिखिए कि कथक की प्रस्तुतियों में किस प्रकार के परिवर्तन आए हैं?
उत्तर

पाठ के अनुसार कथक की आत्मा वही रही, पर उसका प्रस्तुतीकरण कई तरह से बदला —

पहलेअब
मंच नहीं होते थे; फर्श पर ‘चाँदनी’ (बड़ी सफेद चादर) बिछा दी जाती थी और दर्शक चारों ओर बैठते थे।ऊँचा मंच बनता है, दर्शक सामने की ओर बैठते हैं, प्रकाश और ध्वनि की व्यवस्था होती है।
श्रृंगार के लिए चंदनलेप और होंठ रंगने के लिए पान।आधुनिक मंच-श्रृंगार और वेशभूषा।
नर्तक कथा के दृश्यों का इतना विस्तृत वर्णन करते थे कि पूरा दृश्य दर्शक के सामने खिंच जाता था — गोपियों का घड़ा उठाना, पनघट की ओर चलना, कृष्ण का कंकड़ मारना।केवल “पनघट की गत देखो” कहकर बाकी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है — प्रस्तुति संक्षिप्त और संकेत-प्रधान हो गई।
विषय मुख्यत: कृष्ण-लीला और पौराणिक कथाएँ।टैगोर, त्यागराज जैसे आधुनिक कवियों की रचनाओं पर भी कथक रचनाएँ तैयार की गईं।
केवल नाचने की मुद्राएँ।बिरजू महाराज ने चाचा लोगों और बाबूजी के खड़े होने के अंदाज और भाव-भंगिमाओं को भी कथक में शामिल कर लिया — तीनों की शिक्षा को इकट्ठा करके एक नया रूप बनाया।
कथक मंदिरों तक सीमित, कथा कहने का अनौपचारिक ढंग।कथक मंच की, देश-विदेश की कला बन गया — “भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बिरजू महाराज का स्मरण… किया जाता है।”
‘परंपरा कायम, प्रस्तुति नई’ का अर्थ: ताल, लय, तत्कार, हस्तक और भाव — यह कथक का व्याकरण है, जिसे उन्होंने छुआ तक नहीं। बदला केवल यह कि वह व्याकरण किस मंच पर, किस विषय पर और कितने विस्तार से दिखाया जाए। वे स्वयं परंपरा को वृक्ष कहते हैं — “वृक्ष से लिए बीज को बोएँ तो समय आने पर ही एक और वृक्ष फलेगा।” नया वृक्ष होगा, पर बीज वही रहेगा।
प्र2.
(ख) लोकनृत्य और शास्त्रीय नृत्य में क्या अंतर है? लिखिए। (इस प्रश्न के उत्तर के लिए आप अपने सहपाठियों, अभिभावकों, शिक्षकों, पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता भी ले सकते हैं।)
उत्तर
आधारलोक नृत्यशास्त्रीय नृत्य
स्वरूपसामूहिक — सब मिलकर नाचते हैंप्राय: एकल — “एक नर्तक अकेला ही काफ़ी होता है”
उद्देश्यनाचने वालों के अपने मन-बहलाव और संतुष्टि के लिए; दिनभर की थकान दूर करने के लिएदर्शकों के लिए — प्रस्तुति दिखाने के लिए
नियमकोई कठोर शास्त्र नहीं; क्षेत्र की परंपरा से चलता हैनाट्यशास्त्र आदि ग्रंथों के नियमों में बँधा; मुद्राएँ, ताल, हस्तक निश्चित
प्रशिक्षणदेखकर, साथ नाचकर सीख लिया जाता हैवर्षों की गुरु-शिष्य परंपरा और कठोर तालीम आवश्यक
अवसरफसल कटाई, त्योहार, विवाह, उत्सवमंच, नृत्य-सभा, महोत्सव
उदाहरणभांगड़ा (पंजाब), गरबा (गुजरात), बिहू (असम), घूमर (राजस्थान), लावणी (महाराष्ट्र), छऊ (झारखंड/ओडिशा)कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, मणिपुरी, सत्रीया
दोनों में रिश्ता भी है: बिरजू महाराज बताते हैं कि “शुरू में कथावाचक भी लोक नर्तक हुआ करता था। धीरे-धीरे जब उसकी खास शैली व रूप निश्चित होता गया तो वह शास्त्रीय नृत्य हो गया।” यानी शास्त्रीय नृत्य लोक नृत्य का ही परिष्कृत और नियमबद्ध रूप है — वे एक-दूसरे के विरोधी नहीं, एक ही धारा के दो पड़ाव हैं।
प्र3.
(ग) “बैरगिया नाला जुलुम जोर, / नौ कथिक नचावें तीन चोर। / जब तबला बोले धीन-धीन, / तब एक-एक पर तीन-तीन।” इस पाठ में हरिया गाँव में गाए जाने वाले उपर्युक्त पद का उल्लेख है। आप अपने क्षेत्र में गाए जाने वाले किसी लोकगीत को कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

यह प्रस्तुति की गतिविधि है। इसे अच्छे ढंग से करने के लिए यह क्रम अपनाइए —

  1. गीत जुटाइए — घर के बड़ों, दादी-नानी या पड़ोस के किसी बुजुर्ग से पूछिए कि आपके क्षेत्र में किस अवसर पर कौन-सा गीत गाया जाता है — बुआई, कटाई, विवाह, तीज-त्योहार या ऋतु-परिवर्तन पर।
  2. लिख लीजिए — गीत की पंक्तियाँ जैसी बोली जाती हैं, वैसी ही लिखिए। बोली के शब्द बदलिए मत; यही उसकी पहचान है।
  3. अर्थ समझिए — गीत किस अवसर का है, उसमें कौन-सी कहानी या भावना है, यह पहले खुद समझिए। जैसे बैरगिया नाला वाला पद एक घटना सुनाता है — नौ कथिकों ने अपनी कला से तीन डाकुओं को नचा दिया।
  4. ताल पकड़िए — गीत को हाथ से ताल देते हुए गाइए। लोकगीतों की ताल प्राय: सरल होती है (जैसे कहरवा या दादरा)।
  5. कक्षा में प्रस्तुत कीजिए — पहले एक वाक्य में बताइए कि गीत किसका है और कब गाया जाता है, फिर गाइए। चाहें तो समूह में कोरस बनाकर गाइए।
नमूना उत्तर (हरियाणा/पश्चिमी उ.प्र. का वर्षा-गीत):
“काली-काली बदरी उमड़ी आई रे,
हरी-हरी धरती ने ओढ़ी चुनरी रे।
हलधर हाँके बैल, बोवे बाजरा,
अम्मा गावे मंगल, बाजे ढोलकिया रे।”
परिचय: यह गीत पहली बारिश के बाद बुआई के समय गाया जाता है। इसमें बादल, धरती और किसान — तीनों की खुशी एक साथ आती है। इसकी ताल कहरवा है और इसे ढोलक के साथ समूह में गाया जाता है।
पद पर ध्यान दीजिए: बैरगिया नाला वाले पद में “एक-एक पर तीन-तीन” का अर्थ है — तबले की एक थाप पर तीन गुनी गति। यानी नर्तक तिगुन लय में नाच रहे थे। लोकगीत में भी संगीत की यह बारीकी छिपी होती है।
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