मल्हार अध्याय 8 शब्दों का प्रभाव

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
1. “कुछ कथिक डर गए किंतु उन कथिकों की कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कथिकों के कथक में मग्न हो गए।” इस वाक्य में रेखांकित शब्द ‘इतना’ हटाकर वाक्य पढ़िए और पहचानिए कि क्या परिवर्तन आया है?
उत्तर

‘इतना’ हटाने पर वाक्य बनेगा: “कुछ कथिक डर गए किंतु उन कथिकों की कला में दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कथिकों के कथक में मग्न हो गए।”

क्या परिवर्तन आया:

पहलू‘इतना’ के साथ‘इतना’ के बिना
मात्रा का बोधकला में कितना दम था — यह नाप देता हैकेवल इतना कि दम था; कितना, पता नहीं चलता
वाक्य की बनावट‘इतना… कि’ एक जोड़ी है, इसलिए दोनों हिस्से आपस में कस कर जुड़ जाते हैंजोड़ी टूट जाती है, ‘कि’ अकेला रह जाता है और वाक्य अटपटा लगने लगता है
प्रभावचमत्कार का भाव — डाकुओं का ठिठक जाना विश्वसनीय लगता हैबात साधारण सूचना बनकर रह जाती है, अचरज गायब हो जाता है
क्यों: ‘इतना’ एक परिमाणबोधक विशेषण है। यह अकेले नहीं आता, ‘कि’ के साथ जोड़ी बनाकर आता है — “इतना … कि …”। यह जोड़ी कारण और परिणाम को बाँध देती है: कला में इतना दम था — यही कारण; डाकू मग्न हो गए — यही परिणाम। ‘इतना’ हटते ही कारण की मात्रा गायब हो जाती है और परिणाम बेबुनियाद लगने लगता है।
स्वयं परखिए: इन जोड़ों को बोलकर देखिए — “वह इतना थक गया कि सो गया” / “वह थक गया कि सो गया”। दूसरा वाक्य कान को खटकता है। यही ‘इतना’ की ताकत है।
प्र2.
पाठ में आए हुए वाक्यों में से ऐसे ही कुछ और शब्द ढूँढ़कर उन्हें रेखांकित कीजिए जिनके प्रयोग से वाक्य में विशेष प्रभाव उत्पन्न होता है?
उत्तर

पाठ में ऐसे कई शब्द हैं जो वाक्य में बल, मात्रा या आश्चर्य भर देते हैं। नीचे शब्द मोटे अक्षरों में हैं —

पाठ का वाक्यप्रभाव डालने वाला शब्दक्या प्रभाव पड़ता है
“हवेली के दरवाजे पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा होता था।”आठ-आठ‘आठ’ कहने से केवल संख्या मिलती; ‘आठ-आठ’ से हर दरवाजे पर आठ — यानी वैभव कितना बड़ा था, यह दिखता है।
“अम्मा बार-बार यही कहा करती थीं।”बार-बारमाँ का आग्रह कितना गहरा था, यह पुनरुक्ति से ही पता चलता है।
“मैं देख-देखकर कथक सीख गया था।”देख-देखकरएक बार देखने से नहीं, लगातार देखते रहने से — सीखने की प्रक्रिया लंबी थी, यह उभर आता है।
“कथक की परंपरा बहुत पुरानी है।”बहुत‘पुरानी’ की मात्रा बढ़ाकर उसे महाभारत-रामायण तक ले जाता है।
जरा भी गड़बड़ी हुई नहीं कि उसका हाथ गया।”जरा भीछोटी-से-छोटी चूक की भी गुंजाइश नहीं — लय की कठोरता तीखी हो जाती है।
“मैंने अपनी बेटियों को खूब सिखाया।”खूब‘सिखाया’ भर कहते तो सामान्य बात होती; ‘खूब’ से भरपूर, दिल खोलकर सिखाने का भाव आता है।
अब सिर्फ ‘पनघट की गत देखो’ कहकर बाकी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है।”सिर्फपहले और अब के अंतर को तेज कर देता है — पहले विस्तृत वर्णन, अब केवल संकेत।
“लड़कियों के पास … कोई-न-कोई हुनर अवश्य होना चाहिए।”अवश्यसलाह को आग्रह में बदल देता है — यह विकल्प नहीं, आवश्यकता है।
पहचान का नियम: ऐसे शब्द प्राय: तीन तरह के होते हैं — (1) पुनरुक्त शब्द (आठ-आठ, बार-बार, कभी-कभी, धीरे-धीरे, एक-एक), (2) परिमाणबोधक (इतना, बहुत, खूब, जरा भी), और (3) बल देने वाले (ही, भी, सिर्फ, अवश्य, बिलकुल)। इन्हें हटाकर वाक्य पढ़िए — यदि अर्थ रह जाए पर असर चला जाए, तो समझिए वही शब्द विशेष प्रभाव पैदा कर रहा था।
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