प्र1.
इस पाठ का शीर्षक ‘बिरजू महाराज से साक्षात्कार’ है। यदि आप इस साक्षात्कार को कोई अन्य नाम देना चाहते हैं तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा? लिखिए।
उत्तर
अच्छा शीर्षक वह है जो पाठ के केंद्रीय भाव को दो-तीन शब्दों में पकड़ ले। इस साक्षात्कार में सबसे बार-बार लौटने वाला शब्द है — लय। इसलिए शीर्षक भी लय, साधना या विरासत के आसपास होना चाहिए।
| संभावित शीर्षक | यह नाम क्यों |
|---|---|
| लय के महाराज | पूरा साक्षात्कार लय पर टिका है — “लय हर काम में, नृत्य में, जीवन में संतुलन बनाए रखती है।” और ‘महाराज’ उनके नाम का ही हिस्सा है। |
| जीवन की लय | क्योंकि वे लय को केवल नृत्य तक सीमित नहीं मानते — घसियारे के हँसिया चलाने में भी उन्हें लय दिखती है। |
| चना मिले या न मिले, अभ्यास जरूर करो | अम्मा का यह वाक्य पूरे साक्षात्कार की आत्मा है — कठिन दिनों में भी साधना न छोड़ने का संदेश। |
| विरासत से मंच तक | कथक उन्हें विरासत में मिला और उन्होंने उसे विदेशों के मंचों तक पहुँचाया — पूरी यात्रा इसी में आ जाती है। |
नमूना उत्तर: मैं इस साक्षात्कार को ‘लय के महाराज’ नाम दूँगा/दूँगी। यह नाम मैंने इसलिए सोचा क्योंकि बिरजू महाराज बार-बार लय की बात करते हैं — बचपन में चाचा ने कहा था “लड़के के हाथ में लय है”, बीच में वे कहते हैं कि हर गतिविधि में लय होती है, और अंत में बच्चों से कहते हैं कि “लय हमें अनुशासन सिखाती है, संतुलन सिखाती है।” जो शब्द पूरे पाठ में सबसे अधिक चमकता है, वही शीर्षक बनने योग्य है। साथ ही ‘महाराज’ शब्द उनके नाम की भी याद दिलाता है, इसलिए यह नाम पाठ और व्यक्ति — दोनों को एक साथ पकड़ लेता है।
ध्यान रखें: शीर्षक बदलते समय दो कसौटियाँ लगाइए — (1) क्या यह नाम पूरे पाठ पर लागू होता है, केवल एक अनुच्छेद पर नहीं? (2) क्या यह पढ़ने वाले के मन में जिज्ञासा जगाता है? दोनों उत्तर ‘हाँ’ हों, तभी शीर्षक अच्छा है।