मल्हार अध्याय 8 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
साक्षात्कार में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार लिखिए। — “तुम नौकरी में बँट जाओगे। तुम्हारे अंदर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा।”
उत्तर

यह बात बिरजू महाराज के चाचा ने तब कही थी, जब उन्होंने नौकरी शुरू की।

सीधा अर्थ: नौकरी करोगे तो तुम्हारा समय, ध्यान और ऊर्जा दो हिस्सों में बँट जाएँगे — कुछ दफ्तर में, कुछ नृत्य में। जो कला पूरा मन माँगती है, उसे आधा मन मिलेगा और इसलिए भीतर का कलाकार पूरी ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाएगा।

‘बँट जाओगे’ और ‘पनप नहीं पाएगा’ — दो सुंदर शब्द: ‘बँटना’ शब्द बताता है कि व्यक्ति एक ही है, पर उसे दो जगह देना पड़ेगा। ‘पनपना’ पौधे के लिए आने वाला शब्द है — यानी कला भीतर एक पौधे की तरह है, जिसे पूरा पानी, पूरी धूप और पूरा समय चाहिए। आधी देखभाल में पौधा जीवित तो रह जाएगा, पर फलेगा-फूलेगा नहीं।

मेरे विचार: चाचा की चिंता सच्ची थी, पर बिरजू महाराज ने इसका उत्तर छोड़ने से नहीं, और अधिक मेहनत से दिया — “मैंने दृढ़ निश्चय किया था कि ‘महाराज’ बनना है तो उसके लिए मेहनत भी करनी होगी।” वे स्वयं भी कहते हैं कि यह “अपने सामर्थ्य पर निर्भर करता है”, और उदाहरण देते हैं अपनी शिष्या शोभना नारायण का, जो आई.ए.एस. अफसर भी हैं और अच्छी नर्तकी भी। इसलिए इस पंक्ति से यह सीख मिलती है कि दो काम एक साथ करना असंभव नहीं, पर उसकी कीमत दुगुनी मेहनत से चुकानी पड़ती है।

प्र2.
“नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है।”
उत्तर

अर्थ: नर्तक के लिए उसका शरीर केवल हाथ-पैर हिलाने का यंत्र नहीं है — वही उसका साधन है, जैसे चित्रकार के लिए तूलिका और गायक के लिए गला। और यह साधन तीन चीजों से तैयार होता है — शरीर की साधना, मन का ध्यान (एकाग्रता) और वर्षों की तपस्या (कठोर अभ्यास)।

शब्दनृत्य में उसका अर्थपाठ से उदाहरण
शरीरभाव प्रकट करने का माध्यम — गर्दन, उँगलियाँ, पैर, आँखें“कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है”
ध्यानएकाग्रता — लय से जरा भी न भटकना“मारने और हटाने की इस लय में जरा भी गड़बड़ी हुई नहीं कि उसका हाथ गया।”
तपस्यालगातार, बिना छुट्टी का अभ्यास“खाने को भले ही चना मिले या कुछ भी न मिले पर अभ्यास जरूर करो।”
गहरी बात: इसी पंक्ति के तुरंत बाद बिरजू महाराज कहते हैं — “नृत्य करना एक तरह से अदृश्य शक्ति को निमंत्रण देना है।” यानी वे नृत्य को मनोरंजन नहीं, एक प्रकार की उपासना मानते हैं। जिस तरह तपस्वी अपने शरीर को साधकर ईश्वर तक पहुँचता है, उसी तरह नर्तक अपने शरीर को साधकर कला तक पहुँचता है।
प्र3.
“कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है, चिराग की लौ के समान।”
उत्तर

अर्थ: कथक में गर्दन का संचालन झटके से नहीं, बहुत कोमल और थरथराती-सी गति से होता है — ठीक वैसे जैसे दीये की लौ हवा में हौले-हौले काँपती है।

यह कौन-सा अलंकार है: यहाँ ‘के समान’ शब्द से गर्दन की गति की तुलना चिराग की लौ से की गई है — यह उपमा (simile) है। उपमेय = गर्दन की गति, उपमान = चिराग की लौ, वाचक शब्द = ‘के समान’, साधारण धर्म = हल्के-हल्के हिलना।

यह उपमा इतनी सटीक क्यों है: लौ की गति की तीन विशेषताएँ हैं — वह धीमी है, निरंतर है और उसमें एक भीतरी प्रकाश है। कथक की गर्दन-गति भी ऐसी ही है — धीमी, लगातार और चेहरे पर भाव की चमक लिए हुए। साथ ही लौ कभी टूटती नहीं, बस लहराती है; गर्दन भी झटका नहीं खाती, बस लहराती है।

इससे जुड़ी बात: ठीक आगे बिरजू महाराज उँगलियों की भी ऐसी ही कोमल गति बताते हैं — “जैसे घूँघट पकड़ने में या घूँघट उठाने में।” और चाचा जी की टोक भी याद रखने योग्य है — “घूँघट उठा रहे हो या तंबू?” इससे समझ आता है कि कथक में कोमलता ही असली कठिन काम है।
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