यह बात बिरजू महाराज के चाचा ने तब कही थी, जब उन्होंने नौकरी शुरू की।
सीधा अर्थ: नौकरी करोगे तो तुम्हारा समय, ध्यान और ऊर्जा दो हिस्सों में बँट जाएँगे — कुछ दफ्तर में, कुछ नृत्य में। जो कला पूरा मन माँगती है, उसे आधा मन मिलेगा और इसलिए भीतर का कलाकार पूरी ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाएगा।
मेरे विचार: चाचा की चिंता सच्ची थी, पर बिरजू महाराज ने इसका उत्तर छोड़ने से नहीं, और अधिक मेहनत से दिया — “मैंने दृढ़ निश्चय किया था कि ‘महाराज’ बनना है तो उसके लिए मेहनत भी करनी होगी।” वे स्वयं भी कहते हैं कि यह “अपने सामर्थ्य पर निर्भर करता है”, और उदाहरण देते हैं अपनी शिष्या शोभना नारायण का, जो आई.ए.एस. अफसर भी हैं और अच्छी नर्तकी भी। इसलिए इस पंक्ति से यह सीख मिलती है कि दो काम एक साथ करना असंभव नहीं, पर उसकी कीमत दुगुनी मेहनत से चुकानी पड़ती है।