बिरजू महाराज का जन्म ही कथक के घर में हुआ था। उनके पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज — तीनों प्रसिद्ध कथक नर्तक थे। इसलिए घर में दिन-रात कथक का माहौल रहता था।
वे स्वयं कहते हैं — “घर में चूँकि कथक का माहौल था, अत: औपचारिक प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही मैं देख-देखकर कथक सीख गया था और नवाब के दरबार में नाचने भी लगा था।”
क्यों ऐसा हो सका: छोटे बच्चे नकल से सीखते हैं। जिस घर में हर समय तबले की थाप, घुँघरू की झनकार और तत्कार की आवाज हो, वहाँ बच्चा भाषा की तरह ही ताल-लय भी अपने-आप सीख जाता है। यही कारण है कि पाठ के आरंभ में कहा गया है — “कथक की कला उन्हें विरासत में मिली थी।”
प्रमाण: चाचा ने बहुत छुटपन में ही ताड़ लिया था — “लड़के के हाथ में लय है।” और पाँच साल का होते-होते वे हारमोनियम पर लहरा बजाने लगे थे। यह सब गंडा बँधने यानी औपचारिक तालीम शुरू होने से पहले की बात है।