मल्हार अध्याय 8 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
1. साक्षात्कार को एक बार पुन: पढ़िए और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए। (क) बिरजू महाराज नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण आरंभ होने से पहले ही कथक कैसे सीख गए थे?
उत्तर

बिरजू महाराज का जन्म ही कथक के घर में हुआ था। उनके पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज — तीनों प्रसिद्ध कथक नर्तक थे। इसलिए घर में दिन-रात कथक का माहौल रहता था।

वे स्वयं कहते हैं — “घर में चूँकि कथक का माहौल था, अत: औपचारिक प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही मैं देख-देखकर कथक सीख गया था और नवाब के दरबार में नाचने भी लगा था।”

क्यों ऐसा हो सका: छोटे बच्चे नकल से सीखते हैं। जिस घर में हर समय तबले की थाप, घुँघरू की झनकार और तत्कार की आवाज हो, वहाँ बच्चा भाषा की तरह ही ताल-लय भी अपने-आप सीख जाता है। यही कारण है कि पाठ के आरंभ में कहा गया है — “कथक की कला उन्हें विरासत में मिली थी।”
प्रमाण: चाचा ने बहुत छुटपन में ही ताड़ लिया था — “लड़के के हाथ में लय है।” और पाँच साल का होते-होते वे हारमोनियम पर लहरा बजाने लगे थे। यह सब गंडा बँधने यानी औपचारिक तालीम शुरू होने से पहले की बात है।
प्र2.
(ख) नृत्य सीखने के लिए संगीत की समझ होना क्यों अनिवार्य है?
उत्तर

क्योंकि गाना, बजाना और नाचना — तीनों एक ही चीज के तीन हिस्से हैं। बिरजू महाराज कहते हैं, “गाना, बजाना और नाचना — ये तीनों संगीत का हिस्सा हैं। संगीत में लय होती है। उसका ज्ञान आवश्यक है।”

तीन ठोस कारण:

  1. लय के बिना नृत्य नहीं बनता। नृत्य पैरों की गति को ताल पर बाँधना है। जिसे ताल की समझ नहीं, उसके पैर संगत से बाहर चले जाएँगे।
  2. नर्तक को अपनी संगत परखनी होती है। पाठ की पंक्ति है — “अगर नर्तक को सुर-ताल की समझ है तो वह जान पाएगा कि यह लहरा ठीक नहीं है।” यानी वह पहचान लेगा कि साथ बज रही धुन गलत है और उसे सुधरवा सकेगा।
  3. संगीत नृत्य को ‘भीतर’ ले जाता है। बिरजू महाराज कहते हैं कि सुर-ताल की समझ न हो तो “नृत्य अंगों में प्रवेश नहीं करेगा” — अर्थात नृत्य ऊपर-ऊपर की नकल रह जाएगा, शरीर के भीतर तक नहीं उतरेगा।
व्यापक अर्थ: उनके अनुसार लय केवल मंच पर नहीं, जीवन में भी है — घसियारा घास पकड़कर हँसिया मारता है और हटाता है; इस लय में जरा-सी गड़बड़ हुई तो हाथ कट जाए। इसलिए लय की समझ केवल कलाकार की नहीं, हर काम करने वाले की जरूरत है।
प्र3.
(ग) नृत्य के अतिरिक्त बिरजू महाराज को और किन-किन कार्यों में रुचि थी?
उत्तर

बिरजू महाराज बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। नृत्य के अलावा उनकी रुचियाँ इस प्रकार थीं —

रुचिपाठ में क्या कहा गया
गायन और वादन“मैं नृत्य के साथ-साथ बजाता और गाता भी हूँ।” बचपन में तबला पीटना, पाँच साल की उम्र में हारमोनियम पर लहरा, फिल्मी गाने गाना।
नृत्य-नाटिकाओं की रचना और संगीत-निर्देशन“नृत्य नाटिकाएँ और उनके लिए संगीत भी तैयार करता हूँ।” टैगोर, त्यागराज आदि कवियों की रचनाओं पर कथक रचनाएँ बनाईं।
मशीनें और यंत्र खोलना-सुधारना“मशीनों में मन खूब लगता है। अगर मैं नर्तक न होता तो शायद इंजीनियर होता।” ब्रीफकेस में हरदम पेचकस और छोटे औजार रखते थे; अपना पंखा-फ्रिज खुद ठीक करते थे।
चित्रकारी (पेंटिंग)बेटी-दामाद चित्रकार हैं, उन्हें देखकर शौक लगा। प्राय: रात बारह बजे के बाद चित्र बनाने बैठते थे — “पिछले दो वर्षों में लगभग सत्तर चित्र बनाए हैं।”
शिक्षणवर्षों तक शिष्यों को नृत्य सिखाया; शोभना नारायण जैसी शिष्याएँ तैयार कीं।
ध्यान देने की बात: वे कहते हैं — “खाली तो होता ही नहीं हूँ। नींद में भी हाथ चलता रहता है।” यही एक सच्चे कलाकार की पहचान है — उसका मन कभी बेकार नहीं बैठता, वह हर चीज में कुछ न कुछ खोजता रहता है।
प्र4.
(घ) बिरजू महाराज ने बच्चों की शिक्षा और रुचियों के बारे में अभिभावकों से क्या कहा है?
उत्तर

उन्होंने अभिभावकों से विनती के स्वर में कहा है — “यदि बच्चे की रुचि है तो उसे लय के साथ खेलने दें।”

उनकी बात के चार हिस्से हैं —

  1. कला को खेल मानिए। “जैसे अन्य खेल हैं वैसे ही यह भी एक खेल है, जिसमें बहुत-कुछ सीखने को मिलता है।” यानी संगीत-नृत्य को पढ़ाई का दुश्मन न समझें।
  2. यह बौद्धिक विकास करती है। “इस खेल की दुनिया में संतुलन, समय का अंदाजा व सदुपयोग बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।”
  3. लड़कियों को अवश्य हुनर दें। “लड़कियों के पास शिक्षा या कोई-न-कोई हुनर अवश्य होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर हो सकें। हुनर ऐसा खज़ाना है, जिसे कोई नहीं छीन सकता।”
  4. मन की शांति के लिए भी जरूरी है। बच्चों से सीधे कहते हैं — “यदि नहीं तो ज़रूर सीखो। मन की शांति के लिए यह बहुत जरूरी है।”
अंतिम संदेश: “लय हमें अनुशासन सिखाती है, संतुलन सिखाती है… सुर और लय से हमें एक-दूसरे का सहयोगी बनकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।” — यानी कला केवल हुनर नहीं, चरित्र भी बनाती है।
प्र5.
2. पाठ में से उन प्रसंगों की पहचानकर उन पर चर्चा कीजिए, जिनसे पता चलता है कि— (क) बिरजू महाराज बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।
उत्तर

पाठ में कम-से-कम छह प्रसंग ऐसे हैं जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा दिखाते हैं —

  1. तीन कलाएँ एक साथ — “मैं नृत्य के साथ-साथ बजाता और गाता भी हूँ।” नर्तक, वादक और गायक — तीनों एक व्यक्ति में।
  2. रचनाकार — नृत्य नाटिकाएँ बनाना और उनके लिए संगीत तैयार करना; टैगोर और त्यागराज जैसे भिन्न-भिन्न भाषाओं के कवियों की रचनाओं पर कथक रचना करना।
  3. परंपरा में नवाचार — “कथक की पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है। हाँ, उसके प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए हैं।” चाचा और बाबूजी के खड़े होने के अंदाज को भी कथक में शामिल कर लिया।
  4. यंत्रों का ज्ञान — “अगर मैं नर्तक न होता तो शायद इंजीनियर होता।” ब्रीफकेस में पेचकस; पंखा-फ्रिज खुद ठीक करना।
  5. चित्रकार — रात बारह बजे के बाद चित्र बनाना; दो वर्षों में लगभग सत्तर चित्र।
  6. शिक्षक — गंडा बाँधने की परंपरा को नई दृष्टि देना और शोभना नारायण जैसी शिष्याएँ तैयार करना।
चर्चा का सूत्र: कक्षा में यह प्रश्न उठाइए — क्या इतनी सारी रुचियाँ रखने से मुख्य काम कमजोर नहीं पड़ जाता? पाठ इसका उत्तर देता है: नहीं, क्योंकि उनकी हर रुचि की जड़ एक ही है — लय और संतुलन। मशीन के पुर्जों में भी लय है, चित्र की रेखाओं में भी।
प्र6.
(ख) बिरजू महाराज को नृत्य की ऊँचाइयों तक पहुँचाने में उनकी माँ का बहुत योगदान रहा।
उत्तर

माँ का योगदान पाठ में तीन स्पष्ट प्रसंगों से सिद्ध होता है —

प्रसंगपाठ की पंक्तिइससे क्या पता चलता है
संघर्ष में सहारा“संघर्षों के दौर में मेरी सबसे बड़ी सहयोगी मेरी माँ थीं।”पिता के देहांत के बाद पूरा घर उन्हीं के बल पर टिका।
गुजारे का प्रबंध“कभी कर्ज लेते थे तो कभी पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर उनके सोने-चाँदी के तार बेचते थे।”अपनी साड़ियाँ तक जला दीं, पर बेटे की तालीम रुकने नहीं दी।
गंडा बँधवाना“अम्मा ने मेरे दो कार्यक्रमों की कमाई बाबूजी को भेंट के रूप में दे दी।”बाबूजी ने कहा था — “भेंट मिलने पर ही गंडा बाँधूँगा।” यदि अम्मा वह भेंट न जुटातीं तो औपचारिक तालीम शुरू ही न होती।
अभ्यास की प्रेरणा“खाने को भले ही चना मिले या कुछ भी न मिले पर अभ्यास जरूर करो।”भूख से भी ऊपर उन्होंने साधना को रखा — यही वाक्य पूरे जीवन का मंत्र बन गया।
निष्कर्ष: पिता और चाचा ने कला सिखाई, पर माँ ने वह परिस्थिति बनाए रखी जिसमें सीखना संभव हो सका। इसीलिए कहा जा सकता है कि उन्हें ऊँचाई तक पहुँचाने में माँ का योगदान सबसे बड़ा था।
प्र7.
(ग) बिरजू महाराज महिलाओं के लिए समानता के पक्षधर थे।
उत्तर

इसके तीन प्रमाण पाठ में मिलते हैं —

  1. अपनी बेटियों को कथक सिखाया। “मेरी बहनों को कथक नहीं सिखाया गया पर मैंने अपनी बेटियों को खूब सिखाया।” यहाँ वे स्वयं यह अंतर स्वीकार करते हैं और अपनी पीढ़ी में उसे बदल देते हैं।
  2. आत्मनिर्भरता पर जोर। “लड़कियों के पास शिक्षा या कोई-न-कोई हुनर अवश्य होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर हो सकें। हुनर ऐसा खज़ाना है, जिसे कोई नहीं छीन सकता और वक्त पड़ने पर काम आता है।”
  3. शिष्या को उदाहरण बनाकर पेश करना। जब पूछा गया कि क्या पढ़ाई या नौकरी के साथ नृत्य चल सकता है, तो उन्होंने उदाहरण एक महिला का दिया — “मेरी शिष्या शोभना नारायण आई.ए.एस. अफसर हैं और अच्छी नर्तकी भी।”
चर्चा के लिए: ध्यान दीजिए कि वे केवल ‘लड़कियों को भी मौका मिलना चाहिए’ नहीं कहते; वे कारण भी देते हैं — हुनर वह संपत्ति है जो छीनी नहीं जा सकती। यह तर्क आज भी उतना ही सच है। कक्षा में इस पर बात कीजिए कि आपके आस-पास कौन-कौन-से हुनर लड़कियों को आत्मनिर्भर बना रहे हैं।
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