मल्हार अध्याय 8 सृजन

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपके विद्यालय में कथक नृत्य का आयोजन होने जा रहा है। (क) आप दर्शकों को कथक नृत्यकला के बारे में क्या-क्या बताएँगे? लिखिए।
उत्तर

दर्शकों को कथक का परिचय देते समय पाँच बातें अवश्य आनी चाहिए — नाम का अर्थ, उद्गम, घराने, विशेषताएँ और देखने का तरीका

नमूना उत्तर (मंच से बोलने के लिए):
“आदरणीय अतिथियो और साथियो, आज आप जो नृत्य देखने जा रहे हैं, उसका नाम है कथक। ‘कथक’ शब्द ‘कथिक’ से बना है, जिसका अर्थ है कथावाचक — यानी कहानी सुनाने वाला। बहुत पहले मंदिरों में कथिक रामायण और महाभारत की कथाएँ संगीत और भाव-भंगिमाओं के साथ सुनाते थे; वही धीरे-धीरे कथक बन गया।

कथक ब्रजभूमि की रासलीला से उपजा है। इसके तीन प्रमुख घराने हैं — लखनऊ, जयपुर और बनारस। लखनऊ घराने के सबसे बड़े नाम रहे पंडित बिरजू महाराज, जिन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया।

कथक की पहचान है — तेज चक्कर, पैरों का तत्कार यानी घुँघरुओं से निकलने वाली ताल, और चेहरे के कोमल भाव। इसमें गर्दन ‘चिराग की लौ के समान’ हल्के-से हिलती है और उँगलियाँ ऐसे चलती हैं जैसे घूँघट उठाया जा रहा हो। इसकी सबसे रोमांचक चीज है जुगलबंदी — जिसमें तबलावादक और नर्तक के बीच मानो प्रतियोगिता चलती है: तबला जो बोलता है, पैर वही दोहरा देते हैं।

आपसे निवेदन है कि प्रस्तुति के समय ताल पर ध्यान दीजिए — घुँघरू और तबला जब एक साथ रुकते हैं, वही क्षण कथक का सबसे सुंदर क्षण होता है। धन्यवाद!”
अच्छे परिचय का ढाँचा: क्या → कहाँ से आया → कौन-कौन बड़े नाम → क्या खास देखना है → धन्यवाद। पाँच मिनट से लंबा परिचय दर्शकों को थका देता है।
प्र2.
(ख) इस कार्यक्रम की सूचना देने के लिए एक विज्ञापन तैयार कीजिए।
उत्तर

विज्ञापन में पाँच सूचनाएँ अनिवार्य हैं — क्या, कौन, कब, कहाँ और कैसे आएँ। भाषा छोटी, आकर्षक और सीधी हो।

नमूना विज्ञापन:
घुँघरू बोलेंगे!
कथक संध्या 2026

राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, नयागाँव

प्रस्तुति: लखनऊ घराने की कथक नृत्यांगना सुश्री ______ एवं विद्यालय के विद्यार्थी
संगत: तबला, सारंगी एवं हारमोनियम

दिनांक: शनिवार, 14 नवंबर
समय: सायं 5:00 बजे
स्थान: विद्यालय का सभागार

प्रवेश नि:शुल्क · सभी के लिए खुला
दिव्यांग दर्शकों हेतु विशेष व्यवस्था उपलब्ध

“लय हमें अनुशासन सिखाती है, संतुलन सिखाती है।” — पंडित बिरजू महाराज

संपर्क: सांस्कृतिक सचिव, विद्यालय कार्यालय
विज्ञापन की तीन कसौटियाँ: (1) क्या सबसे ऊपर की पंक्ति पढ़ते ही आयोजन का नाम समझ आता है? (2) क्या तारीख, समय और स्थान एक नज़र में दिख जाते हैं? (3) क्या कोई ऐसी पंक्ति है जो पढ़ने वाले को आने के लिए ललचाए? यहाँ “घुँघरू बोलेंगे!” और बिरजू महाराज का उद्धरण यही काम करते हैं।
प्र3.
(ग) यदि इस नृत्य कार्यक्रम में कोई दृष्टिबाधित दर्शक है और वह नृत्य का आनंद लेना चाहे तो इसके लिए विद्यालय की ओर से क्या व्यवस्था की जानी चाहिए?
उत्तर

दृष्टिबाधित दर्शक नृत्य को कान, स्पर्श और शब्दों से ‘देख’ सकता है। विद्यालय ये व्यवस्थाएँ कर सकता है —

व्यवस्थायह क्यों काम करती है
ऑडियो-वर्णन (Audio Description) — एक व्यक्ति धीमे स्वर में साथ-साथ बताता रहे कि मंच पर क्या हो रहा है: “अब नर्तकी दाहिनी ओर मुड़ी… अब तीन चक्कर…”यह वही तरीका है जो पुराने कथक में स्वयं मौजूद था — पहले नर्तक दृश्य का ऐसा विस्तृत वर्णन करते थे कि “पूरा दृश्य खिंच जाता था”।
आगे की पंक्ति में बैठाना और अच्छी ध्वनि-व्यवस्थाघुँघरू और तत्कार की आवाज सबसे स्पष्ट सुनाई देगी — कथक का आधा आनंद तो ध्वनि में ही है।
प्रस्तुति से पहले परिचय — कथा, पात्र, वेशभूषा और मुद्राएँ शब्दों में समझा देनाकहानी पहले से पता हो तो केवल ताल सुनकर भी दृश्य मन में बन जाता है।
स्पर्श-अनुभव — कार्यक्रम से पहले या बाद में घुँघरू, तबला, हारमोनियम और वेशभूषा को छूकर देखने का अवसरवस्तु का आकार-भार हाथ से जान लेने पर ध्वनि का अर्थ खुल जाता है।
ब्रेल या बड़े अक्षरों में कार्यक्रम-पत्रिका; ऑडियो रूप में भीवे भी बाकी दर्शकों की तरह क्रम जान सकेंगे।
मंच के पास मंच-कंपन महसूस करने की जगह — लकड़ी के मंच के निकट बैठने की व्यवस्थातत्कार की थाप फर्श से होकर शरीर तक पहुँचती है — ताल ‘महसूस’ की जा सकती है।
सहायक साथी और बाधामुक्त रास्ता — प्रवेश से सीट तकसम्मानपूर्वक और स्वतंत्र रूप से आना-जाना संभव हो।
मूल बात: सुविधा का उद्देश्य दया दिखाना नहीं, बराबरी देना है। बिरजू महाराज कहते हैं कि नृत्य में लय ही सब कुछ है — और लय सुनी जा सकती है। इसलिए थोड़ी-सी व्यवस्था से दृष्टिबाधित दर्शक भी कथक का पूरा आनंद ले सकता है।
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