मल्हार अध्याय 8 पढ़ने के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
‘नृत्यांगना सुधा चंद्रन’ — रामाज्ञा तिवारी (पाठ के अंत में ‘पढ़ने के लिए’ दिया गया गद्यांश)। इसे पढ़िए और समझिए कि यह पाठ के साथ क्यों जोड़ा गया है।
उत्तर

कथासार: सुधा चंद्रन के माता-पिता — श्रीमती थंगम और श्री के. डी. चंद्रन — चाहते थे कि उनकी बेटी राष्ट्रीय ख्याति की नृत्यांगना बने। इसलिए पाँच वर्ष की अल्पायु में ही उन्हें मुंबई के प्रसिद्ध नृत्य विद्यालय ‘कला-सदन’ में भर्ती कराया गया। शिक्षकों को पहले हिचकिचाहट हुई, पर श्री के.एस. रामास्वामी भागवतार ने उनकी प्रतिभा देखकर उन्हें शिष्या बना लिया।

2 मई, 1981 को तिरुचिरापल्ली से मद्रास जाते समय बस दुर्घटना में उनका बायाँ पाँव टूटा और दाएँ पाँव में ‘गैंग्रीन’ हो गया। दुर्घटना के एक महीने बाद दायाँ पैर घुटने से साढ़े सात इंच नीचे से काटना पड़ा। लकड़ी के गुटके और बैसाखियों के सहारे चलते हुए उन्होंने फिर पढ़ाई शुरू की।

फिर वे जयपुर जाकर कृत्रिम अंग विशेषज्ञ डॉ. पी.सी. सेठी से मिलीं। उनके प्रश्न — “क्या मैं नाच सकूँगी?” — का उत्तर डॉ. सेठी ने दिया, “क्यों नहीं, प्रयास करो तो सब कुछ संभव है।” पहले अल्यूमिनियम का पैर बना, पर अभ्यास में ठूँठ से खून रिसने लगा। तब डॉ. सेठी ने उनके नृत्य प्रशिक्षक के साथ बैठकर पाँवों की मुद्राएँ परखीं और नृत्य की जरूरतों के अनुसार नया पैर बनवाया। पैर लगाते समय उन्होंने कहा — “मैं जो कुछ कर सकता था मैंने कर दिया, अब तुम्हारी बारी है।”

28 जनवरी, 1984 को मुंबई के ‘साउथ इंडिया वेलफेयर सोसायटी’ के हॉल में उन्होंने नर्तकी प्रीति के साथ फिर सार्वजनिक प्रदर्शन किया — और वह अत्यंत सफल रहा। उनके जीवन पर तेलुगु फिल्म ‘मयूरी’ बनी, जिसमें उन्होंने स्वयं अभिनय किया और 33वें राष्ट्रीय फिल्म समारोह में विशेष पुरस्कार पाया। हिंदी में यही फिल्म ‘नाचे मयूरी’ नाम से आई।

यह गद्यांश यहाँ क्यों दिया गया है: बिरजू महाराज का साक्षात्कार कहता है कि कला कठिन साधना माँगती है — “अपने जीवन में प्राप्त सफलताओं के लिए उन्होंने कठिन साधना की थी।” सुधा चंद्रन की कहानी उसी बात का दूसरा और और भी कठिन उदाहरण है। एक ने गरीबी से लड़कर कला बचाई, दूसरी ने शारीरिक अक्षमता से लड़कर। दोनों की जड़ एक है — अभ्यास कभी मत छोड़ो
सीख: लेखक की पहली ही पंक्ति पूरे गद्यांश का सार है — “जीवन के किसी भी क्षेत्र में शिखर तक पहुँचने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और कठिन परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है।” साथ ही यह कहानी बताती है कि सफलता अकेले की नहीं होती — माता-पिता, गुरु और डॉ. सेठी जैसे लोग मिलकर उसे संभव बनाते हैं। यही बात ‘सृजन’ वाले प्रश्न (ग) से भी जुड़ती है, जिसमें दृष्टिबाधित दर्शक के लिए व्यवस्था करने को कहा गया है।
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