प्र1.
“वर्षा-बहार सब के, मन को लुभा रही है” — इस पंक्ति में रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। ‘वर्षा’ एक ऋतु का नाम है। ‘बहार’ ‘वसंत’ का दूसरा नाम है। यहाँ ‘वर्षा’ और ‘बहार’ को एक साथ दिया गया है जिससे वर्षा ऋतु की सुंदरता को स्पष्ट किया जा सके। इस कविता में ऐसी ही अन्य विशेषताएँ छिपी हैं, जैसे— कविता की कुछ पंक्तियाँ सरल वाक्य के रूप में ही हैं तो कुछ में वाक्य संरचना सरल नहीं है। अपने समूह के साथ मिलकर इस कविता की अन्य विशेषताओं की सूची बनाइए। अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।
उत्तर
समूह-कार्य में जो सूची बन सकती है, वह इस प्रकार है —
| विशेषता | कविता से उदाहरण | क्या असर पड़ता है |
|---|---|---|
| हर पद दो-दो पंक्तियों का है और दोनों पंक्तियों के अंत में तुक मिलती है | रही है – रही है; रहे हैं – बहे हैं; सब – अब; होते – खोते; सारे – प्यारे; सुंदर – मनहर | पढ़ने में लय बनती है और कविता आसानी से याद हो जाती है। |
| हर पंक्ति के बीच में एक विराम (अल्पविराम) है | “बिजली चमक रही है, / बादल गरज रहे हैं” | पंक्ति दो बराबर टुकड़ों में बँट जाती है, जिससे गाते समय एक निश्चित ताल मिलती है। |
| कुछ पंक्तियाँ बिलकुल सरल वाक्य हैं | “पानी बरस रहा है”, “बिजली चमक रही है” | बात सीधे समझ में आ जाती है — जैसे कोई खिड़की से बाहर देखकर बता रहा हो। |
| कुछ पंक्तियों में शब्दों का क्रम उलटा है (व्यतिक्रम) | “तालों में जीव जलचर, अति हैं प्रसन्न होते” (सीधा क्रम — तालों में जलचर जीव अति प्रसन्न होते हैं) | तुक मिलाने के लिए क्रम बदला गया है; इससे कविता में एक पुराना, गीत जैसा रंग आ जाता है। |
| विशेषण अपने विशेष्य के बाद रखा गया है | “छटा अनूठी”, “कतार सुंदर”, “सुगीत प्यारे”, “हवा है ठंडी” | जिस शब्द पर ज़ोर देना है, वह पंक्ति के अंत में आ जाता है। |
| तत्सम (संस्कृत से आए) शब्दों का प्रयोग | नभ, जलचर, सौरभ, आमोद, मनहर, जगत, शोभा | कविता को गरिमा और मिठास मिलती है। |
| पाठक को साथ लेकर चलने वाले शब्द | “लखो”, “देखो”, “कैसा”, “कैसे” | लगता है कवि हमें उँगली पकड़कर दृश्य दिखा रहा है। |
| मानवीकरण — प्रकृति मनुष्य की तरह काम करती है | गुलाब ‘सौरभ उड़ा रहा है’, मेंढक ‘सुगीत’ गा रहे हैं, हंस ‘कतार बाँधे’ हैं | प्रकृति सजीव और अपनी-सी लगने लगती है। |
| अनुप्रास — एक ही वर्ण की आवृत्ति | “गाते हैं गीत”, “सब के... सुंदर... सौरभ” | पंक्ति कानों को अच्छी लगती है। |
| कविता का ढाँचा — पहले आकाश, फिर धरती, फिर जल, फिर वन, अंत में मनुष्य | नभ → पानी/झरने → ताल → वन → खेत → “सारे जगत की शोभा” | कैमरे की तरह दृश्य धीरे-धीरे ऊपर से नीचे और दूर से पास आता है, और अंत में एक निष्कर्ष पर रुकता है। |
साझा करते समय: हर विशेषता के साथ कविता की एक पंक्ति ज़रूर पढ़िए। बिना उदाहरण के कही गई बात कक्षा को समझ नहीं आएगी।