पहले याद रखिए कि कविता में मूल शब्द क्या थे — वर्षा, नभ, बादल, पानी। अब हर पंक्ति में दिए गए विकल्पों को रखकर देखिए कि कौन-सा शब्द मात्राओं की लय में भी बैठता है और अर्थ में भी।
| पंक्ति | मूल शब्द | जो शब्द जँचते हैं (घेरा बनाइए) | कारण |
|---|---|---|---|
| ________ बहार सब के, मन को लुभा रही है | वर्षा | बरखा, बरसात | ‘बरखा’ दो मात्राओं में ‘वर्षा’ जैसा ही चलता है और लोकगीतों का शब्द होने से ‘बहार’ के साथ सुंदर लगता है। ‘बरसात’ भी चल जाता है। ‘बारिश’ बोलचाल का शब्द है, कविता की लय में कुछ भारी पड़ता है; ‘वृष्टि’ बहुत शास्त्रीय है और ‘बहार’ के साथ मेल नहीं खाता। |
| ________ में छटा अनूठी, घनघोर छा रही है | नभ | गगन, अंबर | दोनों ‘नभ’ के पर्याय हैं और लय में बैठ जाते हैं। ‘आकाश’ में एक मात्रा अधिक होने से पंक्ति लंबी हो जाती है; ‘व्योम’ कठिन शब्द है, बच्चों की कविता में कम जँचता है। |
| बिजली चमक रही है, ________ गरज रहे हैं | बादल | मेघ, घन | ‘मेघ’ और ‘घन’ दोनों बादल के प्रसिद्ध पर्याय हैं और बहुवचन ‘गरज रहे हैं’ के साथ ठीक बैठते हैं। ‘जलधर’ और ‘जलद’ अर्थ में तो सही हैं (जल को धारण करने वाला), पर बोलने में भारी लगते हैं। |
| ________ बरस रहा है, झरने भी ये बहे हैं | पानी | नीर, जल | ‘नीर’ ‘पानी’ की तरह ही सहज और कोमल है। ‘जल’ भी चलेगा, पर एक मात्रा कम होने से लय थोड़ी ढीली पड़ती है। ‘सलिल’ और ‘तोय’ अर्थ तो पानी ही है, पर ये शब्द आज कम बोले जाते हैं। |