मल्हार अध्याय 7 झरोखे से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपने जो कविता इस पाठ में पढ़ी है, उसे लिखा है मुकुटधर पाण्डेय ने। आइए, अब पढ़ते हैं इन्हीं की लिखी एक अन्य कविता ‘ग्रीष्म’ का अंश— “बीते दिवस बसंत के, लगा ज्येष्ठ का मास / विश्व व्यथित करने लगा, रवि किरणों का त्रास / अवनी आतप से लगी, जलने सब ही हाल / जीव, जंतु चर-अचर सब, हुए अमिल बेहाल / रवि मयूख के ताप से, झुलस गए बन बाग / सूखे सरिता सर तथा नाले, कूप तड़ाग / लगी आग पुर ग्राम में, चिंता बढ़ी अपार / नर-नारी व्याकुल बसे, भय सदैव उर धार”
उत्तर

पहले कठिन शब्दों के अर्थ —

शब्दअर्थशब्दअर्थ
ज्येष्ठजेठ का महीना (मई–जून), सबसे गरम महीनाव्यथितदुखी, पीड़ित
रविसूर्यत्रासकष्ट, पीड़ा, डर
अवनीपृथ्वी, धरतीआतपधूप की तपन
चर-अचरचलने वाले (पशु-पक्षी) और न चलने वाले (पेड़-पौधे) — यानी सबअमिल / बेहालबेचैन, जिन्हें कहीं चैन न मिले / बुरी दशा में
मयूखकिरणबन बागवन और बाग़
सरितानदीसर / तड़ागसरोवर, तालाब
कूपकुआँपुर, ग्रामनगर और गाँव
उरहृदय, मनधारधारण किए हुए

भावार्थ — वसंत के दिन बीत गए और जेठ का महीना आ लगा। सूर्य की किरणों के कष्ट ने सारे संसार को दुखी कर दिया। धरती धूप की तपन से जलने लगी और चर-अचर — सभी जीव-जंतु बेहाल हो गए। सूर्य की किरणों के ताप से वन और बाग़ झुलस गए। नदियाँ, सरोवर, नाले, कुएँ और तालाब — सब सूख गए। नगरों और गाँवों में आग लग गई, चिंता बहुत बढ़ गई; स्त्री-पुरुष सब व्याकुल हो गए और हृदय में हर समय भय लिए जीने लगे।

‘वर्षा-बहार’ और ‘ग्रीष्म’ की तुलना —

आधारवर्षा-बहारग्रीष्म
मुख्य भावआनंद और उल्लासकष्ट और व्याकुलता
प्रकृति की दशाताल भरे, बाग़ हरे, फूल खिलेताल-कुएँ सूखे, वन-बाग़ झुलसे
जीव-जंतु“अति हैं प्रसन्न होते”, मोर नाचते हैं“चर-अचर सब, हुए बेहाल”
मनुष्यकिसान गीत गाता है, मालिन गाती है“नर-नारी व्याकुल बसे, भय सदैव उर धार”
भाषासरल, चित्रात्मक; तत्सम-तद्भव का मेलअधिक तत्सम और शास्त्रीय (अवनी, मयूख, तड़ाग)
दोनों को साथ पढ़ने का लाभ: ‘ग्रीष्म’ पढ़ने के बाद ही समझ आता है कि ‘वर्षा-बहार’ में इतनी खुशी क्यों है। जिस ताप को ग्रीष्म ने खींचा है, वर्षा उसी का उपचार है। इसीलिए कवि ने लिखा — “फिरते लखो पपीहे, हैं ग्रीष्म ताप खोते”। एक ही कवि की दो कविताएँ मिलकर पूरी कहानी कहती हैं।
ध्यान दीजिए: ‘ग्रीष्म’ दोहा छंद में लिखी गई है — दो-दो पंक्तियों में बात पूरी होती है और अंत में तुक मिलती है (मास–त्रास, हाल–बेहाल, बाग–तड़ाग, अपार–धार)। मूल कविता ‘वर्षा-बहार’ में भी यही दो-पंक्तियों वाला ढाँचा है।
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