प्र1.
(क) कविता में वर्षा के अनेक दृश्य दिए गए हैं। इन दृश्यों में कौन-कौन सी ध्वनियाँ सुनाई दे रही होंगी? अपनी कल्पना से उन ध्वनियों को कक्षा में सुनाइए।
उत्तर
कविता के हर दृश्य के साथ एक ध्वनि जुड़ी हुई है। सूची इस प्रकार बनेगी —
| कविता का दृश्य | कौन-सी ध्वनि | कैसे बोलेंगे |
|---|---|---|
| “बादल गरज रहे हैं” | गरज | गड़-गड़-गड़ड़… (गले से गहरी, लंबी आवाज़) |
| “बिजली चमक रही है” | कड़क | कड़ाSSक! (एक झटके में, तेज़) |
| “पानी बरस रहा है” | बूँदों की आवाज़ | रिमझिम-रिमझिम / टप-टप-टप / छत पर — छन्न-छन्न |
| “झरने भी ये बहे हैं” | झरने की धार | छल-छल, कल-कल, शाँय-शाँय |
| “चलती हवा है ठंडी, हिलती हैं डालियाँ सब” | हवा और पत्ते | सन्न-सन्न / सर-सर-सर |
| “गाती हैं मालिनें अब” | स्त्रियों का लोकगीत | सावन का कोई गीत — “बरसे बदरिया सावन की…” |
| “तालों में जीव जलचर” | पानी में हलचल | छपाक-छपाक, बुल-बुल (बुलबुले) |
| “फिरते लखो पपीहे” | पपीहे की पुकार | पिऊ-पिऊ / पी कहाँ-पी कहाँ |
| “करते हैं नृत्य वन में… मोर” | मोर की बोली | म्याऊँ-म्याऊँ जैसी लंबी पुकार; साथ में पंखों की फड़फड़ाहट |
| “मेंढक लुभा रहे हैं” | मेंढकों का समवेत गान | टर्र-टर्र-टर्र |
| “चलते हैं हंस कहीं पर” | पंखों की आवाज़ | फड़-फड़, और हंसों की ‘क्वाँक-क्वाँक’ |
| “गाते हैं गीत… किसान” | किसान का गीत और खेत की आवाज़ें | गीत के साथ — कीचड़ में पैर का ‘चप्-चप्’ |
कक्षा में करने का तरीका: कक्षा को चार समूहों में बाँटिए — बादल, पानी, पशु-पक्षी और मनुष्य। शिक्षक कविता की पंक्ति पढ़ें और जिस समूह की बारी हो, वह अपनी ध्वनि निकाले। अंत में सब मिलकर एक साथ ध्वनि करें — पूरी कक्षा एक ‘वर्षा-वन’ बन जाएगी।
Did you know? जिन शब्दों की ध्वनि ही उनका अर्थ बता देती है — टर्र-टर्र, रिमझिम, छल-छल, कड़क, सर-सर — उन्हें हिंदी में अनुकरणात्मक या ध्वन्यात्मक शब्द कहते हैं। कविता में ऐसे शब्द जोड़ने से चित्र के साथ आवाज़ भी बन जाती है।