मल्हार अध्याय 7 वर्षा में ध्वनियाँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) कविता में वर्षा के अनेक दृश्य दिए गए हैं। इन दृश्यों में कौन-कौन सी ध्वनियाँ सुनाई दे रही होंगी? अपनी कल्पना से उन ध्वनियों को कक्षा में सुनाइए।
उत्तर

कविता के हर दृश्य के साथ एक ध्वनि जुड़ी हुई है। सूची इस प्रकार बनेगी —

कविता का दृश्यकौन-सी ध्वनिकैसे बोलेंगे
“बादल गरज रहे हैं”गरजगड़-गड़-गड़ड़… (गले से गहरी, लंबी आवाज़)
“बिजली चमक रही है”कड़ककड़ाSSक! (एक झटके में, तेज़)
“पानी बरस रहा है”बूँदों की आवाज़रिमझिम-रिमझिम / टप-टप-टप / छत पर — छन्न-छन्न
“झरने भी ये बहे हैं”झरने की धारछल-छल, कल-कल, शाँय-शाँय
“चलती हवा है ठंडी, हिलती हैं डालियाँ सब”हवा और पत्तेसन्न-सन्न / सर-सर-सर
“गाती हैं मालिनें अब”स्त्रियों का लोकगीतसावन का कोई गीत — “बरसे बदरिया सावन की…”
“तालों में जीव जलचर”पानी में हलचलछपाक-छपाक, बुल-बुल (बुलबुले)
“फिरते लखो पपीहे”पपीहे की पुकारपिऊ-पिऊ / पी कहाँ-पी कहाँ
“करते हैं नृत्य वन में… मोर”मोर की बोलीम्याऊँ-म्याऊँ जैसी लंबी पुकार; साथ में पंखों की फड़फड़ाहट
“मेंढक लुभा रहे हैं”मेंढकों का समवेत गानटर्र-टर्र-टर्र
“चलते हैं हंस कहीं पर”पंखों की आवाज़फड़-फड़, और हंसों की ‘क्वाँक-क्वाँक’
“गाते हैं गीत… किसान”किसान का गीत और खेत की आवाज़ेंगीत के साथ — कीचड़ में पैर का ‘चप्-चप्’

कक्षा में करने का तरीका: कक्षा को चार समूहों में बाँटिए — बादल, पानी, पशु-पक्षी और मनुष्य। शिक्षक कविता की पंक्ति पढ़ें और जिस समूह की बारी हो, वह अपनी ध्वनि निकाले। अंत में सब मिलकर एक साथ ध्वनि करें — पूरी कक्षा एक ‘वर्षा-वन’ बन जाएगी।

Did you know? जिन शब्दों की ध्वनि ही उनका अर्थ बता देती है — टर्र-टर्र, रिमझिम, छल-छल, कड़क, सर-सर — उन्हें हिंदी में अनुकरणात्मक या ध्वन्यात्मक शब्द कहते हैं। कविता में ऐसे शब्द जोड़ने से चित्र के साथ आवाज़ भी बन जाती है।
प्र2.
(ख) “मेंढक लुभा रहे हैं, गाकर सुगीत प्यारे” — कविता में मेंढकों की टर्र-टर्र को भी प्यारा गीत कहा गया है। आपके विचार से बेसुरी ध्वनियाँ भी कब-कब अच्छी लगने लगती हैं?
उत्तर

बेसुरी ध्वनि तब अच्छी लगने लगती है जब वह किसी अच्छी खबर, अपनेपन या लंबी प्रतीक्षा के अंत से जुड़ जाती है। ध्वनि तब कानों से नहीं, मन से सुनी जाती है।

बेसुरी ध्वनिकब अच्छी लगती हैक्यों
मेंढकों की टर्र-टर्रसूखे के बाद पहली बारिश की रातयह आवाज़ बताती है कि तालाब भर गया — यानी पानी आ गया।
कौए की काँव-काँवजब घर में किसी मेहमान के आने की आस होलोक-विश्वास में कौए का बोलना अतिथि के आने का संकेत माना जाता है।
छोटे बच्चे का रोनाजन्म के तुरंत बादयही आवाज़ बताती है कि बच्चा स्वस्थ है — पूरा परिवार खुश हो जाता है।
छुट्टी की घंटी की खनखनाहटस्कूल के अंतिम पीरियड मेंबजना तो बेसुरा है, पर वह आज़ादी की सूचना देती है।
पुराने पंखे या मोटर की खटपटबिजली लौट आने परअँधेरे और उमस के बाद वही आवाज़ राहत की आवाज़ बन जाती है।
बच्चे की टूटी-फूटी बाँसुरी या बेसुरा गानाजब वह पहली बार कुछ बजाना-गाना सीख रहा होउसमें सुर नहीं, पर उसकी कोशिश और खुशी सुनाई देती है।
दादी की खाँसती-सी आवाज़ में गाया लोकगीतत्योहार या विवाह के अवसर परवहाँ सुर नहीं, अपनापन और परंपरा सुनी जाती है।
निष्कर्ष: कोई ध्वनि अपने आप में सुरीली या बेसुरी नहीं होती। जिस भाव के साथ हम उसे सुनते हैं, वही उसे मीठा या कर्कश बना देता है। कवि को मेंढकों की टर्र-टर्र इसलिए ‘सुगीत’ लगी, क्योंकि उसके भीतर वर्षा के आने का आनंद भरा हुआ था।
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