मल्हार अध्याय 9 साथ-साथ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“वन में जितने पंछी हैं, खंजन, कपोत, चातक, कोकिल; काक, हंस, शुक आदि वास करते सब आपस में हिलमिल!” 1. वन में सारे पक्षी एक साथ रह रहे हैं, हमारे परिवेश में भी पशु-पक्षी साथ रहते हैं। आप विचार कीजिए कि हमारे परिवेश में उनका रहना क्यों आवश्यक है?
उत्तर

पशु-पक्षी हमारे परिवेश की शोभा भर नहीं, उसकी ज़रूरत हैं। वे कई ऐसे काम करते हैं जो कोई मशीन नहीं कर सकती।

वे क्या करते हैंहमें क्या लाभ होता है
फूलों का परागण (मधुमक्खी, तितली, सूर्यपक्षी)फल और बीज बनते हैं; परागण न हो तो आम, अमरूद, सरसों — कुछ भी न मिले।
बीजों का बिखराव (तोता, कोयल, बुलबुल)पक्षी बीट के साथ बीज दूर-दूर गिराते हैं और अपने आप नए पेड़ उग आते हैं।
कीड़ों को खाना (गौरैया, कठफोड़वा, बगुला)फ़सल को नुक़सान पहुँचाने वाले कीड़े क़ाबू में रहते हैं; कीटनाशक कम लगाना पड़ता है।
सफ़ाई करना (कौआ, चील, गिद्ध)मरे हुए जीव और जूठन साफ़ हो जाती है, जिससे बीमारियाँ नहीं फैलतीं।
मिट्टी उपजाऊ बनाना (केंचुआ, चींटी, गोबर)ज़मीन भुरभुरी और उपजाऊ बनी रहती है।
दूध, ऊन, खाद और खेती में सहायता (गाय, भैंस, भेड़, बैल)भोजन, वस्त्र और खेती — तीनों में सीधा योगदान।
प्रकृति का संकेत देनापपीहा-मोर वर्षा की सूचना देते हैं; पक्षियों का अचानक चुप हो जाना ख़तरे का संकेत होता है।
मन को सुख देनासुबह की चहचहाहट, तितली का रंग, गाय का बछड़े को चाटना — ये दृश्य मन को शांत करते हैं।
सबसे बड़ा कारण — खाद्य शृंखला: प्रकृति एक जाल की तरह है। एक धागा टूटे तो पूरा जाल ढीला पड़ जाता है। यदि पक्षी घट जाएँ तो कीड़े बढ़ेंगे, फ़सल घटेगी और अंत में भूखे हम ही रहेंगे। इसीलिए उनका रहना हमारे अपने ही हित में है।
याद कीजिए: हमारे देश में गिद्धों की संख्या घटने से मरे हुए पशुओं का ढेर बढ़ गया और उससे बीमारियाँ फैलने लगीं — यह इस बात का सबसे स्पष्ट उदाहरण है कि एक पक्षी के जाने से पूरा परिवेश हिल जाता है।
प्र2.
2. हम अपने आस-पास रहने वाले पशु-पक्षियों की सहायता कैसे कर सकते हैं?
उत्तर

सहायता के लिए बड़े काम की ज़रूरत नहीं; छोटे-छोटे नियमित काम ही सबसे अधिक काम आते हैं।

  • पानी रखिए — छत, बालकनी या आँगन में मिट्टी का एक सकोरा रोज़ भरकर रखिए। गरमी में पक्षी भूख से नहीं, प्यास से मरते हैं। पानी रोज़ बदलिए ताकि मच्छर न पनपें।
  • दाना डालिए — बाजरा, चावल के दाने या बचा हुआ अनाज एक चौड़े बर्तन में रखिए। तला-मसालेदार भोजन कभी मत दीजिए।
  • घोंसला बनाने दीजिए — रोशनदान, छज्जे या पुराने डिब्बे में यदि गौरैया घोंसला बना ले तो उसे उजाड़िए मत। लकड़ी या मिट्टी का घोंसला-घर भी टाँगा जा सकता है।
  • पेड़ लगाइए और बचाइए — पीपल, बरगद, नीम, जामुन और सहजन पक्षियों को भोजन भी देते हैं और घर भी। कविता की चिड़िया भी पीपल की डाली पर ही बैठी है।
  • पिंजरे में मत रखिए — पक्षी न ख़रीदिए, न किसी को ख़रीदने दीजिए। तोता या मैना पालना क़ानूनन अपराध भी है।
  • पतंग की माँझा और प्लास्टिक — काँच वाली माँझा से हज़ारों पक्षी घायल होते हैं। सादी डोर का प्रयोग कीजिए और प्लास्टिक खुले में मत फेंकिए, क्योंकि गाय और पक्षी उसे निगल लेते हैं।
  • घायल पशु-पक्षी की सहायता — घायल पक्षी को डिब्बे में सावधानी से रखकर पशु-चिकित्सालय या किसी संस्था तक पहुँचाइए।
  • तेज़ आवाज़ और पटाख़े कम कीजिए — तेज़ धमाकों से पक्षी घबराकर घोंसले छोड़ देते हैं।
  • कुत्ते-बिल्ली के लिए भी — सर्दी में पुरानी बोरी या कपड़ा बिछा दीजिए और खाने का थोड़ा हिस्सा रख दीजिए।
कक्षा में कीजिए: ‘सकोरा अभियान’ चलाइए — हर विद्यार्थी अपने घर की छत पर एक सकोरा रखे और सप्ताह भर की तस्वीरें या रिपोर्ट कक्षा में साझा करे। यह सबसे सस्ता और सबसे असरदार काम है।
क्यों: कविता कहती है — “बच जाता जो, औरों के हित, उसे छोड़ वे देते हैं!” पक्षी हमारे लिए बचाकर छोड़ते हैं; थोड़ा-सा पानी और दाना उनके लिए छोड़ देना हमारी ओर से केवल शिष्टाचार है।
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