प्र1.
“सीमा-हीन गगन में उड़ते, निर्भय विचरण करते हैं” — कविता की इन पंक्तियों को पढ़िए और इन चित्रों को देखिए। इन चित्रों को देखकर आपके मन में क्या विचार आ रहे हैं? (संकेत— जैसे इन चित्रों में कौन निर्भय विचरण कर रहा है?)
उत्तर
पुस्तक में दो चित्र दिए गए हैं और दोनों मिलकर एक ही बात कहते हैं — जो जहाँ बंद है, वहीं डर है; जो खुला है, वही निर्भय है।
| चित्र | उसमें क्या दिख रहा है | निर्भय विचरण कौन कर रहा है |
|---|---|---|
| पहला (सफ़ारी) | जंगल के बीच से एक जालीदार बस जा रही है, जिसमें लोग बंद बैठे हैं। बाहर शेर और जंगली भैंसा खुले घूम रहे हैं। | पशु — शेर और भैंसा। यहाँ पिंजरे में मनुष्य है! |
| दूसरा (चिड़ियाघर) | पिंजरों में बंद बंदर और शेर; बाहर लोग खुले घूमते, देखते और बातें करते हुए। | मनुष्य। यहाँ पशु बंदी हैं। |
चित्र देखकर मन में आने वाले विचार:
- पहला चित्र देखकर लगता है कि पशु अपने घर में हैं और मनुष्य मेहमान — इसलिए मनुष्य को सुरक्षा के लिए जाली के पीछे रहना पड़ रहा है। यह ठीक भी है, क्योंकि जंगल पशुओं का है।
- दूसरे चित्र में शेर वही है, पर पिंजरे में उसकी गरज कहीं खो गई है। जिस शेर को ‘वन-राज’ कहते हैं, वह पत्थर के फ़र्श पर बैठा है — यह देखकर मन दुखी हो जाता है।
- दोनों चित्रों को साथ रखिए तो एक सवाल उठता है — बंदी कोई भी हो, बंधन तो बंधन ही है। कविता की चिड़िया यही तो कह रही है — “हम स्वच्छंद और क्यों तुमने, डाली है बेड़ी पग में?”
- सफ़ारी का तरीक़ा चिड़ियाघर से बेहतर लगता है, क्योंकि उसमें पशु अपने प्राकृतिक परिवेश में रहते हैं और मनुष्य केवल देखने आता है — छीनने नहीं।
गहरी बात: ‘निर्भय विचरण’ का अर्थ केवल घूमना नहीं, बिना डर के घूमना है। पिंजरे में बंद पशु घूम तो सकता है, पर उसके पास जाने के लिए कोई दिशा ही नहीं बची। इसीलिए कवि ने ‘सीमा-हीन’ शब्द जोड़ा है — स्वतंत्रता का असली अर्थ यही है कि आगे कोई दीवार न हो।
सोचिए और चर्चा कीजिए: क्या पशुओं को देखने के लिए उन्हें पकड़ना ज़रूरी है? आज कैमरा, वृत्तचित्र और अभयारण्य के ज़रिए हम उन्हें बिना बंदी बनाए भी देख सकते हैं।