प्र1.
इन तीनों चित्रों को ध्यान से देखिए और बताइए— आप पक्षियों को इनमें से कहाँ देखना पसंद करेंगे और क्यों?
उत्तर
पुस्तक में तीन चित्र दिए गए हैं —
| चित्र | उसमें क्या है | पक्षी की दशा |
|---|---|---|
| पहला | ऊँची-ऊँची इमारतों से भरा शहर, जिनके बीच कुछ पक्षी उड़ रहे हैं | उड़ तो रहे हैं, पर न पेड़ है, न घोंसला — केवल कंक्रीट और शोर |
| दूसरा | सोने के रंग का सुंदर पिंजरा, जिसके भीतर एक चिड़िया झूले पर बैठी है | पूरी तरह बंदी — दाना-पानी तो है, पर आकाश नहीं |
| तीसरा | घने हरे पेड़ों का जंगल, जिसमें एक पेड़ के कोटर में चिड़िया बैठी है | पूरी तरह स्वतंत्र — अपना घर, अपना भोजन, अपना आकाश |
उत्तर: मैं पक्षियों को तीसरे चित्र में — हरे-भरे पेड़ों और जंगल में देखना पसंद करूँगा।
क्योंकि —
- वही उनका असली घर है। पेड़ पर वे घोंसला बना सकते हैं, बच्चे पाल सकते हैं और डाल-डाल फुदक सकते हैं।
- जंगल में उन्हें अपना भोजन — फल, बीज, कीड़े — स्वयं अपने श्रम से मिलता है, ठीक वैसे ही जैसे कविता कहती है: “जो मिलता है अपने श्रम से, उतना भर ले लेते हैं।”
- वहाँ वे “सीमा-हीन गगन में उड़ते, निर्भय विचरण” कर सकते हैं। पिंजरे में यह संभव ही नहीं।
- पेड़ों पर बैठकर वे स्वतंत्र होकर गाते हैं — और कविता की चिड़िया का संदेश भी तभी सच होता है जब वह स्वयं स्वतंत्र हो।
पिंजरा क्यों नहीं: दूसरे चित्र का पिंजरा सोने-जैसा चमकीला है — ठीक वैसा ही जैसा कविता का ‘सोने की कड़ियाँ’ वाला बंधन। सुंदर होने से बंधन बंधन नहीं रह जाता। जो पक्षी उड़ने के लिए बना है, उसे दाना देकर बंद कर देना उसके साथ अन्याय है।
पहले चित्र पर भी सोचिए: शहर में पक्षी दिखते तो हैं, पर उनके लिए न पेड़ बचे हैं, न पानी। इसीलिए गौरैया जैसे पक्षी शहरों से घटते जा रहे हैं। यदि हम छत पर दाना-पानी रखें और घर के पास पेड़ लगाएँ, तो पहला चित्र भी पक्षियों के लायक़ बन सकता है।