प्र1.
कविता में आपने कई पक्षियों के नाम पढ़े। अब आपके सामने पक्षियों से जुड़ी कुछ पहेलियाँ दी गई हैं। पक्षियों को पहचानकर सही चित्रों के साथ रेखा खींचकर जोड़िए— (1) दिखने में हूँ हरा-हरा / कहता हूँ सब खरा-खरा / खाता हूँ मैं मिर्ची लाल / कहते सब मुझे मिट्ठूलाल (2) सुंदर काले मेरे नैन / श्वेत श्याम है मेरे डैन / उड़ता रहता हूँ दिन-रैन / खेलूँ पानी में तो आए चैन (3) संदेश पहुँचाना मेरा काम / देता हूँ शांति का पैगाम / करता हूँ मैं गूटर-गूँ / आओगे पास तो हो जाऊँगा छू (4) पीता हूँ बारिश की बूँदें / रखता हूँ फिर आँखें मूँदे / देखो चकोर है मेरी साथी / बिन उसके घूमूँ ऊँघें ऊँघें (5) रहता है घर के आस-पास / रंग है उसका काला खास / जो भी दोगे खाता है वो / झुंड में आ जाता है वो (6) कूहू कूहू मधुर आवाज सुनाती / घर अपना मैं कहाँ बनाती / काली हूँ पर काक नहीं / बतलाओ मैं क्या कहलाती (7) तन मेरा सफेद / गर्दन मेरी लंबी / नाम बताओ सच्ची-सच्ची / कहलाता हूँ मैं जलपक्षी
उत्तर
पुस्तक के पृष्ठ पर बीच में सात पक्षियों के चित्र ऊपर से नीचे इस क्रम में छपे हैं — कबूतर, खंजन, चातक, कौआ, कोयल, हंस और तोता। हर पहेली को उसके चित्र से इस प्रकार जोड़िए —
| पहेली | उत्तर (चित्र) | पहचान का सूत्र |
|---|---|---|
| 1. “दिखने में हूँ हरा-हरा… कहते सब मुझे मिट्ठूलाल” | तोता (शुक) | हरा रंग, लाल चोंच, लाल मिर्च खाना और ‘मिट्ठू’ नाम — सब तोते की पहचान हैं। कविता में इसे ‘शुक’ कहा गया है। |
| 2. “सुंदर काले मेरे नैन… खेलूँ पानी में तो आए चैन” | खंजन | काले-सफ़ेद (श्वेत-श्याम) पंख और पानी के किनारे रहना — खंजन (wagtail) की पहचान। कविता की पंक्ति है — “वन में जितने पंछी हैं, खंजन”। |
| 3. “संदेश पहुँचाना मेरा काम… करता हूँ मैं गूटर-गूँ” | कबूतर (कपोत) | पुराने समय में संदेश ले जाना, ‘गुटरगूँ’ बोली और शांति का प्रतीक होना — तीनों कबूतर के लक्षण हैं। |
| 4. “पीता हूँ बारिश की बूँदें… देखो चकोर है मेरी साथी” | चातक (पपीहा) | लोक-मान्यता है कि चातक केवल वर्षा की बूँद पीता है; चकोर के साथ इसका नाम अकसर जोड़ा जाता है। |
| 5. “रहता है घर के आस-पास… झुंड में आ जाता है वो” | कौआ (काक) | घरों के पास रहना, काला रंग, सब कुछ खा लेना और झुंड में उतर आना — कौए की पक्की पहचान। |
| 6. “कूहू कूहू मधुर आवाज सुनाती… काली हूँ पर काक नहीं” | कोयल (कोकिल) | ‘कूहू’ बोली, काला रंग, और यह कि वह अपना घोंसला नहीं बनाती — इसीलिए पूछा गया “घर अपना मैं कहाँ बनाती”। |
| 7. “तन मेरा सफेद… कहलाता हूँ मैं जलपक्षी” | हंस | सफ़ेद शरीर, लंबी गर्दन और जल में तैरना — हंस के अलावा कोई और नहीं। |
पहेली 6 का सबसे बड़ा सुराग: “घर अपना मैं कहाँ बनाती” — कोयल अपने अंडे कौए के घोंसले में रख देती है, अपना घोंसला बनाती ही नहीं। और “काली हूँ पर काक नहीं” यह भी बता देता है कि उत्तर कौआ नहीं है।
जोड़ने का तरीक़ा: पहले चित्र में रंग देखिए (हरा → तोता, सफ़ेद → हंस), फिर आकार-गर्दन देखिए, और अंत में पहेली की बोली (‘गूटर-गूँ’, ‘कूहू’) से मिलाइए। सातों जोड़े आसानी से बन जाएँगे।
रोचक बात: इन सातों पक्षियों के नाम — खंजन, कपोत, चातक, कोकिल, काक, हंस और शुक — कविता के तीसरे पद में एक साथ आए हैं: “वन में जितने पंछी हैं, खंजन, कपोत, चातक, कोकिल; काक, हंस, शुक आदि वास करते सब आपस में हिलमिल!”