अन्वेषण अध्याय 1 प्रश्न और क्रियाकलाप

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपकी राय में भारत की दो महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताएँ क्या हैं? आपके विचार में वे क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर

कोई भी दो चुनी जा सकती हैं, बशर्ते कारण स्पष्ट हो। सबसे सशक्त दो विकल्प हैं — हिमालय और नदियों सहित उत्तरी मैदान

1. हिमालय — क्यों महत्वपूर्ण:

  • यह उत्तर में प्राकृतिक प्राचीर है, जो मध्य एशिया की बर्फीली पवनों को रोकता है और उत्तर भारत को इसी अक्षांश के अन्य क्षेत्रों की तुलना में बहुत कम ठंडी सर्दी देता है।
  • यह मानसूनी पवनों को रोककर उन्हें भारत पर ही वर्षा करने को विवश करता है।
  • इसकी बर्फ और हिमनद सिंधु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र को वर्ष भर जल देते हैं — इसीलिए इसे ‘एशिया का जल शिखर’ कहा जाता है।
  • यह जैव विविधता का घर है और साधना, अर्चना तथा तीर्थाटन का केंद्र भी।

2. उत्तरी (गंगा के) मैदान — क्यों महत्वपूर्ण:

  • यहाँ की नदियाँ खनिज लाकर मिट्टी को अत्यंत उपजाऊ बनाती हैं, जिससे देश के बड़े भाग का पेट भरता है।
  • समतल भूमि के कारण यहाँ सघन सड़क और रेल तंत्र बना, और नदियाँ स्वयं सहस्राब्दियों से यात्रा तथा व्यापार का मार्ग रही हैं।
  • भारत की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग यहीं रहता है और भारत का बहुत-सा इतिहास यहीं रचा गया।
नमूना उत्तर: “मेरी राय में भारत की दो सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताएँ हिमालय और गंगा के मैदान हैं। हिमालय हमें मध्य एशिया की बर्फीली पवनों से बचाता है और जल को बर्फ के रूप में संचित रखता है, जिससे हमारी बड़ी नदियाँ वर्ष भर बहती रहती हैं। वही नदियाँ गंगा के मैदानों का निर्माण करती हैं, जिनकी उपजाऊ मिट्टी अधिकांश भारत का पेट भरती है और जहाँ हमारे अधिकांश लोग रहते हैं। एक हमें जल देता है, दूसरा उसी जल को अन्न में बदल देता है।”
प्र2.
आपके विचार में यदि हिमालय नहीं होता तो भारत का स्वरूप कैसा होता? अपनी कल्पना को व्यक्त करने के लिए एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए अथवा चित्र द्वारा अभिव्यक्त कीजिए।।
उत्तर

हिमालय के बिना भारत कहीं अधिक शुष्क, कहीं अधिक ठंडा और कहीं कम हरा-भरा देश होता। क्या-क्या बदल जाता, और क्यों —

क्या बदलताक्यों
कड़ाके की सर्दीमध्य एशिया से आती बर्फीली पवनों को रोकने वाला कुछ न होता। उत्तर भारत में मृदु शीत के स्थान पर अत्यंत कड़ी सर्दी पड़ती।
बहुत कम वर्षामानसूनी पवनें रुककर ऊपर उठने को विवश न होतीं, इसलिए वे अपनी नमी लेकर एशिया के भीतर निकल जातीं।
सदावाहिनी नदियाँ नहींगर्मियों में पिघलने के लिए न हिमक्षेत्र होते, न हिमनद। गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र आज जैसे हैं, वैसे न होते।
उत्तरी मैदान नहींये मैदान उन्हीं नदियों की लाई गाद से बने हैं। पर्वत न होते तो गाद न होती और मैदान भी न होते — उसके स्थान पर उथला सागर या पथरीली शुष्क भूमि होती।
भिन्न जीवनकृषि बहुत कम, जनसंख्या बहुत कम, उत्तर में सघन नगर नहीं — और देश का बड़ा भाग थार मरुस्थल जैसा दिखता।
भिन्न इतिहासपर्वतों की दीवार न होने से उपमहाद्वीप में आना-जाना बहुत सरल होता और भारत की संस्कृति तथा इतिहास का स्वरूप बिलकुल भिन्न होता।
नमूना उत्तर: “यदि हिमालय कभी उठा ही न होता, तो भारत एक कठोर और शुष्क भूमि होता। हर सर्दी में उत्तर से बर्फीली पवनें सीधे मैदानों को पार करतीं और मानसून के बादल बिना बरसे हमारे ऊपर से निकल जाते। पिघलती बर्फ से पोषित गंगा न होती और न वह मुलायम उपजाऊ मिट्टी होती जो बहकर आती और मैदान बनाती। उत्तर भारत का बड़ा भाग आज के राजस्थान जैसा दिखता — खुला, रेतीला और विरल आबादी वाला। मैदानों से जो पर्वत मुश्किल से दिखाई देते हैं, वही मैदानों के हरे होने का कारण हैं।”
यदि चित्र बनाना हो: पृष्ठ के एक भाग में आज का भारत (सफ़ेद चोटियाँ, नीली नदियाँ, हरे मैदान) और दूसरे भाग में हिमालय रहित भारत (खुला क्षितिज, पतली सूखी नदियाँ, पीली झाड़ीदार भूमि) बनाइए और अंतर पर नाम लिखिए।
प्र3.
अध्याय में दी गई जानकारी के आधार पर बताइए कि भारत को ‘लघु महाद्वीप’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर

क्योंकि एक ही देश में भारत के भीतर लगभग वे सभी भू-आकृतियाँ और जलवायुएँ मिल जाती हैं जो सामान्यत: पूरे महाद्वीप में होती हैं

महाद्वीप में सामान्यत: जो होता हैभारत का अपना रूप
ऊँची पर्वत श्रृंखलाएँहिमालय, 8000 मीटर से ऊँची चोटियों सहित
विशाल नदी-मैदानसिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदान
उष्ण मरुस्थलथार
शीत मरुस्थललद्दाख, सर्दियों में –30°C से नीचे
प्राचीन पठारप्रायद्वीपीय और दक्कन का पठार; 2.5 अरब वर्ष पुरानी अरावली
लंबी तटरेखाएँ7500 कि.मी. से भी अधिक, डेल्टा, मुहानों और लैगून सहित
वर्षा वन और विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाले स्थानपश्चिमी घाट; मेघालय की खासी पहाड़ियाँ
द्वीप, प्रवाल भित्तियाँ और ज्वालामुखीलक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, बैरन द्वीप

इसमें उतनी ही विविध मानवीय दुनिया जोड़ लीजिए — सैकड़ों भाषाएँ, दर्जनों गृह-शैलियाँ और हर क्षेत्र का अपना त्योहार-कैलेंडर — तथा इन सबको समेटने वाला विस्तार : भारत विश्व का सातवाँ बड़ा देश है।

ऐसा क्यों: भारत लगभग 8°उ. से 37°उ. तक, अर्थात लगभग 30 अंश अक्षांश में फैला है, और इसमें विश्व के सर्वोच्च पर्वत भी हैं तथा उष्ण सागर भी। एक ही देश में अक्षांश और ऊँचाई का इतना विस्तार हो, तो वहाँ महाद्वीप जितनी जलवायुएँ मिलना स्वाभाविक है।
प्र4.
भारत की किसी प्रमुख नदी को मानचित्र में देखिए। इसका उद्गम कहाँ है और यह समुद्र में कहाँ मिलती है? इसकी यात्रा के दौरान लोग इस नदी का विभिन्न प्रकार से कैसे उपयोग करते हैं? अपनी कक्षा में इस पर चर्चा कीजिए।
उत्तर

समूह के लिए विधि: एक नदी चुनिए, भौतिक मानचित्र पर उसे उद्गम से मुहाने तक देखिए, उसे तीन-चार खंडों में बाँटिए और प्रत्येक खंड के लिए पूछिए — यहाँ नदी लोगों को क्या देती है और लोग उसे क्या लौटाते हैं? अच्छे उत्तर में खंड, स्थान और उपयोग — तीनों का नाम आता है।

नमूना उत्तर — गंगा, गोमुख से बंगाल की खाड़ी तक:

खंडस्थानलोग नदी का उपयोग कैसे करते हैं
उद्गमगोमुख, गंगोत्री हिमनद का मुहाना, उत्तराखंडपावन तीर्थ स्थल तथा प्रसिद्ध पहाड़ी यात्रा-पथ (ट्रेकिंग)
पर्वतीय मार्गदेवप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वारतीव्र प्रवाह से जलविद्युत; राफ्टिंग और पर्यटन; घाट, स्नान और मंदिर
ऊपरी मैदानकानपुर, प्रयागराज, वाराणसीगेहूँ, धान और गन्ने के लिए नहर सिंचाई; पेयजल; उद्योग; मत्स्यन; घाटों पर मेले और अनुष्ठान
निचला मैदानपटना, फरक्का, कोलकाताअंतर्देशीय जलमार्ग से माल ढुलाई; कोलकाता पत्तन; नदी की चिकनी मिट्टी से ईंट-निर्माण; समृद्ध जलोढ़ कृषि
मुहानासुंदरवन डेल्टा, पश्चिम बंगालमत्स्यन और झींगा पालन; मैंग्रोव से शहद और ईंधन; पर्यटन; मैंग्रोव तट को चक्रवातों से बचाते हैं
यह पैटर्न क्या बताता है: पर्वतों में नदी की गति उपयोगी है — वह टरबाइन घुमाती है। मैदानों में उसका जल और गाद उपयोगी है — वे सींचते और उपजाऊ बनाते हैं। मुहाने पर उसका अवसाद और आश्रय उपयोगी है — वे भूमि और वन बनाते हैं। एक ही नदी, तीन अलग-अलग वरदान।
इस पर भी चर्चा कीजिए: प्रत्येक उपयोग की कीमत नदी क्या चुकाती है — नगरों का मल-जल, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक, अत्यधिक मत्स्यन और प्रवाह रोकने वाले बाँध। जो समूह अंत में यह बताए कि “हम इसका बेहतर उपयोग कैसे कर सकते हैं”, उसका उत्तर सबसे अच्छा है।
प्र5.
भारत के दक्षिणी भाग को प्रायद्वीपीय पठार क्यों कहा जाता है?
उत्तर

क्योंकि वह एक साथ प्रायद्वीप भी है और पठार भी। यह नाम इन्हीं दो तथ्यों को जोड़ देता है।

प्रायद्वीप = तीन ओर से जल से घिरा भूभाग
पठार = आस-पास की भूमि से ऊँचा, प्राय: समतल शीर्ष और प्राय: खड़ी ढाल वाला स्थल रूप
दक्षिण भारत = दोनों  →  प्रायद्वीपीय पठार

यह प्रायद्वीप क्यों है: भारत का दक्षिणी भाग कन्याकुमारी पर आकर सँकरा हो जाता है और तीन ओर से जल से घिरा है —

  • पश्चिम में अरब सागर,
  • पूर्व में बंगाल की खाड़ी,
  • दक्षिण में हिंद महासागर

यह पठार क्यों है: यह बहुत पुरानी चट्टानों का त्रिकोणीय भूभाग है, जो तटीय मैदानों से काफ़ी ऊँचा उठा है, जिसका शीर्ष मोटे तौर पर समतल है (दक्कन का पठार) और जिसके किनारे खड़ी ढाल वाले हैं — पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट। इसका हल्का ढाल पूर्व की ओर है, इसीलिए गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और महानदी पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं।

संकेत: पृष्ठ 20 का चित्र 1.34 यह बात एक ही छायाचित्र में दिखा देता है — पश्चिमी घाट की ऊँची पहाड़ियाँ और उनका लगभग सीधे अरब सागर में उतर जाना।
प्र6.
इस अध्याय में वर्णित यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त कौन-से धरोहर स्थल आपको अधिक रूचिकर लगे? इसके रोचक तथ्यों का संक्षिप्त में वर्णन कीजिए।
उत्तर

पहले सूची देखिए। अध्याय में चार यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बताए गए हैं —

स्थलकहाँक्यों उल्लेखनीय
ग्रेट हिमालयन राष्ट्रीय उद्यानहिमाचल प्रदेशवनस्पतियों और जीवों की अत्यधिक विविधता; इसकी जैव विविधता सरकार के साथ-साथ उद्यान में रहने वाले ग्रामीण समुदायों द्वारा भी संरक्षित की जा रही है
जैसलमेर किलाराजस्थान, थार मरुस्थल के मध्य‘स्वर्ण नगरी’ में पीले बलुआ पत्थर से बना जीवंत किला
पश्चिमी घाटपश्चिमी तट के साथअनेक नदियों का उद्गम तथा असाधारण जैव विविधता — सिंह-पूँछ वाला वानर, किंग कोबरा, कीटभक्षी पौधे
सुंदरवनपश्चिम बंगाल, गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा मेंविश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन; रॉयल बंगाल टाइगर का घर
नमूना उत्तर (सुंदरवन): “मुझे सबसे रोचक धरोहर स्थल सुंदरवन लगा। यह मनुष्य का बनाया कोई भवन नहीं, बल्कि नदी का बनाया वन है। जहाँ गंगा और ब्रह्मपुत्र सागर से मिलती हैं, वहाँ वे इतनी गाद जमा करती हैं कि भूमि आज भी बन रही है। हर ज्वार के साथ खारा और मीठा जल मिलते हैं और मैंग्रोव वृक्ष उसी खारी कीचड़ में जड़ें जमाकर उगते हैं। यह वन रॉयल बंगाल टाइगर को आश्रय देता है — विश्व के वे एकमात्र बाघ जो नियमित रूप से तैरते हैं — और मनुष्यों को भी बचाता है, क्योंकि घने मैंग्रोव बंगाल की खाड़ी से आने वाले चक्रवातों का वेग तोड़ देते हैं। मुझे यह बात रोचक लगती है कि एक ही स्थान एक साथ बाघ की भी रक्षा करता है और गाँव की भी।”
अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए: स्थल का नाम, उसकी स्थिति, अध्याय से दो-तीन विशिष्ट तथ्य, और अंत में उसे चुनने का आपका अपना कारण।
प्र7.
इस पुस्तक के अंत में दिए गए भारत के भौतिक और राजनीतिक मानचित्रों को देखिए। आप अभी जिस क्षेत्र में हैं, उसकी पहचान कीजिए। आप भारत की किस भौतिक विशेषता का उपयोग इस स्थान का वर्णन करने के लिए करेंगे?
उत्तर

विधि: पहले अपने नगर या ज़िले को राजनीतिक मानचित्र पर खोजिए, क्योंकि उसमें राज्यों की सीमाएँ और नगरों के नाम होते हैं। फिर भौतिक मानचित्र पर ठीक उसी स्थान को देखिए और वहाँ का रंग तथा निकटतम अंकित विशेषता नोट कीजिए — कोई पर्वत श्रृंखला, नदी, पठार, तट या मरुस्थल। उसी के आधार पर अपने स्थान का वर्णन कीजिए।

यदि आप यहाँ रहते हैं…कौन-सी भौतिक विशेषता बताइएकैसे कहिए
दिल्ली, लखनऊ, पटनाउत्तरी (गंगा के) मैदान“गंगा के समतल, उपजाऊ मैदानों में, यमुना/गंगा के निकट।”
जोधपुर, बीकानेरथार मरुस्थल“थार मरुस्थल में, अरावली पहाड़ियों के पश्चिम में।”
शिमला, देहरादून, गंगटोकहिमालय“लघु हिमालय अर्थात हिमाचल श्रेणी में।”
हैदराबाद, नागपुर, बेंगलुरुदक्कन का पठार“दक्कन के पठार पर, पश्चिमी और पूर्वी घाट के बीच।”
कोच्चि, मुंबई, पणजीपश्चिमी तटीय मैदान“सँकरे पश्चिमी तट पर, पश्चिमी घाट और अरब सागर के बीच।”
चेन्नई, विशाखापत्तनम, पुरीपूर्वी तटीय मैदान“चौड़े पूर्वी तट पर, बंगाल की खाड़ी के किनारे।”
शिलांग, कोहिमा, ईटानगरपूर्वोत्तर की पहाड़ियाँ“पूर्वोत्तर की पहाड़ियों में, मेघालय पठार पर।”
नमूना उत्तर: “मैं भोपाल में रहता हूँ। राजनीतिक मानचित्र पर यह मध्य प्रदेश में, भारत के मध्य में है। भौतिक मानचित्र पर वही स्थान हल्का भूरा है, जिसे संकेत-सूची ऊँची भूमि बताती है, और उसके ठीक दक्षिण में विंध्य तथा सतपुड़ा पहाड़ियाँ अंकित हैं। इसलिए मैं अपने स्थान का वर्णन इस प्रकार करूँगा — प्रायद्वीपीय पठार के उत्तरी किनारे पर, नर्मदा घाटी के ऊपर; ऊँची भूमि, किसी भी तट से बहुत दूर।”
प्र8.
भारत में खाद्य संरक्षण के उपाय जगह-जगह पर भिन्न हैं, जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप होते हैं। ‘कक्षा परियोजना’ के अंतर्गत खाद्य संरक्षण के विभिन्न उपायों के बारे में जानकारी एकत्रित कीजिए। (संकेत – मौसमी (ऋतु विशेष में उपलब्ध) सब्जियों को सुखाकर उन्हें अन्य ऋतुओं में उपयोग हेतु सुरक्षित रखना।)
उत्तर

परियोजना कैसे कीजिए:

  1. कक्षा को अध्याय के क्षेत्रों के अनुसार समूहों में बाँटिए — हिमालय, मैदान, मरुस्थल, पठार, तट, पूर्वोत्तर।
  2. प्रत्येक विद्यार्थी घर पर किसी से — विशेषकर दादा-दादी या नाना-नानी से — साक्षात्कार लेकर पूछे कि रेफ्रिजरेटर से पहले भोजन कैसे सुरक्षित रखा जाता था।
  3. प्रत्येक विधि के लिए यह लिखिए : कौन-सा खाद्य, कौन-सी विधि, वह क्यों काम करती है, और वहाँ की कौन-सी जलवायु उसे संभव बनाती है
  4. सभी समूहों की जानकारी को क्षेत्रवार एक कक्षा-चार्ट में जोड़िए। छायाचित्र या छोटे नमूने इसे और अच्छा बना देंगे।

नमूना उत्तर — भरा हुआ चार्ट:

क्षेत्रविधिउदाहरणवहाँ क्यों संभव है
थार / राजस्थानधूप में सुखानाकेर-सांगरी, सूखी ककड़ी (काचरी), पापड़, बड़ीतेज़ शुष्क गर्मी और बहुत कम आर्द्रता जल शीघ्र उड़ा देती है
हिमालय / लद्दाखशुष्क ठंड में सुखाना; धुएँ में पकानासूखी खुबानी, सूखी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, कठोर पनीर (छुरपी), सूखा मांसलंबी हिमशीत ऋतु, जिसमें हवा में नमी लगभग नहीं होती
उत्तरी मैदानतेल और नमक में अचार डालना; धूप में सुखानाआम और नींबू का अचार, सूखी मेथी, वड़ीदो फसलों के बीच लंबी गर्म शुष्क ग्रीष्म ऋतु
तटीय क्षेत्रनमक लगाकर सुखानासूखी मछली (बॉम्बे डक, झींगा), नमक लगा आमसमुद्र के पास नमक सुलभ है और आर्द्र जलवायु में मछली को सुरक्षित रखना आवश्यक है
पठार / दक्कनकोठियों में अनाज भंडारण; धूप में सुखानामिट्टी की कोठियों में ज्वार-बाजरा, सूखी लाल मिर्चइतनी लंबी शुष्क ऋतु कि पूरी फसल संचित की जा सके
पूर्वोत्तरचूल्हे के ऊपर धुएँ में रखना; किण्वनधुएँ में पका मांस और मछली, किण्वित बाँस की कोंपलें, अखुनीभारी वर्षा और नम हवा के कारण धूप में सुखाना संभव नहीं, इसलिए धुआँ और किण्वन अपनाए जाते हैं
सामान्य सिद्धांत: भोजन इसलिए खराब होता है कि सूक्ष्मजीवों को जल चाहिए। ऊपर की हर विधि या तो जल हटा देती है (सुखाना), या जल को बाँध देती है (नमक, चीनी), या भोजन को हवा से अलग कर देती है (तेल), या उसे इतना अम्लीय बना देती है कि सूक्ष्मजीव पनप न सकें (किण्वन) — और प्रत्येक क्षेत्र वही विधि अपनाता है जो उसकी जलवायु में सबसे सरल हो।
प्र9.
इतने अलग-अलग भौतिक स्वरूपों (पर्वतीय, मरुस्थलीय, मैदानी, तटीय इत्यादि) के साथ भारत एक विशाल देश है। भारत की भौगोलिक स्थिति ने लोगों को एकजुट रहने में किस प्रकार सहायता की है। इसके बारे में आपका क्या विचार है?
उत्तर

जो भूगोल भारत को विविध बनाता है, वही उसे बाँधता भी है। चार प्रकार से —

  1. प्राकृतिक सीमाओं का एक ढाँचा। उत्तर में पर्वत, पश्चिम में मरुस्थल और अरब सागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा दक्षिण में हिंद महासागर — इन्होंने पूरे उपमहाद्वीप को एक स्पष्ट ढाँचे में समेट दिया। एक ही ढाँचे के भीतर रहने से लोगों में एक ही भूमि का होने का भाव जागा।
  2. नदियाँ राजमार्ग बनीं। गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु और प्रायद्वीपीय नदियाँ सहस्राब्दियों से लोगों, वस्तुओं और विचारों को ढोती रही हैं। फिर समतल मैदानों ने सड़कों और रेल को देश जोड़ने दिया। व्यापार मार्गों ने हिमालय को समुद्री पत्तनों से जोड़ा।
  3. मानसून सबके लिए एक। जून से सितंबर के बीच वही वर्षा लगभग पूरे देश तक पहुँचती है। इसलिए बुवाई, कटाई और उन्हीं से जुड़े अनेक त्योहार केरल से असम तक एक ही लय में चलते हैं — काम और उत्सव का साझा कैलेंडर।
  4. साझा पावन भूगोल। नदियाँ और पर्वत सर्वत्र पूज्य माने जाते हैं, और तीर्थ मार्ग जान-बूझकर पूरे देश को पार करते हैं — हिमालय में केदारनाथ, सुदूर दक्षिण में रामेश्वरम्, पश्चिम में द्वारका, पूर्व में पुरी। हर क्षेत्र के लोग एक ही स्थान पर मिलते हैं।
भिन्नता जोड़ती क्यों है, तोड़ती क्यों नहीं: किसी भी एक क्षेत्र के पास सब कुछ नहीं है। पर्वत जल और लकड़ी देते हैं, मैदान अन्न, पठार खनिज, तट मछली, नमक और व्यापार। हर क्षेत्र को दूसरे की उपज चाहिए, इसलिए उनके बीच आदान-प्रदान सदा आवश्यक रहा — और आदान-प्रदान ही साझी संस्कृति बनाता है।
नमूना उत्तर: “हमारा भूगोल हमें इसलिए जोड़ता है कि वह हमें एक-दूसरे पर निर्भर बनाता है। हिमालय वह बर्फ सँजोता है जो नदियाँ बनती है; नदियाँ वे मैदान बनाती हैं जिनसे हमारा अन्न आता है; पठार खनिज देता है और तट व्यापार। भारत का कोई भी भाग अकेले पूर्ण नहीं है। इसमें वह एक मानसून जोड़ दीजिए जो लगभग सबके पास एक ही समय पहुँचता है, और वे तीर्थ मार्ग जो पूरे देश को पार करते हैं — तब समझ आ जाता है कि इतने भिन्न-भिन्न क्षेत्र इतने लंबे समय से स्वयं को एक ही भूमि क्यों मानते आए हैं।”
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