यदि नियम-पुस्तिका न होती, तो विवाद के समाप्त होने का कोई ईमानदार रास्ता ही न बचता। दोनों कप्तान अपनी-अपनी बात पर अड़े रहते; रेफरी के निर्णय को ‘निजी राय’ कहकर चुनौती दी जा सकती थी; मैच रुक जाता, दोबारा कराना पड़ता या शोर मचाकर परिणाम तय होता। तब जीत उस टीम की होती जो अधिक शक्तिशाली या अधिक ऊँची आवाज वाली है — उस टीम की नहीं जो वास्तव में सही थी।
सभी नियम-पुस्तिका का पालन करें, इसके लिए क्या आवश्यक है —
- नियम मैच से पहले लिखे और सार्वजनिक हों, खेल के बीच में गढ़े न जाएँ।
- वे दोनों टीमों के लिए एक समान हों — किसी के लिए अलग नियम नहीं।
- सभी ने उन्हें पहले से स्वीकार किया हो, ताकि पालन करना पहले दिए गए वचन जैसा हो।
- एक निष्पक्ष व्यक्ति हो — रेफरी — जिसे नियम लागू करने का अधिकार प्राप्त हो।
- नियम न्यायसंगत दिखें; लोग नियम तभी स्वेच्छा से मानते हैं जब उन्हें लगे कि नियम उनकी भी रक्षा करते हैं।
यदि कप्तान नियम-पुस्तिका मानने से ही मना कर देते, तो खेल झगड़े में बदल जाता। यह तय ही न हो पाता कि कौन जीता, प्रतियोगिता आगे नहीं बढ़ पाती, और भविष्य के मैच भी निरर्थक हो जाते क्योंकि किसी परिणाम पर विश्वास ही न रहता।