प्र1.
चित्र 11.12 में दर्शाए गए सिक्के तमिलनाडु में स्थित पुड्डूकोटाई में उत्खनन के समय मिले हैं। उनके ‘शीर्ष’ पर रोमन राजाओं की आकृति उकेरी हुई है। इस तरह की जानकारियों के द्वारा हम क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
उत्तर
तमिलनाडु की मिट्टी में मिले रोमन स्वर्ण सिक्के दक्षिण भारत और रोमन विश्व के बीच दूरगामी व्यापार का ठोस प्रमाण हैं।
इस खोज से चार निष्कर्ष निकलते हैं —
- संपर्क था। दक्षिण भारत अलग-थलग नहीं था; वह अरब सागर और भूमध्य सागर पार के देशों से नियमित संपर्क में था।
- व्यापार समुद्री था। सिक्कों के प्रयोग से भारत को समुद्री व्यापार बढ़ाने में सहायता मिली, और ऐसे ही सिक्के केरल तथा तमिलनाडु के तटीय व्यापारिक क्षेत्रों में मिलते हैं।
- व्यापार भारत के पक्ष में था। यही निष्कर्ष अध्याय स्वयं निकालता है। रोमन स्वर्ण भारत में आ रहा था, अर्थात् भारतीय रोम को जितना बेच रहे थे (काली मिर्च, मसाले, वस्त्र, मनके, मोती) उससे कम खरीद रहे थे।
- शक्तिशाली शासकों के सिक्के दूर तक स्वीकृत होते थे। अध्याय पहले ही बता चुका है कि शक्तिशाली शासकों के सिक्के उनके अपने राज्य के अलावा अन्य राज्यों में भी स्वीकृत होने लगे। रोमन स्वर्ण सिक्के इसका प्रमाण हैं।
ऐसा क्यों होता है: स्वर्ण सिक्के का मूल्य उसकी धातु में भी उतना ही था जितना शासक की मुहर में। पुड्डूकोटाई के व्यापारी को किसी रोमन सम्राट की प्रजा बनने की आवश्यकता नहीं थी — सोना स्वयं ही गारंटी था।
संकेत: जब प्रश्न पूछे कि कोई पुरातात्विक खोज क्या बताती है, तो तीन बातें देखिए — वस्तु क्या है, कहाँ मिली, और किस दिशा में चली। यहाँ : सोना, अपने देश से बहुत दूर, भारत की ओर आता हुआ।