अन्वेषण अध्याय 11 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपके विचार में क्या हुआ होगा जब सिक्कों का प्रयोग हर प्रकार के लेन-देन के लिए शुरू हुआ होगा, चाहे वह सब्जियाँ हों या जमीन खरीदना हो?
उत्तर

सिक्के छोटे क्रय के लिए उत्तम थे और बड़े क्रय के लिए अत्यंत असुविधाजनक, इसलिए आवश्यक सिक्कों की संख्या बहुत बढ़ गई

एक गड्डी पालक ≈ कुछ छोटे सिक्के — सरल
जमीन का एक टुकड़ा ≈ हजारों सिक्के — धातु के बोरे
अर्थात् : सौदा जितना बड़ा, भुगतान उतना भारी

इसके परिणाम —

  • बड़े भुगतान बोरों या गाड़ियों में ले जाने पड़ते, कभी-कभी पहरेदारों के साथ।
  • बड़ी राशि गिनने में लंबा समय लगता, और हर सिक्के का भार व शुद्धता जाँचनी पड़ती।
  • राज्यों के बीच जाने वाले व्यापारियों को लंबी दूरी तक भारी भार ढोना पड़ता।
  • घर में संपत्ति रखने का अर्थ था धातु का विशाल ढेर रखना।

अध्याय का अपना निष्कर्ष यही है — बड़ी मात्रा में सिक्के ले जाना कठिन होता होगा और सिक्कों को संगृहीत करना भी एक समस्या बन गई होगी। इसी खोज का अंत कागजी मुद्रा पर हुआ।

प्र2.
ऐसी क्या समस्याएँ उत्पन्न हुई होंगी?
उत्तर

चार स्पष्ट समस्याएँ — और ये वस्तु विनिमय की पुरानी समस्याएँ ही नए रूप में लौट आई थीं।

समस्याव्यवहार में इसका अर्थ
सुवाह्यतासिक्कों में बड़ी राशि भारी और भारी-भरकम — बाजार तक या राज्य के पार ले जाना कठिन
भंडारणधातु में रखी संपत्ति के लिए स्थान और मजबूत कोठरी चाहिए
सुरक्षाधातु के दिखाई देने वाले बोरे मार्ग में चोरों को आमंत्रित करते हैं
गिनना और परखनाहजारों सिक्के गिनने, तौलने और नकली या कटे-छँटे सिक्कों की जाँच करने पड़ते हैं

समाधान यह निकला कि धातु ढोने के स्थान पर हल्के कागज पर मूल्य लिख दिया जाए। कागजी मुद्रा पहली बार चीन में प्रयोग की गई और भारत में 18वीं शताब्दी के अंत में आई। तब से सिक्के छोटे अंकित मूल्यों के लिए और कागजी मुद्रा बड़े अंकित मूल्यों के लिए प्रयोग होने लगी।

ऐसा क्यों होता है: मुद्रा में मूल्य भी होना चाहिए और सुविधा भी। धातु ने मूल्य दिया पर सुविधा छीन ली। कागज सामग्री का मूल्य पूरी तरह छोड़ देता है और केवल जारीकर्ता पर विश्वास के बल पर चलता है — इसीलिए आज केवल भारतीय रिजर्व बैंक ही इसे जारी कर सकता है।
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