प्र1.
पिछली कक्षा में आपने ‘अतीत के चित्रपट’ विषय में पढ़ा था कि लोग किस प्रकार की फसलें उगाते थे, जैसे – अनाज; या वे कारनेलियन के मनके जैसी वस्तुएँ कैसे बनाते थे। आपके विचार में, वे इन वस्तुओं का विनिमय अपनी आवश्यकता की वस्तुओं के लिए कैसे करते होंगे?
उत्तर
वे इनका विनिमय सीधे वस्तु के बदले वस्तु के रूप में करते होंगे, अर्थात् वस्तु विनिमय प्रणाली से। उस समय न सिक्के थे, न नोट। अतिरिक्त अनाज वाला किसान ऐसे मनका बनाने वाले को ढूँढ़ता जिसे अनाज चाहिए, और दोनों तय कर लेते कि कितना अनाज एक माला के बराबर होगा।
अध्याय का पहला चित्र (चित्र 11.1) यही दिखाता है — खेत में दो व्यक्ति टोकरी से अनाज एक-दूसरे के बोरों में डाल रहे हैं।
ऐसा विनिमय तीन बातों से संभव होता था —
- अतिरिक्त उत्पादन। परिवार अपनी आवश्यकता से अधिक उगाता या बनाता था, इसलिए देने के लिए कुछ बचता था।
- मेले और हाट। निश्चित दिनों पर लोग एक स्थान पर एकत्र होते थे, जिससे उपयुक्त साथी मिलना सरल हो जाता था।
- सर्वस्वीकृत वस्तुएँ। अनाज, पशुधन, नमक और कौड़ी की माँग लगभग सबको रहती थी, इसलिए इन्हें आगे भी चलाया जा सकता था।
ऐसा क्यों होता है: मनके बनाने वाला मनके खा नहीं सकता। विनिमय ही एक विशेष कौशल को पूरा जीवन बनाता है — कुम्हार, बुनकर और किसान, हर कोई एक काम अच्छी तरह करता है और शेष के लिए विनिमय करता है।