हाँ — और अध्याय में उद्धृत दोनों पुर्तगाली यात्रियों के वर्णन से यह चित्र बन जाता है।
कल्पना कीजिए कि आप 16वीं शताब्दी में विरूपाक्ष मंदिर के सामने खड़े हैं। मंदिर के गोपुरम से एक लंबी, सीधी, स्तंभों वाली गली आगे जाती है, जिसके दोनों ओर पत्थर के मंडप बने हैं। उनके नीचे विक्रेता अपने ढेर लगाए बैठे हैं —
- अन्न और कृषि-उत्पाद — अनाज, बीज, दूध, तेल।
- वस्त्र — रेशम, और “कपड़ों के विक्रेताओं के लिए कपास”।
- पशु-पक्षी — गाय, खरगोश, घोड़े और यहाँ तक कि बटेर और तीतर।
- बहुमूल्य वस्तुएँ — “सोने के जवाहरात और कृत्रिम आभूषण… हर प्रकार के माणिक्य, हीरे-मोतियों”।
- चारा — “प्रचुर मात्रा में घास और भूसा” घोड़ों और पशुओं के लिए।
शिल्पकार यहाँ किसी बंद कारखाने में नहीं थे — “वहाँ शिल्पकार भी थे, जो अपनी गलियों में काम करते थे”। अर्थात् क्रेता स्वर्णकार को आभूषण गढ़ते देखता और वहीं से तैयार वस्तु खरीद लेता था। इसमें अनेक भाषाओं में होते मोल-तोल का शोर, फारस और पुर्तगाल से आए व्यापारी, मंदिर की घंटियाँ और तेल-मसालों की गंध जोड़ दीजिए — यही वह बाजार है जिसे डोमिन्गोस पेस ने ‘विश्व में उत्कृष्ट उपलब्धता वाला शहर' कहा था।