प्र1.
प्रायः क्रेता और विक्रेता किसी स्वीकार्य कीमत पर लेन-देन करने के लिए मोल-तोल करते हैं। आपके नाटक में किस तरह का मोल-तोल हुआ था?
उत्तर
ऊपर के नाटक में मोल-तोल पाँच पहचानी जा सकने वाली चालों से गुजरा। उत्तर में इन्हें नाम देकर लिखिए — यही वर्णन को व्याख्या बना देता है।
- ऊँची शुरुआत। विक्रेता ने ₹60 से आरंभ किया, ताकि नीचे आने के बाद भी लाभ बचा रहे।
- तुलना का तर्क। क्रेता ने पास के दूसरे ठेले की कीमत (₹45) का हवाला दिया — भारतीय बाजार की सबसे आम चाल।
- गुणवत्ता का तर्क। विक्रेता ने संख्या से नहीं, तर्क से उत्तर दिया — उसके फल बेदाग और ताजे हैं, इसलिए अधिक मूल्य के हैं।
- मात्रा का मोल-तोल। क्रेता ने एक की जगह दो किलो लेने का प्रस्ताव रखा। बड़ी बिक्री के लिए विक्रेता प्रति किलो कम लेने को तैयार हो जाता है।
- लागत की सीमा। विक्रेता ने बताया कि उसने मंडी में ₹40 दिए हैं। उससे नीचे उसे घाटा होगा, इसलिए वहीं उसकी सीमा है।
अंततः दोनों ₹50 पर मिले — विक्रेता की ₹40 की सीमा से ऊपर और क्रेता की आरंभिक सीमा से नीचे। ऊपर से दो अमरूद देकर सौदा बिना कीमत बदले पक्का हो गया।
ऐसा क्यों होता है: मोल-तोल वास्तव में सूचना का आदान-प्रदान है। किसी को दूसरे की सीमा नहीं पता होती, इसलिए दोनों थोड़ा-थोड़ा बताते हैं — लागत, गुणवत्ता, मात्रा, विकल्प — जब तक दोनों की सीमाएँ आपस में न मिल जाएँ। यदि वे कभी न मिलें, तो “उस स्थिति में लेन-देन नहीं हो सकता”, जैसा अध्याय कहता है।