इसे अच्छी तरह कैसे करें: दो-तीन बुजुर्गों से बात कीजिए — यदि हो सके तो किसी किसान, मछुआरे या माली से। उनसे पूछिए कि (i) वे कौन-सा संकेत देखते हैं, (ii) वह क्या बताता है, (iii) कितने दिन पहले, और (iv) क्या वह आज भी सही उतरता है। प्रत्येक कहावत पहले अपनी लिपि में लिखिए, फिर उसका अर्थ। अंत में उनके कुछ संकेतों की तुलना एक सप्ताह तक भारत मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमान से कीजिए।
नमूना उत्तर: हमारी पड़ोसिन शांताबाई, जो दो एकड़ खेती करती हैं, कहती हैं कि मानसून के आने का पता लगाने के लिए उन्हें कभी पूर्वानुमान की आवश्यकता नहीं पड़ी।
| देखा गया संकेत | किसका संकेत माना जाता है |
|---|---|
| चींटियों का अपने अंडे ऊँचे स्थानों पर ले जाना | एक-दो दिन में भारी वर्षा |
| पक्षियों का असामान्य रूप से कम ऊँचाई पर उड़ना | आने वाला तूफान |
| साँझ को मेढ़कों की तेज टरटराहट | उसी रात वर्षा |
| चीड़ के शंकुओं का बंद हो जाना | वायु में आर्द्रता बढ़ना — वर्षा निकट |
| गिलहरियों का मेवे एकत्र करना | आगे कठिन ऋतु |
| मोर का बोलना और नाचना | मानसून की पहली फुहारें |
| चंद्रमा के चारों ओर घेरा | दो-तीन दिन में वर्षा |
एकत्र की गई कहावतें: “चींटी अंडे ले चली, बरसात आने वाली” — जब चींटियाँ अंडे ढोने लगें तो वर्षा निकट है। घाघ की प्रसिद्ध उक्ति भी याद रखिए — “शुक्रवारी बादरी रहे सनीचर छाय, तो यों भाखै भड्डरी बिन बरसे ना जाय”।