प्र1.
इस विशाल मूर्ति (1.85 मीटर ऊँची) को ध्यान से देखिए। इसके वस्त्र, आयुध और जूतों को देखिए। इनसे इस आकृति के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर
सिर न होने पर भी यह मूर्ति लगभग सब कुछ बता देती है। यह राजा कनिष्क की है, जो संभवतः कुषाण वंश के सबसे शक्तिशाली शासक थे — उस पर ब्राह्मी लिपि में अंकित है : ‘महाराजा राजाधिराज देवपुत्र कनिष्क'।
| जो दिखाई देता है | उससे क्या पता चलता है |
|---|---|
| घुटनों से नीचे तक जाता भारी सिला हुआ लंबा कोट, नीचे पाजामा | यह मध्य एशियाई वेशभूषा है, भारतीय नहीं। ठंडे प्रदेश और घुड़सवारी के अनुकूल — कुषाण “मूलतः मध्य एशिया के निवासी थे”। वे जैसे थे वैसे ही दिखाए गए हैं : विदेशी मूल के शासक, और इस पर संकोच नहीं |
| भारी गद्देदार जूते, पैर चौड़े जमाए हुए | घुड़सवारी के जूते — फिर वही अश्वारोही परंपरा। पैरों का जमाव स्थिरता, अधिकार और दृढ़ता दर्शाता है |
| बाईं ओर लटकती लंबी तलवार और दाहिने हाथ में बड़ी गदा या छोटी तलवार | वे योद्धा राजा हैं। गदा जितनी शस्त्र है, उतनी ही आदेश-सत्ता का प्रतीक भी |
| आकार : 1.85 मीटर — पूर्ण मानव-आकार से भी बड़ा | यह देखे जाने और ऊपर उठकर देखे जाने के लिए बनी थी — किसी सार्वजनिक देवकुल या सभा-भवन के लिए, निजी कक्ष के लिए नहीं |
| वस्त्र के निचले किनारे पर ब्राह्मी अभिलेख | उन्होंने स्थानीय लिपि और भारतीय राजकीय उपाधियाँ अपनाईं — विदेशी शासक स्वयं को भारतीय सम्राट के रूप में प्रस्तुत करता है |
| सादी, अलंकरण-रहित सतहें | यहाँ शक्ति आभूषणों से नहीं, वस्त्रों और शस्त्रों से दर्शाई गई है — पृष्ठ 123 की शुंग आकृतियों से बिलकुल भिन्न |
बड़ी बात : यह मूर्ति चलते हुए समावेशन का चित्र है। मध्य एशियाई कोट, जूते और तलवार; भारतीय पत्थर, भारतीय लिपि और भारतीय उपाधियाँ; और राजकीय प्रतिमा स्थापित करने की कल्पना भी। वे कुषाण होना नहीं छोड़े, और भारतीय सम्राट बन गए।
क्या आप जानते हैं? सिर बहुत पहले खंडित हो गया था, इसीलिए यह ‘सिरविहीन' कनिष्क के रूप में प्रसिद्ध है। यह मथुरा के निकट मात नामक स्थान से प्राप्त हुई — उसी क्षेत्र से, जिसके नाम पर इस अध्याय की एक प्रमुख कला शैली का नाम पड़ा।