कक्षा ७ सामाजिक विज्ञान अध्याय 6 पुनर्गठन का काल के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
मौर्य साम्राज्य का विघटन हुआ और भारत का मानचित्र बदल गया। लगभग 185 सा.सं.पू. में अंतिम मौर्य शासक की हत्या उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने कर दी — सम्राट अशोक के लगभग आधी शताब्दी बाद ही। अनेक नवीन राज्य उभरे, जो पहले मौर्य साम्राज्य की अधीनता में शासन कर रहे थे। पूर्ववर्ती क्षेत्रों का पुनर्गठन कर नए राज्य बने, इसीलिए विद्वान इस काल को ‘पुनर्गठन का युग' कहते हैं। मानचित्र (चित्र 6.2) पर नौ शक्तियाँ हैं — छह भीतर की, तीन बाहर की। उपमहाद्वीप में स्थित राजवंश : शुंग, चेदि, सातवाहन, चोल, चेर, पांड्य । उपमहाद्वीप के बाहर से आए : इंडो-ग्रीक, शक (इंडो-सिथियन) तथा कुषाण । ये सभी क्षेत्रीय नियंत्रण के लिए स्पर्धा कर रहे थे — कभी वैवाहिक गठबंधन से, कभी युद्ध से, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों पर। दक्कन में सातवाहन व्यापार से समृद्ध हुए। गुजरात से आंध्र प्रदेश तक मिले उनके सिक्कों पर दो मस्तूल वाले जहाज
त्वरित पुनरावृत्ति
| शब्द | अर्थ | अध्याय में कहाँ | याद रखने योग्य |
|---|---|---|---|
| पुनर्गठन का काल | मौर्योत्तर काल, जब पूर्ववर्ती क्षेत्रों का पुनर्गठन कर परस्पर स्पर्धा करते नवीन राज्य बने | पृष्ठ 118 | लगभग 200 सा.सं.पू. से 300 सा.सं. — अध्याय की समय-रेखा की अवधि |
| वैवाहिक गठबंधन | विवाह के द्वारा तय किया गया गठबंधन; प्रायः राजा अपनी पुत्री का विवाह पड़ोसी राजपरिवार में करता था | हाशिया, पृष्ठ 120 | नियंत्रण पाने का शांतिपूर्ण उपाय; दूसरा उपाय था युद्ध |
| अश्वमेध यज्ञ | वैदिक अनुष्ठान जिसमें घोड़ा सैनिकों के साथ स्वतंत्र छोड़ा जाता था; जो क्षेत्र वह बिना चुनौती पार करे, वह राजा का माना जाता | इसे अनदेखा न करें, पृष्ठ 121 | पुष्यमित्र शुंग तथा एक सातवाहन विधवा रानी ने यह किया |
| भरहुत स्तूप | वर्तमान मध्य प्रदेश का स्तूप; मूल निर्माण संभवतः अशोक के काल में, शुंगों ने वेदिकाएँ और शिल्प जोड़े | पृष्ठ 122, चित्र 6.5 एवं 6.7 | बौद्ध कला के प्रारंभिक उदाहरणों में गिना जाता है |
| सातवाहन | दक्कन का शक्तिशाली राजवंश (दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से), कभी-कभी ‘आंध्र' भी कहा गया | पृष्ठ 124–128 | राजधानियाँ अमरावती तथा प्रतिष्ठान (पैठन) |
| नानेघाट गुफाएँ | पुणे के पास प्रमुख व्यापार मार्ग की गुफाएँ, जो कर-संग्रह और व्यापारियों के विश्राम स्थल के रूप में प्रयुक्त होती थीं | पृष्ठ 125, चित्र 6.9 | इनके अभिलेखों में रानी के दान और आरंभिक ब्राह्मी अंक मिलते हैं |
| हाथीगुंफा अभिलेख | उदयगिरि की एक गुफा में ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण अभिलेख, जो राजा खारवेल की प्रतिवर्ष की उपलब्धियों का वर्णन करता है | पृष्ठ 129, चित्र 6.13.2 | खारवेल स्वयं को ‘सर्वमतों का सम्मानकर्ता और समस्त देवालयों का पुनरुद्धारक' कहते हैं |
| शैलकृत स्थापत्य | चट्टान को काटकर कक्ष, स्तंभ आदि बनाने की शैली — निर्माण नहीं, उत्कीर्णन | पृष्ठ 128 | उदयगिरि-खंडगिरि (जैन) तथा कार्ले (बौद्ध) गुफाएँ |
| संगम साहित्य | कवियों की सभाओं द्वारा रचित तमिल काव्य-संग्रह; संस्कृत ‘संघ' अर्थात् ‘समिति', ‘एकत्र होना' से बना शब्द | पृष्ठ 130 | दक्षिण भारत का प्राचीनतम साहित्य; इसमें तीन मुकुटधारी राजाओं का उल्लेख |
| कल्लनई (ग्रैंड एनीकट) | करिकाल द्वारा कावेरी पर, श्रीरंगम द्वीप से नीचे बनाई गई जल-वितरण प्रणाली | पृष्ठ 132, चित्र 6.17 | आज भी प्रयोग में; इसी से यह क्षेत्र ‘दक्षिण का अन्न भंडार' कहलाया |
| शक संवत | शक काल में विकसित पंचांग, ग्रेग्रोरियन कैलेंडर से 78 वर्ष पीछे (जनवरी–मार्च में 79) | इसे अनदेखा न करें, पृष्ठ 135 | 1957 में भारतीय राष्ट्रीय पंचांग के रूप में स्वीकृत |
| रेशम मार्ग (सिल्क रूट) | चीन को भूमध्यसागरीय क्षेत्र से जोड़ने वाला व्यापार मार्ग, जो मध्य एशिया और फारस से होकर जाता था | चित्र 6.25, पृष्ठ 138–139 | कुषाणों ने इसके महत्वपूर्ण भागों पर नियंत्रण रखा |
| गांधार कला शैली | पंजाब के पश्चिमी भागों की कला, जिसमें ग्रीक-रोमन और भारतीय तत्वों का समायोजन है; प्रायः स्लेटी-काला शिस्ट पत्थर | पृष्ठ 137, चित्र 6.24 | यथार्थ शरीर-रचना, उड़ते हुए वस्त्र, सूक्ष्म विवरण |
| मथुरा कला शैली | मथुरा क्षेत्र की विशिष्ट भारतीय शैली, प्रायः लाल बलुआ पत्थर में | पृष्ठ 140, चित्र 6.26 | मृदुलाकार (गोल-मटोल) चिकनी आकृतियाँ, भारतीय देवी-देवता, यक्ष-यक्षिणी |
अभ्यास
- महत्वपूर्ण प्रश्न
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- प्रश्न और क्रियाकलाप