प्र1.
मौर्योत्तर काल को कभी-कभी ‘पुनर्गठन का काल’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर
क्योंकि इन शताब्दियों में भारत का राजनीतिक मानचित्र बिखरा और फिर से गढ़ा गया। अध्याय स्वयं कहता है — “इस काल में पूर्ववर्ती क्षेत्रों का पुनर्गठन कर नवीन राज्यों का निर्माण हुआ, जो निरंतर सत्ता की आकांक्षा में एक-दूसरे से स्पर्धा कर रहे थे।”
घटनाओं की शृंखला देखिए :
लगभग 185 सा.सं.पू. — अंतिम मौर्य शासक की हत्या उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा
→ अशोक के लगभग आधी शताब्दी बाद ही साम्राज्य का विघटन
→ जो राज्य पहले मौर्य अधीनता में थे, वे स्वतंत्र हो गए
→ उत्तर-पश्चिम दुर्बल हुआ और बाह्य आक्रमणों के लिए असुरक्षित हो गया
→ नए राज्य वैवाहिक गठबंधन और युद्ध से क्षेत्र पर अधिकार करने लगे
→ भारत का मानचित्र विशेष रूप से बदला — और जनसामान्य का जीवन भी
→ अशोक के लगभग आधी शताब्दी बाद ही साम्राज्य का विघटन
→ जो राज्य पहले मौर्य अधीनता में थे, वे स्वतंत्र हो गए
→ उत्तर-पश्चिम दुर्बल हुआ और बाह्य आक्रमणों के लिए असुरक्षित हो गया
→ नए राज्य वैवाहिक गठबंधन और युद्ध से क्षेत्र पर अधिकार करने लगे
→ भारत का मानचित्र विशेष रूप से बदला — और जनसामान्य का जीवन भी
एक साथ दो चीज़ों का पुनर्गठन हो रहा था :
- राजनीतिक सत्ता — एक विशाल साम्राज्य के स्थान पर अनेक छोटे-बड़े राज्य : उत्तर और दक्कन में शुंग, चेदि, सातवाहन; दक्षिण में चोल, चेर, पांड्य; उत्तर-पश्चिम से आते इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण।
- संस्कृति — “कला, शिल्प और साहित्य के क्षेत्र में विकास में तेजी आई और सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी समृद्ध हुआ।” नई कला-शैलियाँ, नए सिक्के और संस्कृत साहित्य का उत्कर्ष इसी युग की देन हैं।
ऐसा क्यों हुआ : विशाल साम्राज्य तभी तक टिकता है जब तक उसका केंद्र सुदृढ़ हो। मौर्य केंद्र के ढहते ही क्षेत्र लुप्त नहीं हुए — वे नए राज्यों की ईंटें बन गए। इसीलिए इतिहासकार इसे विनाश का नहीं, पुनर्गठन का काल कहते हैं।