प्र1.
चित्र 6.6 के कोलाज में चित्रों को ध्यान से देखिए। कपड़ों, आभूषणों और दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुओं पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर
नमूना उत्तर — प्रश्न जिस प्रकार की टिप्पणी माँगता है। कोलाज में दस वस्तुएँ हैं; अपने विचार इस प्रकार वर्गीकृत कीजिए।
| चित्र 6.6 की वस्तु | क्या दिखाई देता है |
|---|---|
| 6.6.1 ग्रीक योद्धा को दर्शाता स्तंभ | छोटा कसा हुआ अंगरखा, छाती पर आड़ा पट्टा, कमर में तलवार और जूते — भारतीय स्तंभ पर उत्कीर्ण विदेशी वेशभूषा |
| 6.6.2 पुरुष आकृति | ऊपरी शरीर अनावृत, चुन्नटदार धोती, भारी पगड़ी, बड़े कर्णाभूषण, चूड़ियाँ |
| 6.6.3 बालक को गोद में लिए स्त्री | सजी हुई केश-रचना, बड़े गोल कुंडल, कई लड़ियों वाले हार, कमर में चौड़ी मनकों की मेखला, कलाई से कोहनी तक चूड़ियाँ, पायल |
| 6.6.4 पंखे के साथ स्त्री | पंखा स्वयं दैनिक उपयोग की वस्तु है; यहाँ भी मेखला और चूड़ियों की पंक्तियाँ देखिए |
| 6.6.5 गमला | पकी मिट्टी का, जिसकी पूरी सतह पर मनुष्यों और पशुओं की छोटी-छोटी आकृतियों की पंक्तियाँ हैं — अलंकृत घरेलू पात्र |
| 6.6.6 बालों के आभूषण के साथ स्त्री की आकृति, पकी मिट्टी | मुकुट जैसी केश-सज्जा, माथे पर अर्धचंद्र — केश-सज्जा स्वयं एक कला थी |
| 6.6.7 राजपरिवार | पगड़ी, आभूषण और लंबे दंड के साथ दो संपन्न आकृतियाँ — आभूषण वही, पर मात्रा अधिक |
| 6.6.8 काँसे की चूड़ियाँ जिन पर सोने की पतली परत | यह वास्तविक आभूषण है, मूर्ति नहीं : सोने की परत चढ़ाना एक चतुर शिल्प-तकनीक थी, जिससे बहुमूल्य दिखने वाले गहने सुलभ हो जाते थे |
| 6.6.9 हाथी दाँत का कंघा | बारीक लंबे दाँते और ऊपरी भाग पर आकृतियों तथा पशुओं का उत्कीर्णन — दैनिक वस्तु को भी सुंदर बनाया गया |
| 6.6.10 हार के मनके | भिन्न-भिन्न आकार के छोटे स्वर्ण मनके, जिनमें एक छोटी पशु-आकृति भी है — अत्यंत सूक्ष्म स्वर्णकारी का प्रमाण |
पूरे कोलाज से क्या पता चलता है :
- वस्त्र मुख्यतः बिना सिले थे — धोती, साड़ी जैसा परिधान, कमरबंद और पगड़ी। अपवाद है ग्रीक योद्धा, जो सिला अंगरखा और जूते पहने है। अर्थात् विदेशी वेशभूषा परिचित थी और उसे सहजता से उत्कीर्ण किया गया।
- आभूषण सभी ने पहने हैं, पुरुषों ने भी : कुंडल, हार, बाजूबंद, चूड़ियाँ, मेखला, पायल। सामग्री — पकी मिट्टी, काँसा, सोने की परत चढ़ा काँसा, स्वर्ण और हाथी दाँत।
- दैनिक वस्तुएँ भी सजाई जाती थीं — कंघा, गमला, पंखा। कला केवल मंदिरों तक सीमित नहीं थी।
- पकी मिट्टी की इतनी वस्तुएँ बताती हैं कि केवल धनी नहीं, साधारण लोग भी सुंदर गढ़ी हुई आकृतियाँ रख सकते थे। मिट्टी सस्ती थी, कौशल नहीं।
यह कीजिए : 6.6.8 की तुलना आज बिकने वाली किसी सोने की परत चढ़ी चूड़ी से कीजिए। सस्ती धातु पर सोने की पतली परत — यह तकनीक दो हजार वर्ष से भी पुरानी है।