प्र1.
आपके अनुसार राजा के नाम के आरंभ में उसकी माँ का नाम लिखने की परंपरा का क्या अर्थ है?
उत्तर
इसका अर्थ है कि सातवाहन समाज में माता का कुल और स्वयं माता की प्रतिष्ठा राजा के गौरव का स्रोत थी — इतनी कि उसे राजकीय नाम में, सिक्कों पर और अभिलेखों में घोषित किया जाता था।
पुस्तक का उदाहरण देखिए :
गौतमीपुत्र शातकर्णी = ‘शातकर्णी, गौतमी के पुत्र'
माता : गौतमी बलश्री — शक्तिशाली रानी, जिन्होंने बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान दी और नासिक में महत्वपूर्ण शिलालेख उत्कीर्ण करवाया
चित्र 6.10 के सिक्के पर ब्राह्मी लिपि में — ‘गौतमीपुत्र राजा शातकर्णी'
माता : गौतमी बलश्री — शक्तिशाली रानी, जिन्होंने बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान दी और नासिक में महत्वपूर्ण शिलालेख उत्कीर्ण करवाया
चित्र 6.10 के सिक्के पर ब्राह्मी लिपि में — ‘गौतमीपुत्र राजा शातकर्णी'
इसके संभावित अर्थ :
- स्त्रियों का वास्तविक प्रभाव था। गौतमी बलश्री ने अपने नाम से दान दिया और अभिलेख उत्कीर्ण करवाया — ये किसी प्रभावशाली व्यक्ति के कार्य हैं, केवल राजपरिवार की सदस्या के नहीं।
- माता का वंश महत्वपूर्ण था। ननिहाल का नाम जोड़ने से राजगद्दी पर राजकुमार का दावा और सुदृढ़ होता था।
- माता का सम्मान एक सार्वजनिक मूल्य था, केवल निजी भाव नहीं — अन्यथा वह सिक्कों पर अंकित न होता।
- पहचान स्पष्ट होती थी। एक ही राजवंश के कई राजकुमारों की उपाधि ‘शातकर्णी' हो सकती थी; माता का नाम उन्हें अलग-अलग पहचान देता था।
यह विशेष क्यों : अधिकांश प्राचीन राजवंशों में राजा का नाम पिता के नाम से जुड़ता था। सातवाहनों ने इसके विपरीत किया — यह स्मरण दिलाता है कि भारतीय समाज एकरूप नहीं था और भिन्न-भिन्न क्षेत्रों ने परिवार तथा उत्तराधिकार की अपनी-अपनी परंपराएँ बनाईं।
क्या आप जानते हैं? नानेघाट के अभिलेख (चित्र 6.9) एक अन्य सातवाहन स्त्री पर केंद्रित हैं — वह विधवा रानी, जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ सहित अनेक वैदिक अनुष्ठान संपन्न किए, जो सामान्यतः राजाओं से जुड़े माने जाते हैं।