अन्वेषण अध्याय 6 आइए विचार करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पीतलखोरा से प्राप्त यक्ष की इस मूर्ति के हाथ पर एक लेख उत्कीर्ण है — ‘कन्हणदासेन हीरामकारेना काट’ जिसका अर्थ है — ‘कन्हणदास नामक स्वर्णकार द्वारा निर्मित’। क्या यह रोचक नहीं है कि एक सुनार भी पत्थर की मूर्ति बना सकता था? आपके विचार में इससे हमें उस समय के लोगों के व्यवसायों के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर

इससे पता चलता है कि उस काल में व्यवसाय वास्तविक कौशल थे, जड़ लेबल नहीं — एक सामग्री में प्रशिक्षित शिल्पी दूसरी सामग्री में भी काम कर सकता था और करता भी था।

इस एक छोटे-से लेख से चार बातें निकलती हैं :

  1. शिल्प एक-दूसरे से जुड़े थे। स्वर्णकार बारीक छेनी, ठप्पे और रेती से सूक्ष्म काम करता है। हाथ और आँख का वही अभ्यास पत्थर पर भी काम आता है। इसलिए हीरामकार (स्वर्णकार) कहलाने वाला व्यक्ति एक बड़ा यक्ष गढ़ सका।
  2. शिल्पी को अपने काम पर गर्व था। कन्हणदास ने मूर्ति पर अपना नाम अंकित किया। वह पहचाना जाना चाहता था — अर्थात् कारीगर के नाम और प्रतिष्ठा का मूल्य था।
  3. शिल्पी साक्षर थे या उन्हें लेखन उपलब्ध था — किसी को वह ब्राह्मी पंक्ति रचकर उत्कीर्ण करनी ही पड़ी।
  4. माँग और गतिशीलता थी। पीतलखोरा जैसे गुफा-स्थलों पर बड़े पैमाने पर काम चल रहा था, इसलिए कुशल हाथ वहीं पहुँचते थे जहाँ काम था।
यह क्यों महत्वपूर्ण है : हम प्रायः राजाओं के विषय में इसलिए जानते हैं क्योंकि उन्होंने अभिलेख छोड़े। यहाँ एक साधारण शिल्पी ने अभिलेख छोड़ा है। वह एक पंक्ति हमें उन लोगों तक पहुँचा देती है जिन्होंने वास्तव में प्राचीन संसार गढ़ा — और बताती है कि वे मौन नहीं थे।
क्या आप जानते हैं? यक्ष प्रकृति से जुड़ा एक गौण देवता है। यह मूर्ति भारी आभूषणों और चुन्नटदार अधोवस्त्र वाली हृष्ट-पुष्ट, मुस्कराती आकृति है, जिसके हाथ ऊपर उठे हुए हैं — यक्ष प्रायः ऊपर की संरचना को थामे हुए रूप में गढ़े जाते हैं।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ