अन्वेषण अध्याय 6 प्रश्न और क्रियाकलाप

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मौर्योत्तर काल को पुनर्गठन का काल क्यों कहा जाता है?
उत्तर

क्योंकि जो क्षेत्र मिलकर एक साम्राज्य बने थे, उनका पुनर्गठन कर परस्पर स्पर्धा करते नए राज्य बनाए जा रहे थे और भारत का मानचित्र नए सिरे से खिंच रहा था।

लगभग 185 सा.सं.पू. — अंतिम मौर्य शासक की हत्या पुष्यमित्र शुंग द्वारा
→ अशोक के आधी शताब्दी बाद ही साम्राज्य का विघटन
→ पूर्व के अधीनस्थ राज्य स्वतंत्र हो गए
→ दुर्बल उत्तर-पश्चिम पर इंडो-ग्रीक, शक, कुषाण के आक्रमण
→ पुरानी और नई शक्तियाँ युद्ध तथा वैवाहिक गठबंधनों से स्पर्धा करने लगीं
→ नया राजनीतिक मानचित्र, और उसके साथ नई कला, मुद्रा, साहित्य एवं व्यापार

तीन चीज़ों का एक साथ पुनर्गठन हुआ :

  • भूभाग — उत्तर में शुंग, कलिंग में चेदि, दक्कन में सातवाहन, दक्षिण में चोल-चेर-पांड्य, उत्तर-पश्चिम में इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण।
  • सत्ता — कोई एक सर्वोच्च शासक नहीं; भिन्न-भिन्न आकार के अनेक राज्य, जो निरंतर उठते-गिरते रहे।
  • संस्कृति — संस्कृतियों का संवाद, जिससे नई कला और स्थापत्य शैलियाँ बनीं, पर भारतीय विषय प्रमुख बने रहे।
संकेत : ऐसे उत्तर में विचार समझाने से पहले तिथि और नाम अवश्य दीजिए — 185 सा.सं.पू. और पुष्यमित्र शुंग।
प्र2.
संगम साहित्य पर 150 शब्दों में एक लेख लिखिए।
उत्तर

संगम साहित्य (लगभग 150 शब्द) :

संगम साहित्य दक्षिण भारत का प्राचीनतम साहित्य है, जिसकी रचना तमिल में लगभग दूसरी-तीसरी शताब्दी सा.सं.पू. से तीसरी शताब्दी सा.सं. के बीच हुई। ‘संगम' शब्द संस्कृत के ‘संघ' से बना है, जिसका अर्थ है ‘समिति' या ‘एकत्र होना' — यहाँ इसका तात्पर्य कवियों की सभाओं से है। उस काल में इतने महान कवि हुए कि पूरे युग को ‘संगम युग' कहा जाता है। यह कोई एक ग्रंथ नहीं, बल्कि अनेक कवियों की रचनाओं के विभिन्न काव्य-संग्रह हैं। इसके विषय दो प्रकार के हैं — व्यक्तिगत भावनाएँ, जैसे प्रेम, तथा सामाजिक मूल्य, जैसे वीरता और उदारता; दोनों अत्यंत कुशल एवं सरल भाषा-शैली में अभिव्यक्त हुए हैं। इन रचनाओं में तीन ‘मुकुटधारी राजाओं' — चोल, चेर और पांड्य — तथा उनकी राजधानियों, युद्धों, दानों और व्यापार का वर्णन मिलता है। इसीलिए इतिहासकार तत्कालीन समाज-व्यवस्था और संस्कृति जानने के लिए संगम काव्य का निरंतर उपयोग करते हैं। महाकाव्य सिलप्पदिकारम् की रचना इन्हीं संग्रहों के तुरंत बाद हुई।

संकेत : 150 शब्दों के लेख में चार बातें अवश्य हों — यह क्या है, नाम का अर्थ, इसमें क्या है, इतिहासकारों के लिए महत्व — और एक उदाहरण। केवल कवियों के नाम गिनाना पर्याप्त नहीं।
प्र3.
इस अध्याय में उल्लिखित किन शासकों ने अपनी उपाधि में माता का नाम सम्मिलित किया। उन्होंने ऐसा क्यों किया?
उत्तर

सातवाहन वंश के शासकों ने। अध्याय कहता है — “सातवाहन परंपरा के अनुसार, राजकुमारों के नाम प्रायः उनकी माताओं के नाम पर रखे जाते थे।”

शासकउपाधि में माता का नामकहाँ दिखता है
गौतमीपुत्र शातकर्णीगौतमी-पुत्र = ‘गौतमी के पुत्र' — माता गौतमी बलश्रीउनके सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि में — ‘गौतमीपुत्र राजा शातकर्णी' (चित्र 6.10)

ऐसा क्यों किया :

  1. माता की प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण थी। गौतमी बलश्री “एक शक्तिशाली रानी थीं, जिन्होंने बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान दी और नासिक में एक महत्वपूर्ण शिलालेख उत्कीर्ण करवाया” — अर्थात् राज्य में वास्तविक प्रभाव रखने वाली स्त्री।
  2. इससे राजा का दावा सुदृढ़ होता था, क्योंकि उसमें ननिहाल के प्रतिष्ठित कुल का नाम भी जुड़ जाता था।
  3. यह माता का सार्वजनिक सम्मान था, जो उस समाज में स्त्रियों को प्राप्त आदर को दर्शाता है।
  4. इससे पहचान स्पष्ट होती थी, क्योंकि उस वंश के कई राजकुमारों की उपाधि ‘शातकर्णी' होती थी।
क्या आप जानते हैं? नानेघाट के अभिलेख एक और उल्लेखनीय सातवाहन स्त्री का वर्णन करते हैं — वह विधवा रानी जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ सहित अनेक वैदिक अनुष्ठान किए और भूमि, गाय तथा चाँदी के सिक्कों का बड़ा दान दिया।
प्र4.
इस अध्याय में वर्णित किसी एक राज्य जो आपको रोचक लगता है, के विषय में 250 शब्दों का एक लेख लिखिए। आपने उस राज्य का चयन क्यों किया? अपना लेख कक्षा में प्रस्तुत कीजिए और यह जानने का प्रयास कीजिए कि आपके सहपाठियों ने कौन-से राज्यों का सर्वाधिक चयन किया है।
उत्तर

इसे अच्छे ढंग से कैसे करें। कोई एक राज्य चुनकर लेख को पाँच बिंदुओं पर खड़ा कीजिए : (1) कहाँ और कब शासन किया; (2) प्रमुख शासक; (3) अर्थव्यवस्था — कृषि, व्यापार, सिक्के; (4) कला, स्थापत्य या साहित्य; (5) आपने उसे क्यों चुना, अपने शब्दों में। फिर श्यामपट्ट पर कक्षा के चयनों की गिनती कीजिए और देखिए कौन-सा राज्य सबसे आगे रहा।

नमूना उत्तर (लगभग 250 शब्द) — सातवाहन :

मैंने सातवाहनों को चुना है, जिन्होंने दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से तीसरी शताब्दी सा.सं. तक दक्कन के विस्तृत भूभाग पर, शुंग साम्राज्य के दक्षिण में शासन किया। उन्हें कभी-कभी ‘आंध्र' भी कहा जाता है। उनका साम्राज्य वर्तमान आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र में फैला था और भिन्न-भिन्न समय पर उनकी राजधानियाँ रहीं, जिनमें अमरावती और प्रतिष्ठान (पैठन) सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।

मुझे वे इसलिए रोचक लगते हैं कि वे एक व्यापारिक शक्ति थे। उनके सिक्के गुजरात से आंध्र प्रदेश तक, दोनों तटों पर मिले हैं और अनेक सिक्कों पर दो मस्तूल वाला जहाज अंकित है — उन्नत जहाज-निर्माण और रोमन साम्राज्य तक फैले समुद्री व्यापार का प्रमाण। वे मसाले, वस्त्र, चंदन, हाथी दाँत और स्वर्णाभूषित मोती निर्यात करते थे तथा काँच और सुगंधित मलहम आयात करते थे। कृष्णा-गोदावरी घाटियों की कृषि ने उन्हें स्थिर आधार दिया और नानेघाट जैसे स्थानों पर लिया गया कर कोष बढ़ाता रहा।

उनके समाज की दो बातें मुझे विशेष प्रिय हैं। पहली, राजकुमारों के नाम माताओं के नाम पर रखे जाते थे — गौतमीपुत्र शातकर्णी, उनकी माता गौतमी बलश्री के नाम पर, जिन्होंने भूमि दान दी और नासिक में शिलालेख उत्कीर्ण करवाया। दूसरी, राजा वासुदेव के उपासक होते हुए भी वैदिक विद्वानों, जैन मुनियों और बौद्ध भिक्षुओं को समान रूप से कर-मुक्त भूमि देते थे और भव्य कार्ले गुफाओं के निर्माण में योगदान करते थे।

मैंने सातवाहनों को इसलिए चुना क्योंकि वे दिखाते हैं कि समृद्धि, सहिष्णुता और स्त्रियों का सम्मान साथ-साथ चल सकते हैं — और इसलिए भी कि जहाज अंकित सिक्का एक अद्भुत साक्ष्य है।

संकेत : प्रस्तुति के समय चित्र 6.8 या चित्र 6.11 वाला पृष्ठ दिखाइए। कक्षा एक चित्र को अनुच्छेद से कहीं अधिक देर तक याद रखती है।
प्र5.
कल्पना कीजिए कि आपको एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ है। आप कौन-सा राजचिह्न चुनेंगे और क्यों? आप एक शासक के रूप में कौन-सी उपाधि धारण करेंगे? अपने राज्य के विषय में एक लेख लिखिए जिसमें राज्य के मूल्य, नियमावली एवं विशिष्टताएँ सम्मिलित हों।
उत्तर

अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए। अपने राज्य की रचना उसी तरह कीजिए जैसे इस अध्याय के राज्य बने थे, और हर चरण पर कारण बताइए :

  • नाम और स्थान — और उसका कारण भूमि से जुड़ा हो (कोई नदी, पहाड़ी या तट)।
  • चोल के बाघ, चेर के धनुष और पांड्य की दो मछलियों जैसा एक राजचिह्न — एक स्पष्ट चित्र जो आपके राज्य के बारे में कुछ कहे।
  • एक उपाधि — कनिष्क की ‘महाराजा राजाधिराज देवपुत्र' और खारवेल की ‘भिक्षु-राजा' याद रखिए।
  • मूल्य, नियमावली और दो-तीन विशिष्टताएँ

नमूना उत्तर :

नाम : नदीपुर, ‘नदी का नगर'। स्थान : वहाँ जहाँ नदी पहाड़ियों से मिलती है, ताकि कृषि और व्यापार दोनों संभव हों।

राजचिह्न : चक्र पर खड़ा मोर। मोर मेरे क्षेत्र का पक्षी है और सौंदर्य तथा सजगता का प्रतीक; चक्र गति, व्यापार और ऋतु-चक्र का। इसे बनाना सरल है, इसलिए यह सिक्के, ध्वज या मील-पत्थर पर अंकित हो सकता है — राजचिह्न में यही गुण चाहिए।

उपाधि : सर्वजन-मित्र, अर्थात् ‘सब लोगों का मित्र'। मैं विजय-सूचक उपाधि नहीं लूँगा। खारवेल की तरह, जिन्होंने स्वयं को ‘सर्वमतों का सम्मानकर्ता' कहा, मैं चाहता हूँ कि मेरी उपाधि मेरी शक्ति नहीं, मेरा कर्तव्य बताए।

मूल्य : सर्वोपरि न्याय — सिलप्पदिकारम् दिखाती है कि एक अन्यायपूर्ण निर्णय ने राजा और नगर दोनों को नष्ट कर दिया; सभी दर्शनों के प्रति सम्मान; और जल की रक्षा, क्योंकि जल ने ही कावेरी डेल्टा को ‘दक्षिण का अन्न भंडार' बनाया।

नियमावली : (1) बिना सार्वजनिक रूप से सुने प्रमाण के किसी को दंड नहीं; (2) उपज का दसवाँ भाग कर, और फसल नष्ट होने पर कुछ नहीं; (3) प्रत्येक गाँव अपने तालाब की देखभाल करे और राज्य उसका व्यय उठाए; (4) सभी बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा; (5) व्यापारी सीमा पर शुल्क दें और बदले में उन्हें विश्राम-गृह तथा सुरक्षित मार्ग मिलें।

विशिष्टताएँ : कल्लनई जैसा एक बाँध; एक सभा-भवन जहाँ प्रतिवर्ष कवि एकत्र हों, संगम की परंपरा में; और ऐसे सिक्के जिन पर एक ओर राजचिह्न और दूसरी ओर हल हो, ताकि कृषक का सम्मान हो।

संकेत : अंक कल्पना में नहीं, कारणों में हैं। अपने हर चयन के साथ एक वाक्य अवश्य लिखिए — ‘मैंने यह इसलिए चुना क्योंकि…'।
प्र6.
आपने मौर्योत्तर काल के वास्तु कलात्मक विकास के विषय में पढ़ा है। भारतीय उपमहाद्वीप के एक रेखांकित मानचित्र पर इस अध्याय में उल्लिखित कुछ स्थापत्य कलाओं के स्थान को चिह्नित कीजिए।
उत्तर

विधि। उपमहाद्वीप का रेखांकित मानचित्र लीजिए। पहले तट-रेखा और तीन-चार नदियाँ (गंगा, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी) बनाइए ताकि दिशा-बोध रहे। फिर प्रत्येक स्थल को बिंदु और नाम से अंकित कीजिए तथा एक छोटी संकेतिका जोड़िए। उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़िए ताकि किसी एक कोने में भीड़ न हो।

स्थापत्यकहाँ चिह्नित करेंकिसने बनवाया / जोड़ा
गांधार क्षेत्र (कला शैली, तक्षशिला)सुदूर उत्तर-पश्चिम, सिंधु के पारकुषाण काल
मथुरा (मथुरा कला शैली)यमुना तट पर, वर्तमान उत्तर प्रदेशकुषाण काल
हेलियोडोरस स्तंभ, विदिशा के पासमध्य भारत, मध्य प्रदेशएक इंडो-ग्रीक राजदूत
भरहुत स्तूपमध्य प्रदेश, विदिशा के पूर्व मेंमूल निर्माण संभवतः अशोक काल में; वेदिकाएँ और शिल्प शुंगों ने जोड़े
उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएँभुवनेश्वर के पास, ओडिशा (कलिंग)चेदि — खारवेल; हाथीगुंफा अभिलेख यहीं है
नानेघाट गुफाएँपुणे के पास, महाराष्ट्रसातवाहन — व्यापार मार्ग पर कर-चौकी
कार्ले गुफाएँलोनावला के पास, महाराष्ट्रसातवाहन — बौद्ध भिक्षुओं के लिए
पीतलखोरा गुफाएँमहाराष्ट्र, कार्ले समूह से उत्तर की ओरसातवाहन काल — चित्र 6.12 का यक्ष यहीं से
अमरावती और प्रतिष्ठान (पैठन)अमरावती — आंध्र प्रदेश में निचली कृष्णा पर; पैठन — महाराष्ट्र में गोदावरी परसातवाहन राजधानियाँ
कल्लनई (ग्रैंड एनीकट)कावेरी पर, श्रीरंगम द्वीप से नीचे, तमिलनाडुचोल राजा करिकाल
मदुरै, उरैयूर, वंजि (करूर)दक्षिण की तीन राजधानियाँ — मदुरै दक्षिणी तमिलनाडु में, उरैयूर तथा करूर कावेरी परपांड्य, चोल, चेर
संकेत : शैलकृत गुफाओं के लिए एक रंग, स्तूपों और स्तंभों के लिए दूसरा तथा जल-संरचनाओं एवं राजधानियों के लिए तीसरा रंग लीजिए। तब मानचित्र एक बात स्वयं कह देगा : गुफा-स्थापत्य पश्चिमी घाट और ओडिशा में सिमटा है — ठीक वहीं जहाँ कठोर चट्टान और व्यस्त व्यापार मार्ग मिलते थे।
स्वयं जाँचिए : चिह्नित करने के बाद गिनिए कि कितने स्थल किसी व्यापार मार्ग पर या उसके पास हैं। लगभग सभी। इस युग की महान वास्तुकला का व्यय व्यापार ने ही उठाया था।
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